तेजस्वी के लखनऊ यात्रा के सियासी मायने




बिहार प्रतिपक्ष के नेता और पूर्व उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव (फ़ोटो: ट्विटर)

-मनीष शांडिल्य

12 जनवरी को सपा और बसपा ने उत्तर प्रदेश का लोकसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ने का एलान किया और इसके अगले ही दिन राजद नेता तेजस्वी यादव ने लखनऊ पहुंचकर बसपा अध्यक्ष मायावती का पैर छूकर उनसे आशीर्वाद ले लिया और उसकी तस्वीर ट्विटर पर भी लगाई.

इस मुलाकात की अगली सुबह 14 जनवरी को तेजस्वी यादव ने सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ मिलकर लखनऊ में एक प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित किया. इस प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने उत्तर प्रदेश में गठबंधन करने के लिए सपा और बसपा का शुक्रिया अदा किया है. उन्होंने दावा किया कि देशहित में हुए सपा-बसपा गठबंधन से उनके पिता लालू यादव की कल्पना ज़मीन पर उतरी है. प्रेस कांफ्रेंस में तेजस्वी के बाद अपनी बात रखने आए अखिलेश यादव ने भी पटना से आकर बधाई देने के लिए तेजस्वी को धन्यवाद दिया और कहा कि नरेन्द्र मोदी सरकार से पूरी देश की जनता नाराज है और उनके गठबंधन की ख़ुशी पूरे देश में है.



उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन कांग्रेस को दरकिनार कर दिया गया है लेकिन बिहार में राजद और कांग्रेस पुराने गठबंधन सहयोगी रहे हैं. ऐसे में विपक्ष ने तेजस्वी की यात्रा पर निशाना साधा. भाजपा नेता और बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने ट्वीट किया, “यूपी में सपा-बसपा ने कांग्रेस को अकेला छोड़ दिया. बिहार में जनाधारहीन कांग्रेस को कोई पूछ नहीं रहा.”

Tejashwi Yadav meets Mayawati
सपा-बसपा गठबंधन होने के बाद तेजस्वी यादव मायावती से मिलकर उनका पावँ छू कर आशीर्वाद लेते हुए

राजद को कांग्रेस की जरूरत

विपक्ष की आलोचना और मीडिया कयास से इतर अभी बिहार में जो जमीनी स्थिति है उसमें राजद कांग्रेस को दरकिनार नहीं करेगी क्यूंकि दोनों एक-दूसरे के पुराने और भरोसेमंद सहयोगी हैं और उत्तर प्रदेश के मुकाबले बिहार में महागठबंधन के सामने एनडीए की चुनौती कहीं ज्यादा बड़ी है. इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि नीतीश कुमार की पार्टी के एनडीए में फिर से शामिल होने के बाद बिहार में एनडीए अभी 2014 के मुकाबले चुनावी समीकरण के लिहाज से ज्यादा मजबूत दिखाई देती है. ऐसे में तेजस्वी जदयू के अलग होने के बाद से ही कांग्रेस को साथ रखते हुए महागठबंधन का दायरा बढ़ा रहे हैं. पहले उन्होंने जीतन राम मांझी, इसके बाद उपेंद्र कुशवाहा को जोड़ा. वे छोटे और नए दलों को भी साथ ले रहे हैं. मुकेश साहनी की नई-नवेली पार्टी वीआइपी यानी कि विकासशील इन्सान पार्टी को भी उन्होंने साथ लिया है तो वाम दलों से भी गठबंधन होने की चर्चाएं हैं.

कुछ दूसरी वजहें भी हैं जिनके कारण राजद और कांग्रेस का साथ बना रहेगा. राजद क्षेत्रीय पार्टी है, लालू जेल में हैं; ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक सरपरस्ती, नैतिक और राजनीतिक समर्थन के लिए भी राजद कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ेगी. साथ ही लालू यादव के जेल में होने के कारण बिहार में राजद-कांग्रेस के बीच नेतृत्व को लेकर यूपी और अन्य राज्यों की तरह होड़ भी नहीं है जहां मायावती या ममता बनर्जी राहुल के नेतृत्व स्वीकारने को तैयार नहीं दिखती हैं. तेजस्वी ने राहुल गांधी को नेता मान लिया है.



