रहबर भी ये हमदम भी ये ग़म-ख़्वार हमारे, उस्ताद ये क़ौमों के हैं मे’मार हमारे




यह दो पंक्तियाँ किसी अज्ञात शायर ने कहा है लेकिन यह शिक्षक के बारे में कुछ कहने के लिए बेहतरीन शब्द हैं। शिक्षक हमारे पथप्रदर्शक, हमारे साथी, हमारे सीनों में छिपे गम को समझने वाले और राष्ट्रों के निर्माता होते हैं। ऐसे ही थे हमारे डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन, भारत के पहले उप-राष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति। राधाकृष्णन का जन्म सितंबर 1888 में सर्वपल्ली नामक एक गांव में हुआ था, जो पहले मद्रास प्रेसीडेंसी में था। यह अब आंध्र प्रदेश में है। हम उनके जन्म दिन को आज के दिन भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं और इस तरह हम अपने उन शिक्षकों को भी श्रद्धांजली देते हैं जिन्होंने हमारे जीवन को प्रभावित किया है। आइए हम उनमें से कुछ को याद करें जो आज तक अपने विद्यार्थियों के मीठे मीठे स्मृति में मौजूद हैं:

डॉ राकेश कुमार आईजीआईएमएस में एक डॉक्टर हैं। वह बच्चों का इलाज करते हैं। वह आज अपने शिक्षक सुल्तान अहमद को याद करना नहीं भूलते हैं। सुल्तान अहमद बहुत ही मृदुभाषी, समय के पाबंद और ईमानदार शिक्षक थे। डॉक्टर राकेश कहते हैं कि उनका विद्यार्थियों के प्रति स्नेह असाधारण था। उनको हम सबके नाम याद थे और वह हमें हमारे नामों से ही बुलाया करते थे। मैं उस दिन को कभी नहीं भूल सकता जब उन्होंने मेरे लिए एक पॉकेट ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोश लाया था। मैं अंग्रेजी में कमज़ोर था और हमेशा शब्दार्थों में उलझा रहता था। आज भी वह शब्दकोश मेरे पुस्तकालय में मौजूद होना चाहिए। आज मैं अपने रोगियों का उपचार बहुत प्यार से करता हूं। आज मैं जो भी हूँ और जो कर रहा हूँ यह उन छोटी छोटी चीज़ों का परिणाम है जो मुझे उन दिनों में मिला जब मेरा व्यक्तित्व एक आकार ले रहा था।

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अल-खैर सहकारी क्रेडिट सोसायटी लिमिटेड के पूर्व अध्यक्ष फिरोज़ आलम सिद्दिकी, बड़े सम्मान और श्रद्धा के साथ अपने शिक्षक सहदेव प्रसाद सिंह को याद करते हैं। सहदेव प्रसाद सिंह प्रसिद्ध ए एन कॉलेज, पटना के प्राचार्य थे। फिरोज़ आलम सिद्दीकी कॉलेज में प्री-यूनिवर्सिटी के अपने दिनों को याद करते हैं। एक दिन, जब वह अपनी साइकिल पर परिसर में प्रवेश कर रहे थे तभी द्वार पर उनका सामना एस पी सिंह से हो गया को उस समय वहां के प्राचार्य थे। उन्होंने अपनी साइकिल पर बैठे हुए ही उन्हें ‘प्रणाम’ किया। इस बात से वह बहुत क्रोधित हुए। वह कहते हैं कि “मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ और दूसरे दिन मैं उनके कार्यालय सुबह सवेरे ही चला गया और अपनी गलती की माफी माँगी। उन्होंने मुझे न केवल माफ़ किया बल्कि अपने लाइब्रेरियन को आदेश भी दिया कि इस लड़के को उनकी गारंटी पर लाइब्रेरी से किताबें दिए जाएं। लाइब्रेरी से पुस्तकों की अनुमति मिलना मेरे लिए बहुत मददगार साबित हुआ और प्रिंसिपल की गारंटी से मिलना मेरे लिए एक सुंदर उपहार था।

