ख़तरे में सूचना का अधिकार




(चित्र साभार: ट्विटर)

-रईस अहमदी

“मी टू” के शोर ओ गुल में भारत दुनियाभर के 119 देशों के भुखमरी दूर करने वाले सर्वे में 55वें पायदान से गिरकर 103वें पायदान पर लुढ़क गया है। पिछले पांच साल में भुखमरी की भयावह स्थिति ने देश को घेर लिया है तेल के लगातार बढ़ते दामों पर सरकार का कंट्रोल नहीं रहा है। राफैल मामले में सरकार पहले ही फजीहत का शिकार है। इन्हीं तमाम सुर्खि़यों के बीच एक बहुत बड़ी खब़र कही दबकर रह गयी है वह है कि आरटीआई यानी सूचना के अधिकार के मामले में भारत दूसरे स्थान से गिरकर छठे स्थान पर आ गया है। यूपीए की मनमोहन सरकार में दुनिया में जहां भारत दूसरे नबंर पर था वहीं अब यह छठे पायदान पर आ चुका है।

लोकतंत्र को जब जब कमज़ोर किया गया है सबसे पहले उसके संस्थानों पर शिकंजा कसा गया है। न जाने कितने आंदोलनों के बाद आज़ाद भारत में सूचना के अधिकार को 2005 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने पास कर देश में मौलिक अधिकार और लोकतंत्र की मज़बूती का जो काम किया था उसे आज केंद्र में मौजूद एनडीए की मोदी सरकार कमज़ोर करने पर आमादा है। होना तो यह चाहिए था कि राजनैतिक दलों की काली कमाई पर रोक लगाने के लिए पार्टी फंड को सूचना के अधिकार के दायरे में लाया जाता इसके बरअक्स मोदी सरकार केन्द्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोगों के ही पर कतरने पर तुली है। यदि आप सरकार से भुखमरी के मामले में सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगते तो अपको पूरी तरह से टालमटोली वाले तंत्र का सामना करना पड़ता। जिसके जवाब न मिलने पर या तो आप सूचना हासिल करने का ख्याल ही मन से निकाल दें या फिर केंद्रीय सूचना आयोग चले जाएं। जिसकी सूरतेहाल भी भारत की अदालतों से कुछ अलग नहीं रह गई है। जहां आपकी शिकायत पर महीनों तक सुनवाई करने वाला कोई मयस्सर नहीं है।



प्रधानमंत्री मोदी ने इसी साल दिल्ली में केंद्रीय सूचना आयोग के नये चमचमाते दफ़्तर का उद्घाटन किया तो किसने सोचा होगा कि यह सूचना के अधिकार और उसके अधिकारियों का अजायबघर बनकर रह जाएगा। पहले से भीतर से बीमार पड़े आयोग में आयुक्तों के पद खाली पड़े हैं। ऐसा ही हाल देशभर के राज्यों में है। एक क़ाबिलेग़ौर बात यह भी है कि सरकार ने आयुक्तों के पद सरकारी अधिकारियों से भर दिये हैं। गुजरात में 92 फीसदी, छत्तीसगढ़, हिमाचल और महाराष्ट्र में 80 फीसदी से अधिक और असम समेत उत्तर-पूर्व के कई राज्यों के 100 प्रतिशत आयुक्त सरकारी अधिकारी हैं। आरटीआई के जानकारों का मानना है कि आयुक्त के पदों पर इतनी बड़ी संख्या में नौकरशाहों की तैनाती ठीक नहीं है। सरकारें अपने मन मुताबिक़ अफसरों को बिठाकर सूचना के प्रवाह को रोक सकती हैं।

बीमारू सूचना आयोगों की हालत का अंदाज़ा इसी बात से बखूबी लगाया जा सकता है कि सूचना का अधिकार क़ानून दोषी अधिकारियों पर 25 हज़ार रुपये तक की पेनल्टी लगाने का अधिकार देता है लेकिन दिक्कत ये है कि पूरे देश में केवल 4 प्रतिशत मामलों में पेनल्टी लग रही है। हाल ये है कि प्रधानमंत्री कार्यालय से मांगी गई सूचना का जवाब भी टालमटोली वाला होता है।

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार सूचना के अधिकार अधिनियम (आरटीआई एक्ट) में संशोधन करने के लिए संसद के मानसून सत्र में इसी साल जुलाई माह में बिल ले आई लेकिन किन्हीं कारणों से वह अभी अटक गया है। इस बिल के ज़रिए केंद्र सरकार आरटीआई एक्ट में संशोधन कर उसके कद को चुनाव आयोग की तुलना में कम करना चाहती है, जिससे सरकार उस पर पूरे तरीके से नियंत्रण रख सके। उनका दावा है कि सरकार ने इस संशोधन के लिए न तो सभी पक्षों से परामर्श किया और न ही केंद्रीय सूचना आयोग से संशोधन की बात की।

