राष्ट्रवाद की जय और गणतंत्र की क्षय




मुज़फ्फरपुर के श्री कृष्णा मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का वार्ड जहाँ बच्चे इलाजरत हैं

-राजीव सिंह

कल मंगलवार को जब बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार मुजफ्फरपुर के बदनाम अस्पताल एककेएमसीएच पहुंचे तो उनका जमकर विरोध हुआ. मीडिया की यह सुर्खियाँ बनीं. मीडिया ने परन्तु एक बात नहीं बताई कि उस विरोध में एक और बात का विरोध हो रहा था – और वह था प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजना आयुष्मान भारत का.

द मॉर्निंग क्रॉनिकल के स्थानीय संवाददाता ने जब इसकी पड़ताल की तो हैरान करने वाला तथ्य सामने आया. अब तक की रिपोर्टेड मौतों में अधिकतर मौतें उन बच्चों की हुई जो बीपीएल कार्डधारी हैं. स्पष्ट है कि उनके पास ग्लूकोस का एक पॉकेट खरीदने के लिए पैसा नहीं है. इस स्थिति में उनके पास एक मात्र उनका बीपीएल कार्ड ही सहारा था और उस कार्ड के आधार पर आयुष्मान भारत का कार्ड. इसके बावजूद कि इन गरीबों के पास यह दोनों कार्ड उपलब्ध थे उन बच्चों का इलाज नहीं हो सका.

कुछ बच्चों के परिजनों ने बताया कि अगर मेरा बच्चा पटना के किसी बड़े अस्पताल में पहुँच जाता तो शायद बच जाता. भयावह यह कि उनके पास इतने भी पैसे नहीं थे कि वह अपने बीमार बच्चों को लेकर पटना भाग पाते. और अगर पटना भाग भी आते तो उनको इस बात का यकीन नहीं था कि उनका आयुष्मान भारत योजना वाला कार्ड यहाँ काम करेगा.



इस वीडियो में नीतीश कुमार के खिलाफ आक्रोश तो था ही उससे अधिक आक्रोश आयुष्मान भारत के नाम पर गरीबों को छले जाने के खिलाफ था. उनमें से कईयों ने बताया कि आयुष्मान भारत के कार्ड पर मुजफ्फरपुर के किसी भी नर्सिंग होम ने उन बच्चों को नहीं लिया.

उन नर्सिंग होम में से एक के स्टाफ ने बताया कि आयुष्मान भारत कार्ड धारक को हम नहीं लेते. उसका कारण बताया कि मुजफ्फरपुर में जो नर्सिंग होम हैं अधिकतर गैर कानूनी ढंग से चल रहे हैं. लोगों ने बताया कि आयुष्मान भारत योजना वालों को भर्ती करने के बाद पैसा उगाही करना बहुत कठिन है. और कौन सरकारी पचड़े में पड़े. जब संवाददाता ने पुछा कि क्या वह चेक से पेमेंट लेते हैं तो उनलोगों ने साफ़ इनकार कर दिया. कहा कि हम नक़द लेते हैं. आपको यह जानकार हैरानी होगी कि इन नर्सिंग होम में पक्की रसीद तक नहीं दी जाती. दवाई की भी जो रसीद होती है वह भी एस्टीमेट के कागज़ पर दिए जाते हैं.

रोते हुए बच्चे के परिजन

जब इस संवाददाता ने पटना के कुछ अस्पताल की पड़ताल की तो पता चला कि राजधानी में भी अधिकतर के पास चेक से या स्वैपिंग मशीन से भी पैसे लेने की व्यवस्था नहीं है. डॉक्टर की फीस तक की देने के लिए रसीद नहीं है. न ही कोई आईएमए अपने डॉक्टर के मनमानेपन के खिलाफ ही बोलता है.

एक सामाजिक कार्यकर्त्ता ने अपना नाम गुप्त रखने पर बताया कि बिहार की एनडीए की सरकार पटना को उजाड़ कर स्मार्ट सिटी बनाने की योजना तो बना रही है लेकिन स्वास्थ्य और शिक्षा के नाम पर इसके पास कुछ नहीं है.

इनका कहना है कि पटना के तीन बड़े अपस्ताल का यह हाल है कि यहाँ बड़े डॉक्टर ज्यादा लापता होते हैं और विद्यार्थी ही मरीजों पर हाथ साफ़ करते हैं. आए दिन स्वास्थ्य मंत्री मंगल पाण्डेय डॉक्टरों और अस्पतालों में सुविधाओं जुटाने को लेकर चर्चा में रहते हैं लेकिन वहां क्या सुविधाएं हैं वह कोई गरीब परिवार ही बता सकता है.

एक रजिस्ट्रेशन के लिए घंटों लाइन लगना पड़ता है. उसके बाद डॉक्टर को दिखाने के लिए लंबी लाइन. ऐसा भी होता है कि कभी कोई मरीज़ का नंबर आए ही नहीं और उसको फिर से दुसरे दिन पूरी प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है.

