यकीन के सर्वोच्च आसन से डोलती न्यायपालिका




मनीष शांडिल्य

माना जाता है कि कॉलेजियम व्यवस्था के कारण ही उच्च न्यायपालिका में समाज के सभी वर्गों की मौजूदगी नहीं दिखाई देती है. सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट्स में नियुक्त करीब 350 न्यायाधीशों में करीब नब्बे फीसदी जज अगड़ी या सवर्ण कही जाने वाली सामाजिक समूहों से आते हैं.

लगातार दूसरे वर्ष देश की सर्वोच्च न्यायपालिका सवालों के घेरे में है. नए साल की शुरुआत में विवादों के कारण सुप्रीम कोर्ट तब फिर चर्चा में आया जब दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज कैलाश गंभीर ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिख कर सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम की एक सिफारिश का विरोध किया. उन्होंने 32 वरिष्ठ जजों की अनदेखी कर कर्नाटक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और दिल्ली हाई कोर्ट के जज जस्टिस संजीव खन्ना को सुप्रीम कोर्ट भेजने की कॉलेजियम की सिफारिश को गलत बताया.



दरअसल कॉलेजियम द्वारा 10 जनवरी को अपनी ही पुरानी सिफारिश पर पुनर्विचार करते हुए दो नए न्यायाधीशों दिनेश महेश्वरी और संजीव खन्ना के नाम की सिफारिश की गई. इसे पांच दिनों में राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल गई और अधिसूचना भी जारी हो गई, जबकि ये दोनों जज वरीयता सूची में 21वें और 33वें नंबर पर थे. इसके पहले कॉलेजियम ने दिल्ली व राजस्थान उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र मेनन व प्रदीप नंद्राजोग के नामों की सिफारिश की थी. गौरतलब है कि इन दोनों के नामों को वापस करके इनसे कम वरीयता वाले दो लोगों की अनुशंसा किन हालातों में की गई, यह बताया नहीं गया. पुरानी सिफारिश 12 दिसंबर, 2018 को कॉलेजियम की बैठक द्वारा की गई थी, जो लगभग महीने भर लंबित रहा. यह कॉलेजियम की कार्यशैली और न्यायिक नियुक्ति की प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है.

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करीब एक साल पहले भी देश की सर्वोच्च अदालत के अंदरुनी मतभेद सामने आए थे. साल 2018 की शुरुआत उस ऐतिहासिक घटना से हुई थी जब सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गोगोई ने सुप्रीम कोर्ट के तीन अन्य जजों के साथ अप्रत्याशित प्रेस कॉन्फ्रेंस किया था. सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों ने तत्कालीन चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा से मतभेद के कारण 12 जनवरी, 2018 को राजधानी दिल्ली में संवाददाता सम्मेलन किया था. सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ. अपने आवास पर आयोजित इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में तब सुप्रीम कोर्ट के नंबर दो जस्टिस जे चेलमेश्वर ने कहा था, “हम चारों इस बात पर सहमत हैं कि इस संस्थान को बचाया नहीं गया तो इस देश में या किसी भी देश में लोकतंत्र ज़िंदा नहीं रह पाएगा. स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका अच्छे लोकतंत्र की निशानी है.”

साल बदला, नहीं बदले हालात

मगर बीते साल और इस साल के विवाद में थोड़ा अंतर है. बीते साल के प्रेस कांफ्रेंस के बाद जनमानस में यह छवि बनी थी कि देश की सर्वोच्च अदालत किसी दबाव (संभवतः सरकार के दबाव) में काम कर रही है. यह बात तब सही साबित हुई जब पिछले साल जनवरी में प्रेस कांफ्रेंस करने वाले चार जजों में से एक जस्टिस कुरियन जोसेफ ने पिछले दिनों रिटायर होने के बाद कुछ बेहद अहम खुलासे किए. उन्होंने बताया कि प्रेस कांफ्रेंस करने वाले चारों जजों को लग रहा था कि तब के चीफ जस्टिस किसी बाहरी दबाव में फैसले कर रहे हैं यानी कोई बाहरी ताकत न्यायपालिका को दिशानिर्देश दे रही है.

