भाजपा में वंशवाद का सच




-मोहम्मद मनसूर आलम

आज भाजपा में कांग्रेस से ज़्यादा वंशवाद है लेकिन इनके पोस्टर बॉय नरेंद्र मोदी हैं और दूसरी ओर जनता को दिखाने के लिए इनके पास गांधी परिवार है. भाजपा बहुत ही शातिर थिंक टैंक यानि आरएसएस का हिस्सा है. यह आदर्श के तौर पर ऐसे को ही चुनती है और उसका प्रचार करती है और दुश्मन भी वैसी ही चुनती है जिस पर वह आँख मूँद कर प्रहार कर सके. इसने अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी को इसलिए चुना ताकि उन्हें आदर्श बना कर पेश किया जा सके. और उसने दुश्मन के तौर पर गांधी परिवार को इसलिए चुना क्योंकि उन्हें वह जनता के सामने वंशवाद का विलेन बना कर पेश कर सके. जनता यह समझे कि भाजपा का मतलब केवल नरेंद्र मोदी नहीं है और न ही कांग्रेस का मतलब केवल गांधी परिवार है.

अक्सर भाजपा नेताओं के पास एक ही तर्क होता है कि कांग्रेस बाप दादाओं की पार्टी है यानी वंशवादी पार्टी है इस पर सामाजिक कार्यकर्त्ता किशोर सिंह कहते हैं कि भाजपा के बाप दादाओं ने कोई ऐसा काम ही नहीं किया था कि वह अब तक यह बाप दादाओं की पार्टी बन सकती. लेकिन सत्ता में आने के बाद यह तेज़ी से बाप दादाओं की पार्टी बनती जा रही है. उनहोंने कई उदाहरण दिए जिसका विवरण नीचे है. वह कहते हैं कि भाजपा को आज ही अवसर मिले हैं यानि जहाँ भाजपा सत्ता में पहले से है वहां तीसरी पीढ़ी राजनीति में है और अवसर मिलेगा तो चौथी पीढ़ी भी राजनीति करेगी.

इसी तरह वह कहते हैं कि भाजपा के तीन साथी शुद्ध रूप से पारिवारिक पार्टी है जिनमें शिव सेना, अकाली दल और लोजपा है. इस बार बिहार से लोक सभा के 6 सीटों पर 3 सीटों पर राम विलास पासवान के अपने ही लोग चुनाव लड़ रहे हैं और राम विलास को राज्य सभा भेजे जाने की तैयारी है. इसलिए आप यह नहीं कह सकते कि भाजपा बाप दादाओं की पार्टी नहीं है. भाजपा हमेशा से ही बाप दादाओं की पार्टी ही होती अगर इसे अवसर मिलता.

वह आगे कहते हैं कि चूंकि देश की आज़ादी में कांग्रेस का ही पूरा योगदान रहा इसलिए उसी पार्टी को सत्ता का अवसर मिला और उसी पार्टी के कुछ लोगों के बेटे राजनीति में वारिस के तौर पर आएं. जनसंघ और भाजपा को बाप दादाओं की पार्टी बनने का अवसर कहाँ मिला?. उनका कहना है कि क्या भाजपा से अटल विहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के अलावा भी कोई राजनीती में 1990 तक सफल रहा? और जो दोनों नेता सफल रहे उनमें एक ने तो शादी ही नहीं की. हालांकि अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे तब पीएमओ को अप्रत्यक्ष तौर पर उनका दत्तक दामाद रंजन भट्टाचार्य ही चला रहा था जो उनके महिला मित्र का दामाद था जिनकी बेटी को वाजपेयी ने कथित तौर से गोद लिया हुआ था. इस सच की भी हकीकत आपको शोध करने पर पता चल जाएगा.

सिंह कहते हैं कि शिव सेना तो आरएसएस विचारधारा वाली पार्टी ही है. कुछ मामलों में तो वह भाजपा से ज्यादा हिदुत्ववादी और कट्टरवादी लगती है. जो काम नरेंद्र मोदी के काल में मुसलमानों के साथ हुआ वहीँ बाल ठाकरे के समय में महाराष्ट्र में हुआ. बड़े दंगे हुए. अल्पसंख्यक को हाशिए पर भेजने का काम हुआ. उस पार्टी की आज तीसरी पीढ़ी राजनीति में है.

उनका कहना यह भी है कि ऐसा नहीं कि जिन भाजपाइयों के बेटे और पोते राजनीति में नहीं हैं वह राजनीति का हिस्सा नहीं हैं और इसका लाभ उन्हें नहीं मिल रहा है. अमित शाह का मामला देख लीजिए. जय शाह की कंपनी ने राजनीति का भरपूर लाभ उठाया. अजित डोवाल के बेटे राजनीति का लाभ ले रहे हैं. कई भाजपा नेताओं के बेटे और बेटी राजनीति का लाभ ले रहे हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एमपी और एमएलए बनकर ही वंशवाद का ढिंढोरा पीटा जाए.

