श्री श्री रविशंकर का चयन सवालों के घेरे में




हिंदुत्व ब्रिगेड के हिन्दू कारसेवकों ने 6 दिसम्बर, 1992 को बाबरी मस्जिद के ढाँचे को विध्वंस कर दिया था (फ़ाइल फ़ोटो)

-मनीष शांडिल्य

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या के राम मंदिर और बाबरी मस्जिद मामले को शुक्रवार को मध्यस्थता के लिए भेज दिया. सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में पांच जजों वाली पीठ ने तीन सदस्यों को मध्यस्थता समिति का सदस्य बनाया है. सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस फ़कीर मोहम्मद इब्राहिम ख़लीफ़ुल्ला इस समिति के प्रमुख होंगे. उनके अलावा पैनल में आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पंचू भी शामिल हैं.

सुप्रीम कोर्ट की यह पहल चौकाने वाली है क्यूंकि पहले उसने खुद कहा था कि अयोध्या की विवादित जमीन के केस की सुनवाई वह संपत्ति विवाद के रूप करेगा. और इतना ही नहीं उसने सबको अचरज में डालते हुए इस मामले की सुनवाई के लिए संविधान पीठ का गठन भी किया था.

मगर अब ऐसा लगता है कि शीर्ष अदालत की यह समझ बनी है कि ज़मीन की मिल्कियत सुलझाने के साथ-साथ अगर समझौते के जरिए लोगों के जख्मों पर मरहम भी लग सके तो बेहतर होगा. शायद अदालत की मंशा यह है की समझौते के रास्ते आगे बढ़ने से देश में अमन-चैन, सौहार्द आदि कायम किया जा सकता है. यह पहली नज़र में एक अच्छी पहल लग सकती है लेकिन कई कारणों से इस पर सवाल भी खड़े हो रहे हैं.

न्यूज़ पोर्टल newsplatform.in ने अपने सम्पादकीय में इसे एक आश्चर्य पैदा करने वाला कदम बताया है. यह संपादकीय कहता है, “यह आश्चर्यजनक इसलिए है, क्योंकि विवाद से संबंधित किसी पक्ष ने मध्यस्थता कराने की गुजारिश सुप्रीम कोर्ट से नहीं की थी. न्यायपालिका से अपेक्षा यह रहती है कि किसी भी विवाद पर वह संविधान की भावना और कानूनी प्रावधानों के मुताबिक निर्णय दे. सर्वोच्च न्यायालय का फैसला अंतिम होता है. अयोध्या विवाद दशकों से एक नासूर बना हुआ है. भारत का हर विवेकशील व्यक्ति इसका यथाशीघ्र अंत चाहता है. मुस्लिम पक्ष ने बार-बार कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय का जो भी फैसला हो, उसे स्वीकार्य होगा. केस में शामिल हिंदू पक्ष ने भी इससे इतर बात नहीं कही है, हालांकि हिंदुत्व की राजनीति करने वाले संगठन जरूर यह कहते रहे हैं कि इस मसले का संबंध आस्था से है, जिस पर अदालत फैसला नहीं दे सकती. इसके बावजूद सभी पक्षों को सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का इंतजार है. ऐसे में अपेक्षित यह था कि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ प्रति दिन के आधार पर सुनवाई करती और जल्द से जल्द अपना निर्णय देने का प्रयास करती. लेकिन फिलहाल कोर्ट ने अपनी निगरानी में मध्यस्थता कराने का फैसला किया है. न्यायपालिका का तय संवैधानिक दायरे से दीगर अपेक्षित भूमिका लेना समस्या-ग्रस्त है. अब इस पर व्यापक बहस की जरूरत है कि क्या संवैधानिक संस्थाओं को ऐसी भूमिका अपनाने की कोशिश करनी चाहिए?

गौरतलब है कि इस मामले पर इलाहाबाद उच्च न्यायलय के फैसले को भी ‘पंचायती फैसला’ कहा जाता है क्यूंकि अदालत ने ज़मीन की मिल्कियत तय करने की जगह विवादित करीब पौने तीन एकड़ ज़मीन मामले के तीनों पक्षों के बीच बराबर-बराबर बाँट दी थी और जिसे चुनौती दिए जाने के कारण अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है.

राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद पर श्री श्री रविशंकर

साथ ही मध्यस्थ के रूप में आध्यात्मिक गुरु कहे जाने वाले श्री श्री रविशंकर के चयन को लेकर भी कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं. मार्च 2017 में श्री श्री रविशंकर ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा कि अगर अयोध्या विवाद नहीं सुलझा तो ‘भारत में सीरिया जैसे हालात हो जाएंगे’.

तब श्री श्री रविशंकर ने एनडीटीवी को बताया था, ”अगर कोर्ट कहता है कि ये जगह बाबरी मस्जिद की है तो क्या लोग इस बात को आसानी और खुशी से मान लेंगे? ये बात 500 सालों से मंदिर की लड़ाई लड़ रहे बहुसंख्यकों के लिए कड़वी गोली की तरह होगी. ऐसी स्थिति में खून-ख़राबा भी हो सकता है.”

बीबीसी को दिए इंटरव्यू में रविशंकर ने कहा था, “बाबरी मस्जिद/राम जन्म भूमि के विवाद का हल अदालत के बजाए इसके बाहर निकाला जाना चाहिए. मुस्लिम समाज राम मंदिर पर अपना दावा त्याग दे और इसके एवज़ में उन्हें अयोध्या में मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ ज़मीन दी जाए.”

श्री श्री रविशंकर के ऐसे टिप्पणियों के आईने में उनके चयन पर सवाल उठाते हुए thewire.in पर अपनी वीडियो टिप्पणी में वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अपूर्वानंद ने कहा, “मध्यस्थता को अगर कारगर होना है तो मध्यस्थ का कोई हित कभी विवाद से जुड़ा नहीं होना चाहिए. लेकिन श्री श्री रविशंकर का मत पहले ही आ चुका है. वे पहले यह कह चुके हैं कि यह (विवादित स्थल) राम की जन्मभूमि है इसलिए इससे एक पक्ष की भावनाएं जुडी हुई हैं, यह मुसलमानों के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं है और इसलिए अगर न्यायपूर्वक यह ज़मीन मुसलमानों के पास जाती भी है तो उन्हें इसे दान कर देना चाहिए. श्री श्री रविशंकर के साफ़ तौर पर आरएसएस के तरफ झुके होने के प्रमाण पहले मिल चुके हैं. आरएसएस रामजन्म भूमि आंदोलन का प्रणेता है. इसलिए श्री श्री रविशंकर की पक्षधरता बहुत साफ़ है. ऐसे में उनका मध्यस्थ चुनना ही मध्यस्थता की टीम को संदिग्ध बना देता है.”

साथ ही अपूर्वानंद आगामी आम चुनाव के दवाब और तनाव वाले माहौल को भी मध्यस्थता के लिए सही समय नहीं मानते हैं. उनका मानना है कि ऐसे माहौल में मध्यस्थता का आराम और इत्मीनान से हो पाना ही संदिग्ध है. वे कहते हैं, “मध्यस्थता का स्थान, काल और पात्र अभी किसी लिहाज से उपयुक्त नहीं है. अल्पसंख्यक दवाब में हैं और ऐसे में मध्यस्थता के न्यायपूर्ण दिशा में आगे बढ़ने की आस लगाना बेमानी है.”

(ये लेखक के अपने विचार हैं.)

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