साक्षात्कार: शरिया, तीन तलाक़ के मुद्दे केंद्र सरकार की नाकामी को छिपाने के हथकंडे: ज़फ़रयाब जीलानी




ज़फरयाब जीलानी सुप्रीम कोर्ट के वकील और बाबरी एक्शन कमिटी के संयोजक हैं. दिल्ली स्थित अपने आवास पर उनहोंने द मॉर्निंग क्रॉनिकल के खरी खोटी-नवेद अख्तर के अंतर्गत नवेद अख्तर के साथ बात की. प्रस्तुत है बात-चीत:

नवेद: आज कल एक विवाद चल रहा है जिसे हम दारुल क़ज़ा या शरिया कोर्ट कहते हैं. उसके बारे में बताएंगे कि यह शरिया कोर्ट क्या है?

जीलानी: यह आम तौर पर आपसी समझौते का तरीका है. यह कोई पैरेलल जुडिशल सिस्टम नहीं है. इसका न ही संविधान में कोई हस्तक्षेप है और न ही भारतीय कानून में कोई हत्स्क्षेप है. और क़ाज़ी (शरिया जज) का फैसला मानने के लिए कोई बाध्यता भी नहीं है.

नवेद: इसमें किस तरह के मामले/समस्याएँ आती हैं?

जीलानी: मुस्लिम पर्सनल लॉ में जो मामले आते हैं वह मुसलमानों के निकाह (विवाह), तलाक़, मेहर (विवाह के समय पत्नियों को दी जाने वाली राशि, इसका तलाक़ से कोई संबंध नहीं), मेंटेनेंस, गार्डियनशिप, वेडिंग गिफ्ट, वक्फ़, इनहेरिटेंस (विरासत) के मामले आते हैं जिनको संविधान ने मुस्लिम पर्सनल बोर्ड (शरीअत) एक्ट 1937 में कहा था कि ये पर्सनल लॉज़ हैं. और इन पर जो भी विवाद होगा और अगर दोनों पक्ष मुसलमान हैं तो निपटारा इसी शरियत कानून के हिसाब से होगा. ये सन 1937 से लागू है. हालांकि ये सन 1937 से पहले से ही है लेकिन इसको 1937 में एक्ट का रूप दिया गया. इसमें जो विवाद होता है तो लोग क़ाज़ी के पास जाते हैं. अभो नालसर विश्वविद्यालय के फैज़ान मुस्तफ़ा साहब ने जो लिखा है उसमें कानपुर और हैदराबाद के दो नॉन-मुस्लिम प्रोफेसर का (हवाला) सन्दर्भ दिया है. इसमें कानपुर के प्रोफेसर ने कहा है कि इसमें 90 प्रतिशत औरतें ही जाती हैं और इसमें लिखा है कि 95 मामले औरतों के पक्ष में ही तय होती हैं. हैदराबाद के प्रोफेसर ने भी कहा है कि इसमें अधिकतर मुस्लिम महिलाएं ही जाती है. क़ाज़ी के पास जो भी जाता है तो क़ाज़ी उससे एक फॉर्म भरवाता है जिस पर लिखा होता है कि हम क़ाज़ी को यह अधिकार देते हैं अपनी ओर से कि जो हमारे विवाद हैं उसमें यह तय कर दें या शरई (मुस्लिम पर्सनल बोर्ड के हिसाब से) आदेश बता दें जिसे हम मान लेंगे. फिर क़ाज़ी उसके पति को इत्तला (सूचित) करता है और वह आता है और जब वह उस फॉर्म पर दस्तखत करने के लिए तैयार होता है तब क़ाज़ी दोनों के मामले शुरू करते हैं. फिर उसके बाद फैसले करते हैं. उसके बाद भी अगर कोई पक्ष सिविल कोर्ट जाना चाहे तो क़ाज़ी उसके लिए मना बिलकुल नहीं करते हैं. अक्सर इमारत ए शरिया के मामले जो कोर्ट गए तो जज ने क़ाज़ी के फैसले को भी मंगवाया और 99 प्रतिशत में वही फैसला दिया जो क़ाज़ी साहब ने दिया.