पटना में प्लेटलेट निकालने के लिए केवल आईजीआईएमएस के पास सुविधा है और दूसरा पारस के पास. आईजीआईएमएस के पास यह मशीन अधिकतर खराब रहता है और पारस इस काम के लिए लगभग 11 हजार रूपए वसूलता है जो एक गरीब के कई वर्षों की बचत होती है.

पीएमसीएच का इंदिरा गांधी हृदय विभाग का यह हाल है कि वहां इमरजेंसी में लाए गए मरीज़ की प्रारंभिक जाँच वहां का वार्ड बॉय या स्वीपर करता है. बड़े डॉक्टर केबिन में बैठकर भूना खा रहे होते हैं या आराम कर रहे होते हैं.

वहां भर्ती एक मरीज़ के परिजन ने बताया कि उनके मरीज़ का ईसीजी रिसेप्शनिस्ट ने किया. डॉक्टर को अंदर बुलाने गए तो उनहोंने दुत्कारते हुए कहा कि जाकर रिपोर्ट लेकर आओ. अगर थोडा चिल्ला कर कह दो तो वहां के वार्ड बॉय ही आपसे लड़ने लगेंगे.

ऐसी स्थिति में सरकारी अपस्ताल के बारे में कहा जाए कि यह राम भरोसे चल रहा है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगा.

आयुष्मान भारत मात्र छलावा

पिछले बुधवार को न्यूज़18 ने एक रिपोर्ट छापा था जिसकी शायद ही आपको भनक लगी हो. इस रिपोर्ट के अनुसार, AIIMS के डॉक्टरों सहित मेडिकल विशेषज्ञ ने आयुष्मान भारत की व्यावहारिकता ही पर प्रश्न चिन्ह उठाया था.

AIIMS के कैंपस में आयोजित किए गए AIIMS Front for Social Consciousness की चर्चा में डॉक्टरों ने इस बात पर बल दिया कि ऐसी योजनाओं को लागू कराने से अच्छा है कि सरकारी अस्पतालों में सुविधाएं बढ़ाई जाएं और उन्हें आम आदमी के लिए सहज बनाया जाए.

जवाहरलाल यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सोशल मेडिसिन एंड कम्युनिटी हेल्थ के प्रोफेसर डॉ विकास वाजपेयी ने बताया कि आयुष्मान भारत नई बोतल में पुरानी शराब की तरह है. उनहोंने इस बात पर बल दिया कि जो स्वास्थ्य बीमा योजनाएं पहले से लागू हैं उनकी खामियों का विश्लेषण हो और यह सुनिश्चित किया जाए कि ऐसी खामियां न रहें.

डॉ वाजपेयी ने कहा कि ये योजनाएं भी अन्य योजनाओं की तरह ही गरीबों की भलाई के बजाए इसलिए लाई गयी है ताकि सरकार का कल्याण के नाम पर दिया जाने वाला पैसा निजी हाथों में दे दिया जाए.

AIIMS के बायोकेमिस्ट्री विभाग के प्रमुख सुब्रतो सिन्हा ने कहा कि आयुष्मान भारत योजना केवल भर्ती मरीजों के लिए है जबकि आउट-पेशेंट के लिए इसमें कोई प्रावधान नहीं है. जबकि आउट-पेशेंट के इलाज का खर्चभर्ती मरीज़ से कम नहीं होता.

AIIMS के साइकाइट्री विभाग के प्रोफेसर डॉ प्रताप शरण ने कहा कि सरकार अब सरकारी अस्पतालों में सेवा देने की परंपरा तो तोड़ कर निजी अस्पतालों से सेवा खरीदने की परंपरा ला रही है जो कि दायित्व से एक तरह से मुंह मोड़ना है.

भाजपा के तीन मंत्री जिन पर देश और राज्य के स्वास्थ्य का भार है उनमें एक अश्विनी चौबे ऊंघते हुए

नेताओं की असंवेदनशीलता

नेताओं की असंवेदनशीलता इस बात से पता चलती है कि बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मुजफ्फरपुर की मौत की ब्रीफिंग के एक कार्यक्रम में क्रिकेट का स्कोर पूछ रहे थे. केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री (राज्य) अश्विनी कुमार चौबे तो इससे संबंधित एक कार्यकम में सोते हुए पाए गए. इन दो घटनाओं से यह स्पष्ट है कि हमारे नेता कितना असंवेदनशील हैं. जरा सोच कर देखिए कि अगर मंगल पाण्डेय और अश्विनी चौबे की जगह तेज प्रताप यादव होते तो क्या होता?

किसी ने सही कहा है कि जब जब राष्ट्रवाद की जय होती है गणतंत्र की क्षय होती है.

(राजीव सिंह मीडिया में काम कर रही हमारी सामाजिक संगठन होली क्रिएचर्स द्वारा प्रशिक्षित सिटीज़न जर्नलिस्ट हैं.)

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