सूचना के अधिकार अधिनियम में संशोधन पर सरकार का तर्क

सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम में संशोधन कर केंद्र सरकार दो बुनियादी तत्वों को बदलना चाहती है। पहला ये कि सूचना आयोग का क़द चुनाव आयोग (ईसी) से कम हो जाए और 5 साल के कार्यकाल में परिवर्तन पर नियंत्रण मज़बूत किया जाए। सरकार चुनाव आयोग के मुक़ाबले सूचना आयोग के आला अधिकारियों के वेतन, भत्ते और सेवा शर्तों की समानता को समाप्त करने पर आमादा है।

याद रहे कि वर्तमान में सूचना आयोग के आयुक्त का वेतन सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर होता है। अगर सरकार बिल को पास करवा लेती है तो सूचना आयुक्त का वेतन सरकार के नियंत्रण में होगा, जिसे कम भी किया जा सकता है। प्रस्तावित संशोधन के मुताबिक, ‘मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों को देय वेतन’ भत्ते और अन्य नियमों व शर्तों को केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किया जा सकता है। साथ ही अन्य संशोधन का लक्ष्य मुख्य सूचना आयुक्त और अन्य राज्यों के सूचना आयुक्तों के निर्धारित पांच साल के कार्यकाल को बदल कर केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों में तब्दील करना है।

संशोधन को न्यायसंगत बनाने के लिए सरकार ने बिल को लेकर जो सफाई पेश की थी उसमें चुनाव आयोग और सूचना आयोग के कार्यों में अंतर बताया गया है। जिसमें कहा गया है, चुनाव आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के खंड (1) द्वारा स्थापित एक संवैधानिक निकाय है, जबकि सीआईसी और राज्य सूचना आयोग आरटीआई अधिनियम, 2005 के प्रावधानों के तहत स्थापित वैधानिक निकाय हैं।

सरकार का यह तर्क भी बड़ा अजीब है कि मुख्य सूचना आयुक्त, सूचना आयुक्त और राज्यों के सूचना आयुक्तों को मिलने वाले वेतन, भत्ते और अन्य सुविधाएं मुख्य चुनाव आयुक्त, अन्य चुनाव आयुक्तों, राज्य के मुख्य सचिव के बराबर हैं। जबकि, कार्य अलग हैं। ऐसे हालात में उनके वेतन और सेवा में तर्कसंगत बदलाव की ज़रूरत है।

जनसूचना अधिकारियों का उदासीन रवैया

सूचना के अधिकार के तहत मांगी जाने वाली जानकारी के मामले में सूचना अधिकारियों का रवैया बेहद टालमटोली वाला हो चुका है। कई विभागों की हालत तो यह हो गई है कि जब तक आप पहली अपील फाइल न करे जवाब नहीं दिया जाता उसमें भी कभी आरटीआई आवेदनपत्र के साथ लगने वाली 10रू की फीस के पोस्टल आडर (आईपीओ) सहीं से न भरे जाने का बहाना कर दिया जाता है और कभी सूचना उक्त विभाग से संबंधित न होने का बहाना बनाकर टाल दिया जाता है, और कभी-कभी संबंधित सवाल का जवाब ‘यह डाटा हमारे पास नहीं है’ या ’यह सूचना हमसे संबंधित नहीं है’ का टका सा जवाब देकर लटका दिया जाता है।

हमने जब दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग से दिल्ली में मौजूद अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की तादाद तथा शैक्षिक स्तर जानने के लिए आरटीआई के ज़रिय जवाब मांगा तो आयोग ही इस बात से अंजान है कि ‘दिल्ली में रहने वाले अल्पसंख्यकों की कितनी आबादी हैं?’ तीन महीने तक टालमटोल करने के बाद भी कोई जबाव नहीं दिया। इसी का जवाब जब दिल्ली सचिवालय से मांगा गया तो इसके जवाब में आईपीओं सही से न भरे जाने का बहाना करके आवेदन ही अस्वीकार कर वापस भेज दिया गया और विभाग से संबंधित न होने का बहाना भी जोड़ दिया गया। जिसके बारे में मुख्य सचिव को हम मेल के ज़रिय शिकायत कर चुके हैं जिसका जवाब अभी तक नहीं मिल पाया है।