नवेद: अगर हम कहें कि इसमें बहुत फेयर और ट्रांसपेरेंट सिस्टम से काम होता है?

जीलानी: बिलकुल. यह बहुत ही फेयर सिस्टम है. यहाँ जितना फेयर होता है उतना तो हमारे कोर्ट में भी नहीं होता. यहाँ वह दारुल क़ज़ा हैं जो बोर्ड (आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड) ने काएम किए हैं. दारुल क़ज़ा का असल कांसेप्ट यह है कि इसे अमीर (ख़लीफा) काएम करता है लेकिन हिंदुस्तान में चूँकि कोई अमीर नहीं होता था इसलिए 1993 में बोर्ड में यह बात आई तो कहा गया कि हम बोर्ड के अध्यक्ष को अमीर मान लेते हैं और बोर्ड के अध्यक्ष से ही अपॉइंटमेंट करवाते हैं. यह सिस्टम चार राज्यों में पहले से ही प्रचलित थे. बिहार और ओडिशा के लिए ईमारत ए शरिया यह 1920 से ही चल रहा था. आंध्र में हैदराबाद स्टेट का क़ाज़ी पहले से चलता था. भोपाल में क़ाज़ी पहले से था. नवाब के ज़माने से ही, नवाब का ज़माना खत्म हुआ लेकिन वह आज भी चल रहा है. उनका तनख्वाह सरकार देती है. 1860 में क़ाज़ी के इस तरह के पॉवर किसी तरह से ले लिए गए थे लेकिन 1860 से पहले यह चल रहा था. 1860 के बाद से जुडिशल पॉवर क़ाज़ी को नहीं थी तो यह करीब करीब खत्म हो गया था. तो बोर्ड ने तय किया कि जहाँ जहाँ यह नहीं हैं वहां मुसलमानों के विवाद आपस में तय हो जाएं और यह जल्दी तय हो जाएं तो यह ज्यादा अच्छा है. क्योंकि कोई मामला क़ाज़ी के कोर्ट में 1 साल तक मुश्किल से ही रहता है. आम तौर से 6 महीने, 9 महीने, 3 महीने में इसका निपटारा हो जाता है. हमारे साथी हैं शकील अहमद सय्यद साहब, सुप्रीम कोर्ट में हैं, भोपाल में उनका ससुराल है. वह भोपाल से बहुत वाकिफ (परिचित) हैं. उनको भी यह मालूम है कि कई मामले में कोर्ट ने कहा कि जाओ तुम लोग अपना फैसला क़ाज़ी साहब से करवा लो. और फिर कोर्ट ने उसी को अपना फैसला कर दिया. तो कोर्ट को यह कॉन्फिडेंस है कि वहां जो होगा वह इन्साफ होगा. बोर्ड इस मामले में बहुत सख्त (कठोर) है. अगर बोर्ड के संज्ञान में किसी क़ाज़ी के खिलाफ कोई ऐसी बात आ जाए कि यह कोई फ़रीक़ (पक्ष) से मिल रहा है, यह उससे मिलना जुलना है तो, कोर्ट उसको तंबीह (चेतावनी) देती है और फिर उसको हटा देती है. क़ाज़ी को सख्त हिदायत (कठोर निर्देश) होते हैं जहाँ भी कोई मुक़दमा उनकी अदालत में हो वह किसी पक्ष से संपर्क न रखें.

नवेद: यह विवाद को कुछ विशेष लोग फैला रहे हैं उसका क्या कारण लगता है?