किशोर कहते हैं कि भाजपा बहुत ही शातिर थिंक टैंक यानि आरएसएस का हिस्सा है. यह आदर्श के तौर पर ऐसे को ही चुनती है और उसका प्रचार करती है और दुश्मन भी वैसी चुनती है. इसने अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी को इसलिए चुना ताकि उन्हें आदर्श बना कर पेश किया जा सके. और उसने दुश्मन के तौर पर गांधी परिवार को इसलिए चुना क्योंकि उन्हें वह जनता के सामने वंशवाद का विलेन बना कर पेश कर सके. हालांकि न भाजपा का मतलब मोदी हैं और न हो कांग्रेस का मतलब गाँधी परिवार हैं.

वह आगे कहते हैं कि गांधी परिवार का योगदान अगर आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद देखें तो उनके बराबर में आरएसएस और भाजपा का कोई भी परिवार नहीं आता. राहुल गांधी जो आज कांग्रेस अध्यक्ष हैं ने अपने पिता और दादी को खोया. क्या इस बलिदान के आस पास भी भाजपा का कोई नेता पहुंचता है?

परिवारवाद को सिंह ज़हर मानते हैं. उनका कहना है कि परिवारवाद से निपुण लोगों का अधिकार हनन होता है लेकिन जनता भी परिवारवाद को ही प्रोत्साहन देती है. भारत में कितने स्वतंत्र उम्मीदवार जीतते हैं? वह कहते हैं इस लोकतंत्र में भी वसुंधरा राजे और उनकी बहन यशोधरा राजे आज भी राजमाता हैं. मीडिया भी उन्हें राजमाता कहते नहीं थकती. YouTube पर सैकड़ो वीडियो उन्हें राजमाता कहते हुए मिल जाएगा और उसी राजमाता के लेबल के साथ उनहोंने राजस्थान में राज किया. क्या जनता को यह पता है कि उस राजघराने ने आज़ादी की लड़ाई में क्या योगदान दिया?

भाजपाई वंशवाद के कुछ नमूने

ठाकुर प्रसाद – रविशंकर प्रसाद – आदित्य शंकर (बाप-बेटा-पोता)

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद भी सियासी विरासत का आज मज़ा ले रहे हैं. उनके पिता ठाकुर प्रसाद जनसंघ के बड़े नेताओं में शुमार थे. वे बिहार में संयुक्त विधायक दल की सरकार में मंत्री रहे थे. लेकिन, रविशंकर प्रसाद कांग्रेस को बाप-दादाओं की पार्टी कहते रहते हैं जबकि वह खुद अपने बाप की पार्टी में ही है. रवि शंकर प्रसाद के बेटे आदित्य शंकर भी भाजपा से जुड़े हैं. हालांकि उनहोंने चुनावी राजनीति नहीं की लेकिन वह सत्ता की मलाई से दूर नहीं हैं. वह सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता हैं और भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा लॉ समिति के राष्ट्रीय को-इंचार्ज हैं. शंकर Kaden Borris जैसी अंतर्राष्ट्रीय लॉ कंपनी के भारत में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद मैनेजिंग पार्टनर बनाए गए हैं. मौक़ा मिला तो बाप की विरासत संभालेंगे.

कल्याण सिंह – राजवीर सिंह – प्रेमलता – संदीप सिंह (बाप-बेटा-बहु-नाती)

भाजपा के कद्दावर नेता रहे कल्याण सिंह अभी राजस्थान के राज्यपाल हैं. उनके बेटे राजवीर सिंह एटा से भाजपा सांसद हैं. उनकी बहू भी राजनीति में सक्रिय हैं और चुनाव लड़ चुकी हैं. कल्याण सिंह के नाती संदीप सिंह भी विधायक हैं.

विजयाराजे सिंधिया – वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे – दुष्यंत सिंह (माँ-बेटियां-नाती)

विजयाराजे सिंधिया की बेटियां वसुंधरा और यशोधरा राजनीति में हैं. वसुंधरा राजे दूसरी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर हैं. उनकी बहन यशोधरा राजे मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री हैं. वसुंधरा के बेटे दुष्यंत सिंह भाजपा सांसद हैं.

