जिन्हें रमज़ान में वोट नहीं देना वह इस रमज़ान स्विटज़रलैंड चले जाएं




रमज़ान के दौरान मजदूर अपना उपवास तोड़ते हुए

-मोहम्मद मंसूर आलम

आज से लगभग दस साल पहले की बात है. मैं पटना में एक रिक्शे पर सवार होने के लिए रिक्शे वाले से अपने गंतव्य स्थान जाने को पूछा. उसने बड़ी बेरुखी से कहा कि इतना लूँगा जो मुझे बहुत अटपटा लगा. इसपर मैंने उसे कुछ कह दिया जो रिक्शे वाले को बुरा लगा. मुझे लगा कि वह ज्यादा पैसे मांग रहा है जो अक्सर हम जैसों को लगता है जिन्हें अपना प्लास्टिक कार्ड मॉल के किसी बड़े स्टोर के केशियर को देने में अभिमान का एहसास होता है. मेरी खीझ के बाद उस रिक्शे वाले ने मुझे बिठाने से मना कर दिया. मैं भी अपने अभिमान में चूर था. सो प्रजातंत्र का ख्याल ही नहीं रहा और ज़मींदारी राज के जमाने वाले किसी ज़मींदार बाबू की तरह रिक्शे पर बैठ गया. रिक्शा वाला भी हलवाहे की तरह मेरा बोझ लेकर चलना शुरू कर दिया. जब इसे एहसास हो गया कि जिस ज़मींदार का बोझ वह उठा रहा है वह कोई मुसलमान ही है तो थोड़ी ही दूर चला था कि उस रिक्शे वाले ने कहा कि वह रोज़े में है और अल्लाह इस अपमान का बदला लेगा. मैं उस रोज़ बहुत शर्मिंदा हुआ. आम तौर पर मेरा यह घिनौना कृत्य मेरी प्रवृत्ति के बिलकुल खिलाफ था. उस दिन मैं ने भी उपवास रखा हुआ था. उस दिन के बाद आज तक मैंने किसी रिक्शे वाले से कोई मोल जोल नहीं किया.

इस प्रसंग को लिखने का तात्पर्य दो ऐसे नेता हैं जिन्होंने रमज़ान में चुनाव होने की बात को कह कर मुसलमानों के इस आध्यात्मिक महीने का मज़ाक़ उड़ाया है.

क्या है मामला?

आम आदमी पार्टी के नेता अमानतुल्लाह खान और कोलकाता के मेयर और तृणमूल कांग्रेस के नेता फिरहाद हकीम ने चुनाव आयोग के निणर्य पर सवाल उठाया है. इन दोनों ने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा रमज़ान में मतदान रखकर मुसलमानों के मतदान की संख्या को घटाने की साज़िश की गयी हैं.

इस पर AIMIM के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि जब मुसलमान रमज़ान में काम करते हैं तो वह वोट क्यों नहीं कर सकते. ओवैसी ने सही कहा.

रमज़ान का महिना क्या है?

सबसे पहले तो इन दो नेताओं को यह जानना चाहिए कि रमज़ान कोई त्यौहार नहीं है. रमज़ान मुसलामानों का एक आध्यात्मिक महिना है जिसमें मुसलमान सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक बिना खाना पानी के उपवास रखते हैं. यह महिना पूरी तरह से आध्यात्म का है जिसमें मुसलमान आवश्यक तौर पर दान करते हैं और बुरे कामों से बचते हैं हालांकि इस्लाम में सालो भर बुरे कामों से बचने की हिदायत की गयी है लेकिन इस महीने मुसलमान इस बात का ख़ास ख्याल रखते हैं कि अगर वह व्यापारी हैं तो कम न तौलें, सूदखोर हैं तो सूद का धंधा बंद कर दें, बाबू हैं तो रिश्वत न लें और यह होता भी है जिसका मैं खुद प्रमाण हूँ. संजय दत्त अभिनीत फिल्म ‘मैंने दिल तुझको दिया’ में तो संजय दत्त बतौर मुसलमान कॉन्ट्रैक्ट किलर ने रमज़ान में एक हत्या को स्थगित कर रखा था. ऐसा समाज में भी कहीं न कहीं होता ही होगा जिसे फिल्म में दर्शाया गया.

लेकिन इन सब से इतर, रमज़ान में मुसलमानों की दिनचर्या में कोई फर्क नहीं पड़ता. मजदूर अपनी मजदूरी करता है, कूली दूसरों का बोझ उठाता है, महिलाएं घरों में मर्दों के लिए पकवान तैयार करती है. डॉक्टर अपनी डॉक्टरी करता है, पुलिस ऑफिसर ज्यादा शिद्दत के साथ बुरे काम करने वालों को पकड़ता है. मैं अपने ऑफिस में अपने क्यूबिकल में बैठकर अपनी घड़ी देखकर उपवास तोड़ता था. मेरे जैसे लाखों ऐसे हैं जो ऐसा ही करते हैं.

कैराना एक उदाहरण

उत्तर प्रदेश में हुआ इस बार का उपचुनाव रमज़ान में ही पड़ा था. मुसलमानों ने सामान्य तौर पर वोट किया जैसे वह वोट करते हैं. मजे की बात यह कि हिन्दुओं ने मुस्लिम वोटरों को लाइन में अपनी जगह दी और उन्हें वोट देने में प्राथमिकता दी. यह भारत की सुन्दरता है. मैंने खुद अपने हिन्दू दोस्तों के घरों में कई बार अपना उपवास तोड़ा है और अपने घर से ज्यादा लज़ीज़ नाश्ता यानी ब्रेकफास्ट किया है. रमज़ान में हमारा ब्रेकफ़ास्ट यानि नाश्ता सूर्यास्त के बाद ही होता है.

चुनाव आयोग से अपील

इस बार रमज़ान में राजनैतिक पार्टियों द्वारा इफ्तार का आयोजन रोकें. सामाजिक संगठनों पर भी नकेल कसें कि वह ऐसे आयोजन चुनाव के दौरान न करें. राजनितिक पार्टियों से चंदे लेकर भी खूब इफ्तार पार्टी होती है. यह बंद होना चाहिए.

मेरी अपनी राय

मैं चेन स्मोकर हूँ लेकिन उपवास के दौरान मुझे सिगरेट पीने की तलब नहीं होती. इससे मेरे फेफड़े में रमज़ान में कम धुंआ जाता है और यह साल भर मेरे फेफड़े के नुकसान की भरपाई करता है. मेरे लिए इस रमज़ान लाइन में खड़े होकर वोट देना आसान होगा. बाक़ी जिन्हें समस्या है वह स्विटज़रलैंड चले जाएं जहाँ आपको रमज़ान में कम से कम प्यास का तो आभास नहीं ही होगा. पाकिस्तान जाने का हवाला नहीं दे सकता क्योंकि वहां भेजने का लाइसेंस आरएसएस के पास है. जिन्हें देश से प्यार है वह उस रोज़ ज़रूर आएँगे क्योंकि हमारे पास यही पहला और आखरी साधन है जिसके माध्यम से हम ऐसा नेता चुन सकते हैं जो मेरे देश और मेरे समाज के लिए हितकर होगा.

(ये लेखक के अपने विचार हैं.)




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