हममें से अधिकतर के जीवन में कम से कम एक कहानी ऐसा होगा जो हमें पूरा जीवन गुदगुदाता होगा। ऐसी ही एक कहानी इरफ़ान परवेज़ की है। वह कहते हैं कि “मैं अपने अंग्रेजी शिक्षक मोहम्मद आबीद को बहुत याद करता हूं। जब मैं कक्षा पांच में था तब उन्होंने मुझे स्कूल में पढ़ाया था। मैं 20 से 30 बच्चों की कक्षा का एक मात्र विद्यार्थी था जो अपनी अंग्रेज़ी के लिए हर दिन पीटता था। मैं हमेशा प्रार्थना करता था कि वे बीमार हो जाएं हालंकि मुझे एक भी दिन ऐसा याद नहीं है जब मेरी प्रार्थना सुनी गई हो। जब मैं उन्हें आज देखता हूँ तो सम्मान और स्नेह खुद बख़ुद मुझ में से बाहर निकलने लग जाते है। वह बहुत सख्त थे इसके बावजूद मेरे सुधार को लेकर वह बेहद ईमानदार थे। आज मैं एक प्रतिष्ठित उच्च विद्यालय में अंग्रेज़ी पढ़ाता हूँ अलबत्ता मैं आबिद सर की तरह बच्चों की पिटाई नहीं करता।

तीन कहानियां बताती हैं कि हमारे जीवन में शिक्षक कितना प्रभावकारी हो सकते हैं। सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी एक शिक्षक थे जिन्होंने हजारों जीवन को प्रभावित किया होगा।

राधाकृष्णन दर्शनशास्त्र के शिक्षक थे और पहली बार 1 9 0 9 में मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज में दर्शन विभाग के लिए नियुक्त किए गए। 1 9 18 में, उन्हें मैसूर विश्वविद्यालय द्वारा दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में चुना गया, जहां उन्होंने महाराजा कॉलेज, मैसूर में पढ़ाया। उन्होंने अपनी पहली पुस्तक “द फिलॉसफी ऑफ़ रबींद्रनाथ टैगोर” लिखी। उनका मानना ​​था कि टैगोर का दर्शन “भारतीय मानस को सही ढंग से अभिव्यक्त करती” है। उनकी दूसरी पुस्तक, द रेन ऑफ़ रिलिजन इन कंटेम्पररी फिलॉसफी, 1920 में प्रकाशित हुई थी।

एक शिक्षक के तौर पर, उनके शिष्य उन्हें बहुत प्यार करते थे। बीएचयू प्रोफेसर ए.के. बनर्जी लिखते हैं कि जब वह कलकत्ता विश्वविद्यालय छोड़ रहे थे तो उनके प्रस्थान के दौरान उनके घोड़ा गाड़ी को घोड़ों के बजाय उनके विद्यार्थी खिंच रहे थे और पूरे प्लेटफ़ॉर्म पर लोग “राधाकृष्णन की जय” कह रहे थे। बतौर शिक्षक उनमें इतनी सादगी थी कि बनर्जी लिखते हैं कि जब वे मैसूर में अपने निवास पर छात्रों को पढ़ाया करते थे तो वे छात्रों का स्वयं अभिवादन करते थे, चाय की पेशकश करते थे और दरवाजे पर उन्हें छोड़ने भी जाते थे। वह अपने हर विद्यार्थी से हाथ मिलाते थे।

“भारत का विशेष सौभाग्य था कि महान दार्शनिक, महान शिक्षाविद् और महान मानवतावादी राधाकृष्णन भारत के राष्ट्रपति बने। यह बताता है कि हम कैसे लोगों को मान और सम्मान देते हैं,” जवाहर लाल नेहरू ने उनके बारे में लिखा था।

शायर ने सही ही कहा है कि-

रहबर भी ये हमदम भी ये ग़म-ख़्वार (समर्थक) हमारे

उस्ताद ये क़ौमों के हैं मे’मार (निर्माता) हमारे

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