बिहार में कांग्रेस के कुछ नेता दिसंबर के विधानसभा नतीज़ों से उत्साहित होकर बराबरी की दावेदारी करते हुए बीस सीट की मांग कर रहे हैं. ऐसा होना चुनावी मौसम में स्वाभाविक भी है. राजद-कांग्रेस के बीच सीटों को लेकर मोल-भाव और दोनों दलों के नेताओं और उम्मीदवारों के दावे होते रहेंगे लेकिन दोनों दल अनुभवी हैं और इसकी संभावना नहीं है कि राजद यूपी की तरह कांग्रेस को अलग कर चुनावी मैदान में जाए. दोनों ही दलों की तरफ से ऐसे कोई संकेत नहीं हैं.

मुलाकात की राजनीतिक अहमियत

तेजस्वी का मायावती और अखिलेश से मिलना भाजपा के खिलाफ़ महागठबंधन को व्यापक बनाने की दिशा में उठाया गया कदम दिखाई देता है. तेजस्वी आने वाले दिनों में ममता बनर्जी से भी मिलने वाले हैं. लखनऊ की मुलाकात के जरिए दो राज्यों के तीन बड़े राजनीतिक आधार वाले क्षेत्रीय दलों ने देशभर में बड़ी सामाजिक गोलबंदी का राजनीतिक संदेश दिया है.

यूपी में सपा-बसपा के कांग्रेस से गठबंधन नहीं करने के सवाल पर तेजस्वी ने कहा कि यूपी में भाजपा को हराने के लिए सपा-बसपा ही काफी है. दरअसल विपक्षी दल भाजपा के खिलाफ राष्ट्रव्यापी मोर्चा बनाते हुए मगर राज्यस्तर पर जमीनी हालात के हिसाब से गठबंधन बनाकर और अपनी-अपनी ताकत के हिसाब से लड़ने की तैयारी कर रहे हैं. इस रणनीति के तहत चुनाव के पहले कांग्रेस के साथ गठबंधन की संभावना पूरी तरह से मौज़ूद है और चुनाव बाद कांग्रेस से मोल-भाव करने की उनकी ताकत भी बढ़ जाती है.

चुनावी महत्व

मायावती और सपा से तेजस्वी के मुलाकात के राजनीतिक के साथ-साथ चुनावी अहमियत भी है. खासकर बसपा के साथ. इस चुनावी तालमेल में कोई बड़ी बाधा भी नहीं दिखती है क्योंकि तीनों का मूल प्रभाव क्षेत्र भी अलग-अलग है.

बसपा एक राष्ट्रीय पार्टी है. हिंदी पट्टी के हर राज्य में उसके पास एक छोटा सा सही मगर प्रतिबद्ध मतदाता वर्ग है. मायावती के समर्थक ‘साइलेंट वोटर’ समझे जाते हैं. बिहार के विधानसभा चुनावों में भी बसपा ठीक-ठाक वोट लाती रही है और पहले उसके कुछ विधायक भी होते रहे हैं. बिहार के उन हिस्सों में बसपा का ज्यादा प्रभाव है जो यूपी से सटे हुए हैं. माना जा रहा है कि तेजस्वी मायावती से आशीर्वाद लेकर महागठबंधन के लिए इस मतदाता वर्ग के समर्थन की ख्वाहिश भी रखते हैं. इस मुलाकात से राजद की सामाजिक न्याय वाली छवि भी मजबूत होती है और उसकी तरफ दलित वोटों के ध्रुवीकरण की संभावना भी बढ़ेगी. साथ ही पिछड़ा और दलितों का साथ आना उत्तर भारत की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरूआत का कारण बन सकता है.

राजद और बसपा इसके पहले तब करीब आए थे जब मायावती ने जब राज्यसभा में दलित मुद्दों को उठाने से रोके जाने पर सदन से इस्तीफा दे दिया था, तब आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने उन्हें बिहार से राज्यसभा में भेजने का प्रस्ताव दिया था. मायावती ने हालांकि इस प्रस्ताव के लिए धन्यवाद कहते हुए इसे स्वीकार करने में असमर्थता जताई थी, लेकिन इसके बाद दोनों दल एक दूसरे के करीब आ गए. और अब तेजस्वी-मायावती मुलाक़ात के बाद मायावती ने कहा है कि सीबीआई लालू प्रसाद को बिना वजह परेशान कर रही है.

वहीँ पूर्व केंद्रीय मंत्री देवेंद्र यादव जैसे बिहार में सपा के कुछ पॉपुलर नेता हैं, पार्टी का एक ढांचा है, ऐसे में तेजस्वी चाहेंगे कि सपा से औपचारिक गठबंधन न सही लेकिन किसी-न-किसी तरह का तालमेल हो. जिसमें ऐसा कुछ हो सकता है कि यूपी में राजद के कुछ उम्मीदवार सपा और बिहार में सपा के कुछ उम्मीदवार राजद के टिकट पर लड़े.

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