प्रमोद महाजन – पूनम महाजन (बाप-बेटी)

प्रमोद महाजन भाजपा के वह कद्दावर नेता थे जिन्होंने पूरा राम मंदिर रथ यात्रा अभियान का नक्शा खिंचा था. राज्य सभा के सांसद रहे प्रमोद वाजपेयी सरकार में टेलीकम्यूनिकेशन मिनिस्टर और पार्लिमेंटरी अफेयर्स मिनिस्टर भी थे. उनके सहोदर भाई द्वारा उनकी हत्या के बाद पहले उनके बेटे को भाजपा ने लांच करने की कोशिश की लेकिन वह ड्रग्स और कई मामले में बदनाम होने के बाद उसे हटाकर पूनम महाजन को लाया गया. पूनम महाजन भाजपा की सांसद हैं.

गोपीनाथ मुंडे – पंकजा मुंडे और प्रीतम मुंडे (बाप-बेटियां)

महाराष्ट्र के कद्दावर नेता गोपीनाथ मुंडे की सड़क दुर्घटना में मौत या अफवाह की मानें तो हत्या होने के बाद उनकी दोनों बेटियों पंकज मुंडे और प्रीतम मुंडे भाजपा में हैं. प्रीतम मुंडे को उप-चुनाव में गोपीनाथ की ही सीट बीड (Beed) दी गयी जहाँ से वह भरी मतों से जीतीं. पंकजा मुंडे महाराष्ट्र की भाजपा सरकार में मंत्री हैं.

वेद प्रकाश गोयल – पीयूष गोयल (बाप-बेटा)

केंद्र सरकार में मंत्री पीयूष गोयल के पिता वेद प्रकाश गोयल अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री थे.

राजनाथ सिंह – पंकज सिंह (बाप-बेटे)

केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह भाजपा से विधायक हैं.

रीता बहुगुणा जोशी – विजय बहुगुणा (भाई-बहन)

रीता बहुगुणा हालांकि कांग्रेस से आई हैं जहाँ बहुगुणा परिवार कद्दावर रहा है. भाजपा में आने के बाद वह उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में मंत्री हैं. उत्तराखंड में मुख्यमंत्री रह चुके रीता बहुगुणा के भाई विजय बहुगुणा भी फिलहाल भाजपा में हैं.

रमन सिंह – अभिषेक सिंघ (बाप-बेटा)

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह राजनीति में हैं.

प्रेम कुमार धूमल – अनुराग ठाकुर (बाप-बेटा)

प्रेम कुमार धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर युवा भाजपा के कद्दावर नेता गिने जाते हैं.

बृजभूषण शरण सिंह – प्रतीक भूषण (बाप-बेटा)

उत्तर प्रदेश में सांसद बृजभूषण शरण सिंह के पुत्र प्रतीक भूषण इस बार चुनाव लड़कर विधायक बने हैं जिनकी चुनावी सभा में नरेंद्र मोदी खुद प्रचार करने गए थे.

दिलीप सिंह भूरिया – निर्मला भूरिया (बाप-बेटी)

निर्मला भूरिया मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रही हैं. वह भाजपा के कद्दावर जनजातीय नेता दिलीप सिंह भूरिया की बेटी हैं.

इसी तरह कई सारे उदाहरण हैं. दिल्ली भाजपा के नेता साहिब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश वर्मा भाजपा में हैं.

बिहार में लालू को परिवारवाद के लिए कोसा जाता रहा है, लेकिन उसी बिहार में पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा के तीन सांसद पुत्रों को टिकट दिया. डॉ. सीपी ठाकुर के पुत्र विवेक ठाकुर, अश्विनी चौबे के पुत्र अर्जित शाश्वत और हुकुमदेव नारायण यादव के पुत्र अशोक कुमार यादव को बिहार विधानसभा में चुनाव में उतारा गया. चारा घोटाले में दोषी ठहराए जा चुके जगन्नाथ मिश्र के बेटे नितीश मिश्र भी भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े.

किशोर कहते हैं कि अगर आज कांग्रेस नहीं होती और सत्ता आज़ादी के बाद भाजपा वाली विचारधारा के हाथों आ जाती तो आज लोक तंत्र का यह स्वरूप ही नहीं होता. इस देश पर सिंधिया जैसे घराने ही राज कर रहे होते. आज जो नरेंद्र मोदी सीना ठोक कर कहते हैं कि वह चाय वाले से प्रधानमंत्री बने हैं वह कांग्रेस की ही देन है. हिंदुत्व में तो लोकतंत्र का विचार ही नहीं है.

वह कहते हैं कि आज भाजपा में कांग्रेस से ज़्यादा वंशवाद है लेकिन इनके पोस्टर बॉय नरेंद्र मोदी हैं और दूसरी ओर जनता को दिखाने के लिए इनके पास गांधी परिवार है. जनता नरेंद्र मोदी को देखती है वह नरेंद्र मोदी के पीछे राज सत्ता चलाने वालों का चेहरा नहीं देखती. जनता यह समझे कि भाजपा का मतलब नरेंद्र मोदी नहीं है और न ही कांग्रेस का मतलब गांधी परिवार है.

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