जनता अपना विवेक न खोए, सेना का साथ दें और सरकार से सवाल पूछें




समीर भारती

कल पुलवामा में सीआरपीएफ़ जवानों की शहादत से पूरा देश ग़मगीन है. हमारे नेता खासकर एक विशेष प्रकार के नेता इस ग़म को गुस्से में बदलना चाहते हैं. लेकिन गुस्सा किस पर? गुस्सा पकिस्तान पर या गुस्सा अपने देश की सरकार पर?

हम कब तक सरकारी तंत्र की नपुंसकता का गुस्सा कभी पाकिस्तानी आतंकवादी तो कभी माओवादी, कभी खालिस्तानी तो कभी बोडोलैंड के आतंकियों पर निकालते रहेंगे.

मोदी सरकार ने कहा था कि नोटबंदी कर दिया है अब आतंकवाद का कमर टूट जाएगा. अब हवाला से वह हथियार नहीं खरीद पाएंगे. क्या हुआ उस दावे का?

नोटबंदी के बाद कई बड़ी घटनाएं हो चुकी. याद कीजिए 10 जुलाई, 2017 की अमरनाथ यात्रा. तब पीडीपी के साथ नई नई भाजपा की सरकार बनी थी. याद कीजिए उससे पहले 24 अप्रैल, 2017 और सुकमा. सुकमा में इन्हीं सीआरपीएफ़ जवानों को निशाना बनाया गया था. तब 25 जवान मारे गए थे. ऐसे ही मारे गए थे. आपने क्या समाधान निकाला था उसके बाद? क्यों आपको उस काण्ड से सबक नहीं मिला? याद कीजिए 29 नवम्बर, 2016 और नगरोटा. कितने याद दिलाऊँ? न काला धन आया न आतंक रुका.

गुस्सा दुश्मनों पर ज़रूर लेकिन सवाल शासन से

हम सब पाकिस्तानियों को सबक सिखाना चाहते हैं लेकिन कैसे? इसका एक मात्र तरीका यह है कि हम सब बॉर्डर पर चले जाएं या फिर अपनी सरकार पर दबाव डालें कि वह इन सबको रोकने के कारगर हल ढूंढें. बॉर्डर पर जाने के लिए आपको हमको प्रशिक्षित होना होगा. हमें सेना में शामिल होना होगा. हमें अपने बच्चों को सेना में शामिल करना पड़ेगा. लेकिन क्या हम अपने बच्चों को सेना में भेज दें ताकि वह इस तरह बगैर किसी जंग के लाश बन कर लौटें अपने अपने घरो में. सेना जंग के लिए होती है. अभी कौन सी जंग है? अभी तो हमारे जवान गलत राजनीतियों की वजह से मारे जा रहे है. पूरा कश्मीर बारूद की ढेर बन गया है. हर घर से आतंकवादी निकल रहा है. पिछले दिनों खबर आई कि एसपी का अपना भाई ही आतंकवादी निकला जो सेना के एनकाउंटर में मारा गया. यह कैसी नीति है कि एक ही घर से एसपी और आतंकवादी दोनों बन रहे हैं? जनता जरा गौर करें.

सत्यपाल मालिक का बयान अहम

जम्मू और कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने एनडीटीवी से कहा कि पहले से ऐसी इंटेलिजेंस रिपोर्ट थी कि बड़े आतंकी हमले होने वाले हैं. उनहोंने यह भी कहा कि सुरक्षा में भारी चूक हुई है। काफिला गुज़र रहा था और कोई इंतज़ाम नहीं था।  राज्यपाल मलिक ने कहा कि यही नहीं ढाई हज़ार जवानों का काफिला लेकर चलना भी स्टैण्डर्ड प्रोसीजर के विरुद्ध था। काफिला छोटा होना चाहिए ताकि उसके गुज़रने की रफ्तार तेज़ रहे। राज्यपाल ने यहां तक कहा कि काफिले के गुज़रने से पहले सुरक्षा बंदोबस्त की एक मानक प्रक्रिया है, उसका पालन नहीं हुआ।

जनता क्या करे?

