वो सत्रह लड़कियां…: कर्नल की डायरी – पन्ना 5




रंगून के दिनों की याद आज भी रोमांच से भर जाती है. आज़ाद हिन्द फ़ौज में भर्ती होने वालों का तांता लग गया था. हज़ारों युवक-युवतियों ने अपनी जिंदगी आज़ाद हिन्द फ़ौज को सौंप देने के का जो फैसला किया था वह आज़ादी की दीवानगी का एकदम नया अंदाज़ था. रंगून का वह ‘जुबली हॉल’ अपने सिर पर कफ़न बांधे लोगों से ठसा ठस भरा हुआ था. मेरे ख्याल से रंगून की सरज़मी ने इससे पहले ऐसा मंज़र कभी नहीं देखा होगा.

उस दिन नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ‘जुबली हॉल’ में ख़ास मकसद से आने वाले थे. उनके आने का इंतज़ार सभी बड़ी बेताबी से कर रहे थे. उपस्थित लोगों की बेक़रार निगाहें बार बार प्रवेश द्वार की ओर उठ जाती थीं.

मुझे याद है, नेताजी के आते ही ‘नेताजी ज़िंदाबाद’ और ‘जय हिन्द’ के नारों से आसमान गूंजने लगा था. लोगों द्वारा किए गए इस पुरजोर स्वागत ने यह साबित कर दिया था कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का मकसद और मिशन बहुत ही महान है. नेताजी ने उस सभा को संबोधित करते हुए कहा था,

“स्वतंत्रता बलिदान चाहती है. आप लोगों ने आज़ादी के लिए बहुत त्याग किया है, किन्तु अभी प्राणों की आहुति देना बाक़ी है. हमें ऐसे नवयुवकों की आवश्यकता है जो अपने हाथों से अपना सर काट कर स्वाधीनता के लिए न्योछावर कर सकें.”

और अंत में उनहोंने गरजती हुई आवाज़ में वह ऐतिहासिक ऐलान किया था,

“तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा.”

नेताजी की इस बुलंद आवाज़ ने पूरे माहौल को एक अजब जूनून से भर दिया था. हर नौजवान उनके इस आह्वान पर अपनी कुर्बानी देने के लिए बेताब हो उठा था. ‘जुबली हॉल’ में हजारों नौजवान स्वर उस ऐतिहासिक आह्वान पर गूँज उठे

“हम अपना खून देंगे.”

सोचता हूँ वे दिन, वह वक़्त, वह जोश, वह जूनून अब क्यों नहीं? अचानक ऐसा हुआ कि आज़ाद मुल्क की जवानी इस क़दर कठुआ गयी है.

सुभाष बाबू ने ‘जुबली हॉल’ में उपस्थित उन नौजवानों के आगे एक प्रतिज्ञा-पत्र बढ़ाते हुए कहा था,

“आप लोग इस प्रतिज्ञा-पत्र पर हस्ताक्षर कीजिए.”

जोश से भरे वे नौजवान अचानक सहम गए. एक पल के लिए पूरा माहौल सन्नाटे में डूब गया. लगा यह क्षण सहसा ठहर गया हो और संपूर्ण स्पंदन रूक गया हो. लेकिन दृढनिश्चयी युवकों का एक जत्था पशोपेश की इस स्थिति से उबर चुका था. वे युवक आगे बढे. उन्हें आगे बढ़ता हुआ देख नेताजी का चुनौती भरा स्वर ‘जुबली हॉल’ में गूंजा था.

“इस प्रतिज्ञा-पत्र पर साधारण स्याही से हस्ताक्षर नहीं करना है. जिनकी नसों में सच्चा भारतीय खून बहता हो, जिसे अपने प्राणों का मोह न हो और जो आज़ादी के लिए सर्वस्व लुटाने को तैयार हो सिर्फ वही आगे आए.”

नेताजी के हर आदेश को सर आँखों पर लेने के लिए जैसे लोग तैयार हो चुके थे. मुझे अच्छी तरह याद है उस प्रतिज्ञा-पत्र पर दस्तखत करने के लिए जो पहला जत्था सामने आया उसमें सत्रह लड़कियां थीं. वह बेहद हैरत-अंगेज़ लम्हा था. देखते ही देखते उन लड़कियों ने अपनी कमर में खोंसी हुई छुरियां निकालकर अपनी उँगलियां चीर दी थी और वह प्रतिज्ञा पत्र उनके खून के दस्तखत से रंग गया था.

हाँ, वह भी एक ऐतिहासिक दिन था. आज भी उन लड़कियों की दिलेरी आँखों में उतर जाती है. सोचता हूँ, खुदारा! मादरे वतन की आज़ादी का वह जुनून और वह पाक जज़्बा अब हमें क्यों नहीं रहा? परायी धरती पर उन बहादुर लड़कियों की मादरे वतन के लिए कुर्बानी का जज्बा देखकर मुझे यक़ीन आ गया था कि हमारे मुल्क को गुलामी के जंजीरों से जकड़ने वाली ताक़त को नेस्तनाबूद होने से कोई नहीं रोक सकेगा!

 

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