देश के गरीबों का निवाला छीनने में लिप्त सरकारी अधिकारी




सरकार द्वारा चलाया जाने वाला सरकारी योजनाओं को पिछड़े और गरीबों के कल्याण के लिए नियोजित किया जाता है लेकिन खाद्य सुरक्षा स्कीम के तहत गरीबों को मिलने वाला अनाज बिचौलिये खा जा रहे हैं। इस बात की पुष्टि RTI से हुआ.

सरकार ने गरीब परिवारों को अनाज मुहैया कराने का जिम्मा अफसरों को सौंप रखा है. मगर नीचे से ऊपर तक वितरण व्यवस्था के ‘खेल’ में सभी गरीबों को अनाज उपलब्ध नहीं हो पा रहा है. बिहार के गया और मधुबनी के बाद नवादा, बक्सर, भोजपुर, औरंगाबाद जिले में अनाज वितरण में डीलरों की मनमानी और अफसरों की लापरवाही सामने आई है.

इस बात का खुलासा RTI कार्यकर्ता शिव प्रकाश राय ने अनाज योजना में हर माह करोड़ों रुपये के घोटाले होने की खबर मीडिया में दिया. आरटीआइ कार्यकर्ता शिव प्रकाश राय का कहना है कि केन्द्र सरकार राज्य के गरीबों को 55 लाख टन अनाज उपलब्ध कराती है. इसमें 22 लाख टन गेहूं और 33 लाख टन चावल मिलता है. इनका मानना है कि राज्य भर में अंत्योदय के कार्डधारियों की संख्या सात से आठ लाख कम हो गई है.

हालांकि इससे पहले जदयू नेता और पूर्व विधायक मंजीत सिंह भी यह मांग कर चुके हैं कि राज्य सरकार को गरीबों के अनाज के गड़बड़ का टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल साइंसेज जैसी किसी संस्था से सोशल ऑडिट कराना चाहिए.

मौजूदा हालात की बात करें तो आधार कार्ड और बैंक खाते के आभाव में बहुत से परिवारों का राशन कार्ड रद्द होने की कहानी सामने आ रही है. इसके साथ ही आधार संख्या नहीं जुड़े होने से राशन दुकानदारों को भी पूरी मनमानी करने की खूली छूट मिल गई है. ये राशन दुकानदार कभी अंगूठा नहीं मिलने तो कभी बैंक खाता लिंक नहीं होने जैसी कारणों का हवाला देकर राशन देने से इंकार कर रहे हैं. इसी का खामियाजा झारखण्ड के सिमडेगा के एक परिवार को झेलना पड़ा है.

 

 

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