डाकघरों से 10रू के आईपीओ नदारद

इसके साथ ही सूचना के अधिकार को कमज़ोर करने के लिए डाकघरों से 10रू वाले आईपीओ ही नदारद किए जा रहे हैं। भारत की राजधानी दिल्ली की हालत यह है कि इसके एक बड़े पॉश इलाके जनकपुरी के छोटे बड़े डाकघरों के साथ एक मुख्य डाकघर से चार महीनों तक आईपीओं हासिल न कर पाने के बाद जब हमने हेड पोस्टमास्टर से मिलकर इसकी शिकायत की तो उन्होंने बताया कि एक दिन में सिर्फ 10 आईपीओं ही आते है और नए आईपीओं भी तब तक नहीं मंगा सकते जब तक वह बिककर सिस्टम में अपडेट न हो जाएं। जब हमने कहा कि आपके डाकघर में पिछले 4 महीने से 10रू वाले आईपीओं नहीं मिल रहे हैं तो उन्होंने फौरन अपने निचले कारिंदे को बुलाकर पूछा कि ‘आपने पिछले चार महीने से आईपीओ नहीं मंगाए’ और आपने इंडेंट (मांगपत्र) कब भेजी है? तो वह सही से इसका जवाब नहीं दे पाए। इसके बाद जब इंडेंट की कॉपी मंगवाई जाती हैं तो वह एक फटे हुए सादे कागज़ का टुकड़ा लाकर पोस्टमाटर साहब के हाथ में रख देते हैं। जिसपर कोई तारीख दर्ज नहीं होती या फाड़ दी गई होती है। प्रशासन की चालाकी का आलम यह है कि अब वह आपके सूचना के अधिकार में अड़चने खड़ी कर इस अधिकार को इतना कमज़ोर बना देना चाहता है कि या तो आप थककर सूचना मांगना ही छोड़ दें या फिर सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करना ही भूल जाएं।

आरटीआई के बिना लोकतंत्र बेमानी

सूचना के अधिकार के जानकार मानते हैं कि एक्ट में संशोधन का आधार दोषपूर्ण है। उनका मानना है कि सूचना के अधिकार के बिना वोट का अधिकार बेकार है, क्योंकि दोनों एक दूसरे से जुड़े हैं। लिहाज़ा यही कारण है कि मुख्य चुनाव आयुक्त, मुख्य सूचना आयुक्त और सुप्रीम कोर्ट के जज का कार्यकाल और पद से हटाए जाने की प्रकिया को बराबर रखा गया था। लेकिन सरकार आरटीआई अधिनियम की नींव को कमज़ोर करने के लिए एक अपारदर्शी तरीके से काम कर रही है।

यह भी गौरतलब है कि सीआईसी को उनके काम के कारण अन्य के बराबर रखा गया था। जिसके तहत वह वरिष्ठता के आधार पर अधिकारियों और अन्य लोगों को नोटिस जारी कर सकते हैं, जानकारी मांग सकते हैं। लेकिन उनका वेतन कम होते ही उनकी स्थिति भी बाकी अधिकारियों के मुकाबले गिर जाएगी।

पहले मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला आरटीआई एक्ट में संशोधन के बारे में पहले ही कह चुके हैं कि यह कदम एक प्रतिकूल प्रस्ताव है और यह सूचना आयोग और चुनाव आयोग की स्वायत्तता से समझौता करने जैसा होगा।

इसके पीछे तर्क है कि क़ानून द्वारा सीआईसी को चुनाव आयोग के बराबर का स्तर नहीं दिया जा सकता है, जो कि पूरी तरह से खामियों से भरा है। सूचना आयोग (सीआईसी) में नियुक्त किए गए पूर्व सरकारी अधिकारियों में से अधिकांश को 5 साल का कार्यकाल नहीं मिला है। कानून कहता है कि सूचना आयोग के आयुक्तों का कार्यकाल 5 साल का होना चाहिए या अधिकतम 65 वर्ष की आयु तक होना चाहिए। हालांकि, ज़्यादातर अधिकारी केवल 62 वर्ष की उम्र में ही आते हैं। इसलिए आयु अवधि के कारण उनका कार्यकाल लगभग 3 साल है। ऐसे में उनके विशिष्ट कार्यकाल को ठीक नहीं करना शरारत से कम नहीं होगा।

इन तमाम बातों से यह समझना मुश्किल नहीं है कि सूचना का अधिकार लोकतंत्र को मज़बूत करने का एक अहम साधन है जिसे हर हाल में बचाया जाना बेहद ज़रूरी है। जिसमें बज़ाब्ता तौर पर जवाबदेही और पार्दर्शिता को सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये इनके अपने विचार हैं।)

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