सोच पर पहरा




कृष्ण मुरारी

नरेन्द्र दामोदर दास मोदी जब कांग्रेस मुक्त भारत अपने हालिया चुनावी भाषणों में बोलते हैं, तो मेरे जैसे आदमी को पता नहीं क्यों, विपक्ष मुक्त भारत सुनाई देता है। एक समय कांग्रेस देश-समाज में व्याप्त सभी बुराइयों की जड़ में हुआ करता था। आज भी कांग्रेस अपने अतीत के सम्पूर्ण स्वरूपों में विद्यमान है। फर्क सिर्फ इतना है कि केन्द्रीय सत्ता से बेदखल कर दिया गया है। सर्वप्रथम नेहरू जी ने इंदिरा गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाकर वंशवाद और परिवारवाद की नींव देश की राजनीति में रखी। उस समय से लेकर आज तक राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों में वंशवाद-परिवारवाद का दंश सम्पूर्णता में देश की राजनीति झेल रहा है। भ्रष्टाचार, हिन्दू-मुस्लिम तुष्टीकरण हो, या हिन्दू-मुस्लिमों के बीच उभरे वैमनस्य की आड़ में दंगे हो, सभी का राजनीतिक लाभ लेने की भरपूर कोशिश में कांग्रेस लगी रही है। इसको इस तरह भी कहा जा सकता है कि आज देश में व्याप्त सभी बुराइयों की जड़ में कांग्रेस रही है। चाहे वह औरत-मर्द गैरबराबरी का मामला हो, समाज में व्याप्त आर्थिक गैरबराबरी का या जात-पात आधारित राजनीति हो या धार्मिक उन्माद फैलाने का, इन सभी को खाद-पानी देकर पालने-पोसने का काम कांग्रेस ही करती रही है। भले ही आज एक परिवार की राजनीति करते-करते नैपथ्य में जाने को विवश है, जिसके लिए वह खुद ही दोषी है। सार्थक विपक्ष जनतंत्रा की मूल अवधरणा में है।



अब जो बात मुझे कहनी है, वह यह है कि नरेन्द्र मोदी जब कांग्रेस मुक्त भारत बोलते हैं, तो प्रकारांतर में उनके पीछे दबंगता से खड़ा आर.एस.एस. भी बोलता प्रतीत होता है। आर.एस.एस. अपने निर्माण काल से लेकर अब तक क्या करता रहा है, यह यहां व्यापकता में कहने की जरूरत नहीं है, सिर्फ इतना भर कि वर्णव्यवस्था और हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा पर खड़ा यह संगठन अपने को कहता तो है सांस्कृतिक संगठन, लेकिन दिन-रात राजनैतिक सत्ता बी.जे.पी. के माध्यम से प्राप्त हो, इसी जुगाड़ में लगा रहता है। आज देश के अर्श से फ़र्श तक इन्हीं के लोग सत्ता की कुर्सी पर विराजमान हैं – अपनी सम्पूर्ण दबंगता के साथ। भला या बुरा जैसा भी है, आज पूरे भारत में विपक्ष की भूमिका में कांग्रेस ही है। इसकेे अलावे जो भी विपक्षी दल हैं, विपक्ष की भूमिका में, वो सभी के सभी क्षेत्रीय दल हैं। राष्ट्रीय राजनीति कीे क्षितिज पर उनकी भूमिका की पड़ताल एक नजर में की जा सकती है। उड़ीसा में बीजू जनता दल के नवीन पटनायक हाल तक बी.जे.पी. के साझेदार रह चुके हैं। आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री कभी राष्ट्रीय राजनीति की मजबूत भूमिका में रहे हैं, आज बी.जे.पी. के ताकतवर पार्टनर हैं। तमिलनाडु में जयललिता की मृत्यु के बाद एआइडीएमके बी.जे.पी. की गलबहियां होने को उतारू हैं, बस केन्द्र में लाभ वाले मंत्री पद पर मामला अटक जाता है। करूनानिधि अपने बेटे के मोहपाश में गिरफ्तार क्षेत्रीयता का नगाड़ा बजा रहे हैं, फिलहाल संप्रग (UPA) के साझेदार हैं। तमिलनाडु राज्य का राजनीतिक रूझान यह है कि वहां की दोनों क्षेत्रीय दलों में से कोई एक दिल्ली की केन्द्रीय सत्ता का साझेदार रहता है। बंगाल की ममता बनर्जी हाल तक राजग की सदस्य थी, वर्तमान में बी.जे.पी. के खिलाफ झंडाबरदार होने को विवश हैं, अन्यथा उनकी राजनीति का सूर्य कब अस्त हो जायेगा, कहा नहीं जा सकता, क्योंकि वह स्वयं ही राजनीति के अतिवाद की शिकार हैं। बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री अपनी छवि के बोझ से इतने ग्रसित हैं कि एक समय में बी.जे.पी. के देशव्यापी विजय रथ को रोकने की भूमिका में होने के बावजूद आज बी.जे.पी. के मजबूत पार्टनर हैं। हाल ही में राजनीति के फलक पर उभरे दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप दल के कर्ता धर्ता केजरीवाल भूतपूर्व ब्यूरोक्रेट रह चुके हैं, राजनीतिक नौटंकी के मानसिक रोगी जैसी हरकत करते दिखते हैं। एक क्षेत्रीय दल और है आर.जे.डी. जिसके कर्ता धर्ता लालू प्रसाद हैं। बिहार की राजनीति के शीर्ष पर होने और बरसों बरस मुख्यमंत्री की गद्दी पर विराजने के बावजूद व्यक्तिगत सम्पति के लोभ-लालच से इतने ग्रसित हैं कि भ्रष्टाचार और परिवारवाद रूपी प्रशांत महासागर में हमेशा डूबते-उबरते रहने को विवश हैं। लालू प्रसाद भूमिका तो लेते हैं राष्ट्रीय राजनीति की, लेकिन भ्रष्टाचार और परिवारवाद के जंजाल में खुद को फंसा कर सभी सत्तासीन दलों के टारगेट में रहने को विवश हैं। ले देकर बचता है वामदल जो कभी राष्ट्रीय दल होने का स्वांग भरता था, आज क्षेत्रीय दल बन कर रहने को अभिशप्त है। बरसों बरस बंगाल के सत्ता पर काबिज और मुख्यमंत्री की शोभा बढ़ाने वाले ज्योति बसु एक समय हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री के मजबूत दावेदार बन कर उभरे थे, उनकी मृत्यु उपरान्त आज उनका दल सी.पी.एम. का हाल यह है कि बंगाल में विपक्ष की भूमिका में भी कांग्रेस है। त्रिपुरा और केरल के अलावेे कोई राज्य उनकी झोली में जाने से खुद को परहेज करता दिखता है। हालांकि सी.पी.एम. और सी.पी.आई. की भूमिका आज भी हमेशा राष्ट्रीय राजनीति की ही है, लेकिन वह स्वयं कब तक अपनी इस भूमिका को बचा पायेंगे इसमें शक ही है। आने वाले संसदीय चुनाव में उनकी भूमिका राज्यसभा और लोकसभा में उनके दल (सी.पी.एम.-सी.पी.आई.) की संख्या बल ही उनकी राष्ट्रीय राजनीति की पहचान बनायेगा।

