एसआईटी की रिपोर्ट 2002 गुजरात दंगों पर लीपापोती: ज़मीरुद्दीन शाह




शाह, एपीजे कोलकाता साहित्य महोत्सव के समापन दिवस पर अपनी पुस्तक पर आधारित एक चर्चा में बोलते हुए (फ़ोटो साभार: ट्विटर)

सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल ज़मीर उद्दीन शाह, एपीजे कोलकाता साहित्य महोत्सव के समापन दिवस पर अपनी पुस्तक पर आधारित एक चर्चा में बोल रहे थे

सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल ज़मीर उद्दीन शाह जिनकी पुस्तक,  “द सरकारी मुसलमान” जो सेना अधिकारी के रूप में उनकी यात्रा का एक संस्मरण था ने 2018 में बवाल खड़ा कर दिया था, ने रविवार को कहा कि एसआईटी रिपोर्ट जिसमें गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चीट दी गयी थी असल में राज्य में हुए 2002 के दंगों पर लीपापोती थी।



“जब हम दंगा नियंत्रण के लिए गुजरात पहुंचे तो गुजरात शासन द्वारा हमें लॉजिस्टिकल सपोर्ट नहीं दिया गया था। सैकड़ों जानें जाने के बाद 24 घंटे के बाद गुजरात शासन ने हमें वाहन, गाइड और अन्य लॉजिस्टिकल सपोर्ट उपलब्ध कराया.

शाह ने कहा, “एसआईटी की रिपोर्ट मेरे संस्मरण में लिखी सभी बातों का खंडन करती है, लेकिन मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मुझे एसआईटी द्वारा कभी भी घटनाओं का ब्यौरा पेश करने के लिए नहीं बुलाया गया। मैंने 2002 में ही एक विस्तृत रिपोर्ट जमा की थी।” शाह भारतीय सेना के दिग्गजों में थे जिन्हें 2002 के दंगों को रोकने के लिए गुजरात भेजा गया था. उनहोंने यह बात आज एपीजे कोलकाता साहित्य महोत्सव के समापन दिवस पर अपनी पुस्तक पर एक पैनल चर्चा के दौरान कहा।

उन्होंने दोहराया कि उन्होंने ‘पूरी सच्चाई’ लिखी है और आगे कहा कि पूरा घटनाक्रम सेना के “युद्ध डायरी” में भी दर्ज किया गया था।

कोणार्क पब्लिशर्स द्वारा प्रकाशित संस्मरण में 2002 के गुजरात दंगों से संबंधित भागों पर बहुत विवाद हुआ।

शाह ने अपने संस्मरण में कहा कि 1 मार्च, 2002 को सुबह 7 बजे अहमदाबाद हवाई क्षेत्र में लगभग 3,000 सैनिकों के उतरने के बाद, राज्य सरकार ने परिवहन और अन्य लॉजिस्टिकल सहायता नहीं प्रदान किया ताकि शहरों और कस्बों में हिंसा को बढ़ाया जा सके।

उन्होंने कहा कि यह देरी गांधीनगर में 1 मार्च को दोपहर 2 बजे तत्कालीन केंद्रीय रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस की मौजूदगी में गुजरात के तत्कालीन मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी को सीधे सीधे अनुरोध करने के बावजूद हुई।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेष जांच दल (एसआईटी) की रिपोर्ट, जिसमें मोदी का नाम हटा दिया गया था, ने अतिरिक्त सेना सचिव (गृह) अशोक नारायण की गवाही के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला था कि “सेना की मांग और तैनाती में कोई देरी नहीं हुई थी”।

शाह के बयानों का समर्थन तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल एस. पद्मनाभन ने भी किया था।

एसआईटी का नेतृत्व आर.के. राघवन ने किया था जो अभी साइप्रस में भारत के राजदूत हैं।

शाह एपीजे कोलकाता साहित्य महोत्सव के 10 वें संस्करण के समापन दिवस पर एक सत्र “जय हिंद! झंडा और देश के लिए” में बोल रहे थे।

Liked it? Take a second to support द मॉर्निंग क्रॉनिकल हिंदी टीम on Patreon!