दिवाली में कहीं राम को तो कहीं कृष्ण, अलग अलग प्रांत के अलग अलग अराध्य




दिवाली पूरे देश में मनाई जाती है लेकिन देश के हर भाग में अलग अलग अराध्य की पूजा की जाती है. और इसे मनाने के तरीके भी अलग अलग हैं. बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश में जहाँ श्री राम की वनवास से वापसी के जश्न के रूप में इसे मनाया जाता है तो भारत के उत्तरी प्रांत में इसे श्री कृष्ण के नरकासुर को मारने के जश्न के रूप में मनाया जाता है.

आइए देखते हैं दिवाली में किस प्रांत की क्या है परंपरा

बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड में इस रात देवी लक्ष्मी और काली की पूजा की जाती है. इस रात दीयों से घरों को रौशन किया जाता है और घरों और कार्यालयों के दरवाजे खोल कर रखे जाते हैं ताकि देवी लक्ष्मी प्रवेश कर सकें. ऐसा माना जाता है कि देवी लक्ष्मी अंधेरे द्वार से अन्दर प्रवेश नहीं करती हैं।

पश्चिम बंगाल में दिवाली का त्योहार बहुत उत्साह से मनाया जाता है. इसकी तैयारी 15 दिन पहले से शुरू कर दी जाती है. घर के बाहर रंगोली बनाई जाती है. यहाँ लोग दिवाली की मध्यरात्रि को महाकाली की पूजा-अर्चना करते हैं.

ओडिशा में दिवाली पांच दिन तक धूम धाम से मनाई जाती है. पहले दिन धनतेरस, दूसरे दिन महानिशा और काली पूजा, तीसरे दिन लक्ष्मी पूजा, चौथे दिन गोवर्धन और अन्नकूट पूजा और पांचवे दिन भाईदूज मनाया जाता है. यहां आद्य काली पूजा का खासा महत्व है.

दीपावली के दिन असम, मणिपुर, नगालैंड, मेघालय, त्रिपुरा, अरुणाचल, सिक्किम और मिजोरम उत्तर-पूर्वी राज्यों में काली पूजा का खासा महत्व है. दीपावली की मध्य रात्रि तंत्र साधना के लिए सबसे उपर्युक्त मानी जाती है इसलिए तंत्र को मानने वाले इस दिन कई तरह की साधनाएं करते हैं. हालांकि इस दिन दीप जलाना, पारंपरिक व्यंजन बनाना, मिठाइयां खाना और पटाखे छोड़ने का प्रचलन भी है।

गुजरात में सभी लोग दिवाली से पहले की रात को अपने घरों के सामने रंगोली बनाते हैं। पश्चिम भारत व्यापारी वर्ग का गढ़ रहा है तो यहां दिवाली में देवी लक्ष्मी के स्वागत का खासा महत्व है। सभी घरों में देवी के लिए चरणों के निशान भी बनाए जाते हैं और घरों को चमकीले प्रकाशों से प्रज्वलित किया जाता है।

महाराष्ट्र में दीपावली का त्योहार 4 दिनों तक चलता है। पहले दिन वसुर बरस मनाया जाता है जिसके दौरान आरती गाते हुए गाय और बछड़े का पूजन किया जाता है। दूसरा दिन धनतेरस पर्व मनाया जाता है। इस दिन व्यापारिक लोग अपने बही-खाते का पूजन करते हैं। इसके बाद नरक चतुर्दशी पर सूर्योदय से पहले उबटन कर स्नान करने की परंपरा है। स्नान के बाद पूरा परिवार मंदिर जाता है। चौथे दिन दीपावली मनाई जाती है, जब माँ लक्ष्मी का पूजन होता है।

तमिलनाडु में दिवाली के 1 दिन पूर्व मनाए जाने वाले नरक चतुर्दशी का विशेष महत्व है। जैसे उत्तर भारत में दीपावली 5 दिन का उत्सव होता है, ऐसा दक्षिण भारत में नहीं होता। यहां मात्र 2 दिन का उत्सव होता है। इस दिन दीपक जलाने, रंगोली बनाने और नरक चतुर्दशी पर पारंपरिक स्नान करने का ही ज्यादा महत्व होता है।

दक्षिण भारत में दिवाली से जुड़ी सबसे अनोखी परंपरा है जिसे ‘थलाई दिवाली’ कहा जाता है। इस परंपरा के अनुसार नवविवाहित जोड़े को दिवाली मनाने के लिए लड़की के घर जाना होता है, जहां उनका स्वागत किया जाता है। उसके बाद नवविवाहित जोड़ा घर के बड़े लोगों का आशीर्वाद लेता है।

आंध्रप्रदेश में दिवाली में हरिकथा या भगवान हरि की कथा का संगीतमय बखान कई क्षेत्रों में किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा ने राक्षस नरकासुर को मार डाला था इसलिए सत्यभामा की विशेष मिट्टी की मूर्तियों की प्रार्थना होती है।

कर्नाटक में दिवाली के 2 दिन मुख्य रूप से मनाए जाते हैं- पहला अश्विजा कृष्ण और दूसरा बाली पदयमी जिसे नरक चतुर्दशी कहा जाता है। उसे यहां अश्विजा कृष्ण चतुर्दशी कहते हैं। इस दिन लोग तेल स्नान करते हैं। ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण ने नरकासुर को मारने के बाद अपने शरीर से रक्त के धब्बों को मिटाने के लिए तेल से स्नान किया था। तीसरे दिन दिवाली के दिन को बाली पदयमी के नाम से जाना जाता है। इस दिन महिलाएं घरों में रंगोलियां बनाती हैं और गाय के गोबर से घरों को लीपती भी हैं। इस दिन राजा बालि से जुड़ी कहानियां मनाई जाती हैं।

ऐसे ही हर प्रांत में कुछ न कुछ विशेष लेकिन अलग होता है और दिवाली मनाई जाती है.

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