मीडिया के काम में मोदी सरकार की दखलअंदाजी का सबूत




ग्वालियर के एक निजी विश्वविद्यालय―आइटीएम में पिछले शनिवार यानी 24 नवंबर को जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने वहाँ की विधानसभा भंग करने को लेकर जो सफाई मीडिया को दी, वह आज बुधवार यानी 28 नवंबर के कई अखबारों में पहले पन्ने पर है। ऐसा कैसे हो गया कि जम्मू-कश्मीर जैसे अति संवेदनशील राज्य की विधानसभा भंग होने की ताजा-तरीन राजनीतिक घटना को लेकर जब देश भर में चर्चा गरम है तो उसकी सफाई में राज्यपाल का बयान आने के दूसरे दिन के अखबारों में उसे छपना चाहिये था, जो नहीं छपा।

उसके बाद यह समाचार रविवार के अखबारों में आना चाहिये था लेकिन वहाँ भी इसे सबने जैसे मिलकर गायब कर दिया था। फिर सोमवार-मंगलवार को भी इसके दर्शन किसी एक अखबार तक में नहीं होना क्या साबित करता है? इसका क्या कारण हो सकता है कि चार दिनों तक इस खबर को दबाये रखने के बाद अचानक पाँचवें दिन आज बुधवार के सभी समाचार पत्रों में यह नमूदार हो जाती है?



राज्यपाल का बयान देने के चार दिन बाद इसे सबने एकसाथ क्यों और कैसे छापा यह विचारणीय मुद्दा इसलिए है क्योंकि आम तौर पर खबरें दूसरे-तीसरे दिन छपती रही हैं, परंतु इस समाचार के पीछे कौन सी वजह हो सकती है कि पहले तो इसे कोई एक भी अखबार नहीं छापता और जब छापते हैं तो सब एकसाथ, कैसे और क्यों?

क्या यह मामला उस बात की तस्दीक नहीं करता जिसमें अमूमन कहा जाता रहा है कि मीडिया को प्रधानमंत्री कार्यालय नियंत्रित करता है, कौन-सी खबर कब, कैसे प्रस्तुत की जानी है यह सबकुछ पीएमओ तय करता है? अब इस खबर की टाइमिंग को लेकर कल हकीकत चाहे जो भी निकल कर सामने आये, फिलवक्त तो यही कहा जा सकता है कि यह उदाहरण मीडिया के काम में मोदी सरकार की सीधी दखलअंदाजी का सबूत है।

(सोशल मीडिया)




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