जीलानी: इसका तो ऑब्वियस (स्पष्ट) वजह (कारण) है. आज कल जितने भी विवाद हो रहे हैं. तीन तलाक़ वाला भी जो था. हमारे पास जो केंद्र की सरकार है उसके पास अपनी कारकर्दगी (काम) बताने के लिए कुछ नहीं है और ख़ास कर हिंदी बेल्ट में. वह चाहती है कि मीडिया का ज्यादा समय इसी सोच में लग जाए. और इससे उनको और भी एक फायदा होता है. कम्युनल टेंशन पैदा होता है. हिन्दू वोट पोलराइज़ कुछ होते हैं. वह उनको यह बताते हैं कि इनका जो पर्सनल लॉ है वह हम ख़त्म कर रहे हैं. उनका एक ऑब्जेक्ट है. यूनिफार्म सिविल कोड. उनहोंने मनिफेस्टो में दिया है. मडिया का 80 से 90 जो है उसको उनहोंने अपने कण्ट्रोल में कर रखा है. जब ऐसी कोई बात होती है तो मैं समझता हूँ कि बाक़ायदा उनको निर्देश यह दिया जाता है और फिर सब शुरू हो जाते हैं. यह जानते हुए कि यह सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट से कवर्ड है. मैंने सब लोगों को कहा. यह मामला 8 तारीख को शुरू हुआ. और 8 तारीख को ही मेरे पास ज़ी टीवी वाले आ गए. कि साहब पीटीआई वाले ने रिपोर्ट की है. पीटीआई वाले ने रिपोर्ट कर दिया था. तो मैंने कहा कि यह मामला बिलकुल जुडिशल सिस्टम का पैरेलल नहीं है. इस पर सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट (निर्णय) है. लेकिन किसी ने भी सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट का हवाला नहीं दिया. यह तो उनकी डेलीब्रेट (जान बूझ) कर थी.

नवेद: अखबारों में और मीडिया में कुछ लोग कहते हैं कि जिस तरह की खाप पंचायत हैं वह इसी तरह की सिस्टम है.

जीलानी: खाप पंचायत से इसका कोई मुक़ाबला नहीं होता. जो भी क़ाज़ी फैसला करता है वह शरियत के कानून के मुताबिक़ चलता है. खाप पंचायत में कोई क़ानून नहीं. फिर वे क्रिमिनल फैसले करते हैं. क़ाज़ी कोई क्रिमिनल फैसले नहीं करता. क्रिमिनल लॉ कोई कोई टच भी नहीं करता है. इसलिए दोनों में बहुत फर्क है. और खाप पंचायत वाले अपने फैसले को एनफोर्स करवा देते हैं यहाँ क़ाज़ी की तरफ से कोई एन्फोर्समेंट नहीं होता है. यहाँ आप आज़ाद हैं उनका फैसला माने न मानें. चंद बुनियादी फ़र्क हैं इसलिए खाप पंचायत से इसका कोई मुक़ाबला (तुलना) नहीं किया जा सकता है. और वो तो ज़बरदस्ती करते हैं न. उनके पास कोई जाता नहीं है. वो खुद ही दोनों पक्ष को बुलवा लेते हैं और जो चाहें फैसला कर लें. तो उनके यहाँ न कोई कानून है न उनके यहाँ इसकी कोई परवाह है कि कोई न्याय मांग रहा है यां नहीं मांग रहा है. ज़बरदस्ती एनफोर्स करते हैं.

नवेद: जो काज़ियों ने फैसले किए हैं वह कोर्ट में भी गए होंगे. कोर्ट में उनके रिजेक्शन और अप्रूवल का रेश्यो क्या है?

जीलानी: 99 प्रतिशत मैं कह सकता हूँ. अभी ज्यादा फैसले इमारत ए शरिया के गए हैं. बाक़ी दारुल क़ज़ा के कम गए हैं. अधिकतर फैसले को अपहोल्ड किया है. कुछ केसेस में क़ाज़ी के यहाँ से रिकॉर्ड मंगा करके और क़ाज़ी का ब्यान ले कर किया है और कुछ केसेस में फैसले को पढ़ कर किया है. 99 केसेस ऐसे हैं जिसमें क़ाज़ी जो फैसले करता है वही फैसले सिविल कोर्ट करता है.