क्षेत्रीय दलों पर एक नजर डालने के बाद अब वापस बी.जे.पी.-कांग्रेस की ओर मुखातिब हों, तो राजनीति के राष्ट्रीय छितिज पर बी.जे.पी.-आर.एस.एस. द्वारा पूरे भारत पर खड़ा किया गया राष्ट्रव्यापी बखेरा हिन्दुस्तान की बहुलतावादी संस्कृति, गंगा-यमुना की तहजीब और तमीज पर ही प्रश्न चिन्ह् लगाता दिख रहा है। केन्द्रीय सत्ता पर काबिज दल की पूरी राजनीति जनतंत्र के मूल तत्व समता, बराबरी और बंधुत्व के आधार स्तम्भ पर ही चोट करता दिखता है। 18 करोड़ की मुस्लिम आबादी को हाशिये पर ढकेलने और सम्पूर्ण हिन्दू वोटों को एकतरफा अपनी झोली में डलवाने की इनकी संकीर्णतावादी सोच जनतंत्र को ही नेस्तनाबूत करने पर आमादा है। 2014 में इनकी केन्द्रीय सत्ता पर आसीन होने के बाद ऐसा लगने लगा है कि जैसे सोच पर ही पहरा लगा दिया गया है। आज हालात इस कदर बद्तर बना दिया गया है कि स्वतंत्र सोच वाले व्यक्ति और संस्थान को अपने रास्ते से हटा देने और व्यापक तौर पर भय का माहौल कायम करना ही सत्तासीन दल के समर्थकों का एक मात्र काम रह गया है। गौ रक्षा समिति हो या दुर्गा वाहिनी या कि जो हमसे सहमत है वह हमारे साथ, अन्यथा पाकिस्तान चले जाए के बेवकूफ़ाना नारों के साथ देश की लोकतांत्रिक छवि को ही धूलधूुसरित करने पर आमदा है। देश के स्तर पर पत्रकारिता का निर्भिक रोल खतरे में पड़ता दिख रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि उदार लोकतंत्र के बुनियादी तत्व सहिष्णुता, अन्य विचारोें के प्रति सम्मान तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हाशिये पर खिसकते जा रहे हैं। चारो ओर भय का वातावरण कायम किया जा रहा है। भय सबसे पहले संवाद को समाप्त करता है और निरंतर संवाद लोकतंत्र की आत्मा है। साथ ही भय का माहौल स्वाधीनता को धीरेे-धीरेे समाज में खत्म करता है। भय का माहौल व्यक्तिपरक राजनीति और जातीय अस्मितावाद को बढ़ावा देता है। 2017 में कई स्थापित सम्पादकों-पत्रकारों को मुख्यधारा से हटने या चुप रहने को मजबूर कर दिया गया। हम जैसा सोचते हैं वैसा लिखो, नहीं तो मत लिखो, अन्यथा दुनिया से मुक्ति ले लो। कइयों को तो सत्ता के मदान्ध में इनके समर्थकों ने दूसरी दुनिया का निवासी बना भी दिया है। ऐसे माहौल में अगर मजबूत विपक्ष ही राष्ट्रीय क्षितिज से गायब हो जाये, तो फिर इनके लिए बाध्यकारी क्या रह जाएगा। कांग्रेस अपने देश में लोकतंत्र के संकुचित कर दिये गये जनतंत्र की व्यापक मजबूरी को बहुत अच्छी तरह समझती है, इसलिए बी.जे.पी. के खिलाफ तो वह खड़ी होती जरूर है, लेकिन इस सच को बखूबी समझती है कि बी.जे.पी. फ़ेल होगी तो केन्द्रीय सत्ता का सुनहरा कल हमारा ही है। इसलिए हिन्दूत्व के उभार से लाभ लेने को हमेशा तत्पर रहती है। आज पूरे ताम झाम से यह प्रचारित किया जा रहा है कि मोदी के खिलाफ तो कोई है ही नहीं और 2019 का लोकसभा तो हम आसानी से जीत जाएंगे। कांग्रेस तो राष्ट्रीय राजनीति में कहीं दूर-दूर तक हमारे (बी.जे.पी.) खिलाफ खड़ा भी नहीं दिखता है। एक झूठ भारतीय जनमानस में और भरा जा रहा है कि बार-बार होने वाले चुनाव जनता की गाढ़ी कमाई पर अनावश्यक बोझ है, जनता के द्वारा दिये गये टैक्स की बरबादी है, इसी पैसे को जनता की भलाई और विकास में खर्च किया जा सकता है, अगर चुनाव से मुक्ति मिल जाए तो। बार-बार एक ही झूठ को सच के रूप में स्थापित करने में आर.एस.एस.-बी.जे.पी. को महारत हासिल है ही। बी.जे.पी.-आर.एस.एस. और रीढ़विहिन चाटुकार कारपोरेट मीडिया द्वारा जनविकास को बाधित करने वाला तत्व, चुनाव ही है। बार-बार देश में चुनाव का होना जनता के पैसों की बरबादी है-इसको स्थापित किया जा रहा है। हाल ही में हिमाचल प्रदेश में चुनाव आयोग द्वारा जल्दबाजी में चुनाव की तारीख की घोषणा का निर्णय लिया गया। गुजरात चुनाव की घोषणा में अनावश्यक देरी करने का निर्णय लिया गया तथा चुनाव आयोग ने गुजरात बी.जे.पी. के पक्ष में खड़ा होकर यह तर्क दिया कि जल्दी चुनाव की घोषणा से जनता के द्वारा चुनी हुई सरकार को जनविकास को रोकने जैसा है। चुनाव की घोषणा की तारीख से आचार संहिता लग जाता है, जिस कारण विकास का कोई काम सरकार चुनाव सम्पन्न होने तक नहीं कर सकती है। आज चुनाव आयोग जैसी आॅटोनोमस संस्थान को भी सत्ताधारी दल अपने जैसे सोचने पर मजबूर करता दिखता है। जनतंत्र के बारे में यह स्थापित युक्ति है कि जनतंत्र जनता के द्वारा जनता के लिए और जनता का शासन है। हमारा संविधान भी जनता को सार्वभौम शक्ति का मालिक मानता है। जब चुनाव ही जनता के लिए बेमतलब का बोझ स्थापित कर दिया जाए तो कहां का जनतंत्र और किसका जनतंत्र!