Four Supreme Court Judges who went to press against then Chief Justice Deepak Mishra
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जस्ती चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन लोकूर और कुरियन जोसेफ (फ़ोटो साभार: अरविंद यादव / एचटी)

वहीं इस साल का विवाद न्यायपालिका के निष्पक्ष छवि पर सवाल खड़े कर रहा है. ऐसा तब हो रहा है जब निष्पक्षता के सवाल पर प्रेस कांफ्रेंस करने वाले चार जजों में से एक जस्टिस रंजन गोगोई अब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस हैं. सुप्रीम कोर्ट में हुई नई नियुक्तियों के बारे में जज कैलाश गंभीर के साथ-साथ जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज संजय कौल, दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज एसएन धींगरा और बार कौंसिल के पदाधिकारियों ने पत्र लिखकर प्रतिरोध जताया है और यह बहुत चिंताजनक है.



आपत्तियां न्यायमूर्ति माहेश्वरी और न्यायमूर्ति खन्ना की योग्यता को लेकर नहीं है. आपत्तियां उनकी वरिष्ठता के बारे में है. लोगों को लग रहा है कि जब उनसे ज्यादा वरिष्ठ जज मौजूद हैं तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट तक लाने में इंतजार करवाया जा सकता था. संजीव खन्ना अच्छे जज होने के साथ उन मशहूर न्यायमूर्ति एचआर खन्ना के भतीजे हैं, जिन्होंने आपातकाल के विरोध का अकेले साहस दिखाया था. इन नामों को तत्काल अंतिम रूप देने के पीछे न्यायपालिका में जजों की कमी भी बताई जा रही है. इसके बावजूद लगता है कि सारी आपत्तियों का समुचित उत्तर मिलना अभी बाकी है.

न्यायपालिका की सर्वोच्चता और उसके प्रति लोगों का भरोसा तभी तक कायम है, जब तक वह बाहरी दखल से पूरी तरह मुक्त रहते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से काम करे. इसके लिए जरूरी है कि न्यायपालिका के कामकाज में ज्यादा से ज्यादा पारदर्शिता आए. विधायिका हो या कार्यपालिका, हरेक सरकारी क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही के सिद्धांत को तो न्यायपालिका मजबूती से लागू करती है, परंतु अपने कॉलेजियम की कार्यशैली में यही पारदर्शिता लाने में वह परहेज करती दिखाई दे रही है और यह अदालत के प्रति देश की करोड़ों निष्ठावान जनता के लिए बहुत चिंता की बात है. ऐसे में इस संवैधानिक संस्था का दायित्व बनता है कि वे निष्पक्षता और स्वायत्तता बरकरार रखे.

जरूरत राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग

न्यायिक नियुक्तियों के लिए आयोग के गठन पर पहले लंबी बहस चली और फिर संविधान (121वां) संशोधन विधेयक 2014 को, जिसे राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक भी कहा जाता है, संसद के दोनों सदनों ने पारित किया. इसके तहत न्यायिक नियुक्तियों में न्यायपालिका, कार्यपालिका और विभिन्न क्षेत्रों के स्थापित लोगों की राय लेते हुए चयन प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की बात कही गई थी. लेकिन अक्तूबर, 2015 में सर्वोच्च न्यायालय के पांच जजों वाली संविधान पीठ ने इसे असंवैधानिक करार देते हुए कॉलेजियम व्यवस्था के तहत ही नियुक्ति करने का निर्णय दिया. लेकिन न्यायपालिका ने अपने ही कई निर्णयों और सिद्धांत के विपरीत योग्य उम्मीदवारों की सूची में से वरीय लोगों की सिफारिश वापस लेते हुए सूची के 21वें और 33वें नंबर के लोगों को उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करके राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की जरुरत को फिर से सामने रखा है.

यह भी माना जाता है कि कॉलेजियम व्यवस्था के कारण ही उच्च न्यायपालिका में समाज के सभी वर्गों की मौजूदगी नहीं दिखाई देती है. अभी सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट्स में नियुक्त करीब 350 न्यायाधीशों में करीब नब्बे फीसदी जज अगड़ी या सवर्ण कही जाने वाली सामाजिक समूहों से आते हैं. साथ ही एक राय यह भी है कि कॉलेजियम व्यवस्था के कारण भी न्यायपालिका में ‘परिवारवाद’ है. न्यायपालिका में चयन प्रक्रिया के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवा की तरह व्यवस्था और इसके लिए जुडिशियरी आयोग का गठन करने की लगातार मांग करने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा अपने भाषणों में दावा करते रहते हैं कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के 80 प्रतिशत जज किसी न किसी ऐसे परिवार से आते हैं, जो न्यायपालिका से जुड़ा हुआ है.

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