नवेद: तो जो हम शरिया कोर्ट कहते हैं इसमें तो सब का भला ही है, किसी का बुरा नहीं है?

जीलानी: यह बात तो प्रोफेसर फैज़ान मुस्तफ़ा ने कहा है जो नालसर यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर हैं. उनहोंने बहुत कॉन्फिडेंस से कहा है कि इससे 99 प्रतिशत औरतों को बहुत सस्ता जस्टिस मिल जाता है. और जो हमारे यहाँ सिस्टम है जुडिशल उसमें जितने केसेस पेंडिंग हैं, कई करोड़ केसेस पेंडिंग हैं उनका निपटारा ही करने में कई सौ साल लग जाएंगे. उनहोंने अपने आर्टिकल में इसको लिखा है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है. अगर सुप्रीम कोर्ट इससे संतुष्ट (मुतमईन) नहीं होता तो क्यों इसको दो दो केसेस में ख़ारिज करता. यह आर्बिट्रेशन कौंसिल है. इसमें आर्बिट्रेशन होता है. यहाँ सिर्फ आर्बिट्रेशन होता है. यहाँ कोई चीज़ जुडिशल नहीं है. सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि इससे जुडिशल सिस्टम में कोई हत्स्क्षेप नहीं है. लेकिन इन लोगों को बिना किसी कारण कुछ चाहिए. हुकूमत का मकसद पूरा हो रहा है. और मीडिया के लोग इसको लेकर हल्ला कर रहे हैं. इसको इशू बनाए रखेंगे जब तक चाहेंगे.

नवेद: जो केसेस दारुल क़ज़ा में जाते हैं उनको कोर्ट में भेज दिए जाएँ तो क्या असर पड़ेगा?

जीलानी: देखिए, मैं वकील हूँ इसलिए जानता हूँ कोर्ट में कोई भी मैट्रिमोनिअल डिस्प्यूट (विवाह संबंधी विवाद) 10 साल से कम में तय होता नहीं है. ट्रायल थ्री टियर सिस्टम है. सिविल जज या मुंसिफ के यहाँ गया. आम तौर पर मुंसिफ के यहाँ जाता है. वहां फैसला होने में भी 5 से 10 साल लग जाते हैं. उसके बाद अपील होती है डिस्ट्रिक्ट जज के यहाँ. उसके बाद सेकंड अपील होती है हाई कोर्ट में. तो अगर 30 साल की औरत वहां डाइवोर्स लेने जाए तो 50 साल में मान लीजिए कि डिक्री मिली तो एज (आयु) कहाँ रह जाएगी शादी के लाएक़. एक घटना हुई है. हमलोग गोवा गए थे. वहां एक जज थे जो हमारे जानने वाले हैं. उनहोंने बताया कि उनके कोर्ट में एक औरत ने डाइवोर्स का पेटीशन किया. वहां यूनिफार्म सिविल कोड है. उस औरत को डिक्री मिली तब 27 साल गुज़र चुके थे. डिक्री मिलने के बाद वह औरत वहां रोने लगी. तो उनहोंने पुछा कि अब क्यों रो रही हो अब तो आपके पक्ष में फैसला हुआ है. उस औरत ने कहा कि अब हम इसको लेकर क्या करें. अब तो मेरी पूरी जवानी ही ख़तम हो गयी. अब हम से कौन शादी करेगा. यहाँ दारुल क़ज़ा में यह मामला साल भर के अंदर तय हो जाता है. यहाँ स्पीडी जस्टिस भी है, चीप जस्टिस भी है. दारुल क़ज़ा में मुश्किल से 100 रुपए भी खर्च नहीं होते हैं. और अदालत में हम जैसे वकील कितना खर्च करवाते हैं सब जानते हैं. यह कोर्ट किसी भी तरह से देश के हित के खिलाफ नहीं है. बल्कि यह देश हित में है. और यह इन्साफ की ज़रूरतों को पूरा करता है.

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