जनता को चाहिए कि नेताओं को बताए कि वह हीरो न बनें. किसी घटना के होने के बाद हीरो बनना अपनी नाकामी छिपाने के अतिरिक्त कुछ नहीं है. आगे कोई घटना न हो इसका दबाव नेताओं और सरकार पर डालें. सरकार जनता के प्रति जवाबदेह बने. सत्यपाल मालिक ने जो कहा वह नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि आखिर चूक क्यों हुई? क्यों काफिले की साइज़ इतनी बड़ी थी? क्यों काफिले की पहरेदारी के लिए सेना तैनात नहीं थी? क्यों इंटेलिजेंस इनपुट के बाद भी मामले को गंभीरता से नहीं लिया गया.

जनता को चाहिए कि वह प्रधान मंत्री से पूछे कि उस सर्जिकल स्ट्राइक का क्या लाभ हुआ जिसकी हीरोपंती आप कर रहे थे? जनता को पूछना चाहिए कि उस नोटबंदी का क्या लाभ हुआ जिसमें पूरा हिंदुस्तान 100 दिनों तक 100 मौतों का गवाह बना? क्या वह हत्याएं नहीं थीं? क्या वह सिस्टम की बलि चढ़े वे भी शहीद कहलाएंगे? जनता को पूछना चाहिए कि सीआरपीएफ़ के जवानों की शहादत के बाद उन्हें कब पूर्ण सैनिकों का दर्जा दिया जाएगा? क्या उन्हें अब शहीद का दर्जा दिया जा सकेगा?

भ्रष्ट मीडिया और लालची राजनीति की चाहत को नाकाम करें

भ्रष्ट मीडिया इस पूरे प्रकरण को एक नए मोड़ पर ले जाना चाहती है. इससे बचें. पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दिया जाए यह देश का हर नागरिक चाहता है और वह दिया भी जाएगा. सेना चुप नहीं बैठेगी.

लेकिन भ्रष्ट मीडिया और लालची राजनीति इसे इस्लामी आतंकवाद बनाम हिन्दू राष्ट्रवाद बनाना चाहती है. यह इसकी नाकामी को छिपाने का एक षड्यंत्र मात्र है. इसे इस्लामोफोबिया में बदलने से रोकें. सही मुद्दों को ढूंढें. जिस तरह से WhatsApp, फेसबुक, ट्विटर और सोशल मीडिया पर संदेशों का प्रसार हो रहा है इससे ऐसा लगता है मानो कोई फिरकी ले रहा है. कोई जनता से गलत नंबर जान बूझकर डायल करवा रहा है. आप गलत नंबर डायल न करें. आप अपने सवाल पूछते रहें. उससे पीछे न रहें.

याद रखिए, इसमें मरने वालों में विभिन्न जात और धर्म के लोग हैं. 2000 से अधिक की टुकड़ी में हिंदुस्तान के कोने कोने से लोग थे. बचे हुए लोगों की भी जान जा सकती थी. बारूद नाम देखकर नहीं छींटे गए. उस समय उनका एक ही धर्म था वह भारतीय थे और जो आतंकवादी था वह इस देश के दुश्मन.

सच का इंतज़ार करें

सच का इंतज़ार करें. कभी कभी सच आने में बहुत समय लगता है. कभी कभी सच का इस तरह से प्रचार भी नहीं हो पाता जैसे झूठ का प्रचार होता है. खोजी पत्रकारिता की देश में अत्यंत कमी है. सोफे पर बैठ कर फेक न्यूज़ का पता लगाया जा सकता है. सच का पता नहीं लगाया जा सकता. अभी देश में कई ऐसे रहस्य हैं जिनको लेकर कई थ्योरी मौजूद है. कुछ थ्योरी मार्केट में सच को लेकर भ्रम पैदा करने के लिए भी गढ़ा जाता है. आपको पहचानना होगा कि भ्रम कौन वाला सच फैला रहा है और सच के क़रीब कौन सा सच है. इस झूठ के युग में अगर आप सच के क़रीब भी हो गए तो समझिए कि आपने सच को प्राप्त कर लिया.

(समीर भारती स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं. ये उनका अपना नज़रिया है. इसका द मॉर्निंग क्रॉनिकल से कोई लेना देना नहीं है.)

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