इस तरह 2019 में जो व्यक्ति और दल शासन में रहेगा वहीं व्यक्ति या दल भविष्य में भी शासन में रहेगा, यहीं जुगत और जुगाड़ में सत्ताधारी दल लगा हुआ है। हिन्दू राष्ट्र में एक ही व्यक्ति अवतार पुरूष के शासन की परिकल्पना है जैसा की राजतंत्र में होता था। ईश्वर का प्रतिनिधि राजा जिसे ईश्वर ने वरदान स्वरूप धरती पर जन कल्याण के कार्य हेतु और शासन करने के लिए भेजा है, अर्थात ईश्वर का प्रतिनिधि अवतार पुरूष राजा होगा, ऐसा राजतंत्र का घोषित लक्ष्य था। यही लक्ष्य आज आरएसएस और भाजपा का है।

ऐसे माहौल में सभी प्रगतिशील और जनतांत्रिक ताकतों, व्यक्तियों और संस्थानों का दायित्व बन जाता है कि वह दृढ़ता के साथ घोषणा करे कि हम लिखेंगे, बोलेंगे, तुम्हें जो करना है, कर लो। ऐसी सोच देश के स्तर पर विकसित करना चाहिए। साथ ही साथ जनपक्षीय मजबूत विपक्ष की आवाज जनता के बीच से निकालने की निरन्तर पहल में लगे रहना ही वत्र्तमान संकट का हल दिखता है।

(लेखक जनमुक्ति संघर्ष वाहिनी के सदस्य हैं। समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में छपते रहते हैं। यह लेख इनके व्यक्तिगत विचार हैं।)

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