जैन मुनि तरुण सागर की नग्न शव यात्रा का सच




जैन मुनि तरुण सागर की शव यात्रा का चित्र (साभार: फेसबुक)

जैन मुनि तरुण सागर का निधन 1 सितम्बर को हुआ. जैन मुनि 51 साल के थे. उन्हें पीलिया था और वे नई दिल्ली के एक निजी अस्पताल में इलाजरत थे. उनका देहांत शाहदरा के कृष्णानगर में शनिवार सुबह को 3:18 बजे हो गया था. जैन मुनि ने अपना इलाज कराने से मना कर दिया था. जैन मुनि तरुण सागर का अंतिम संस्कार दोपहर 3 बजे दिल्ली मेरठ हाइवे स्थित तरुणसागरम तीर्थ पर हुआ. उनकी अंतिम यात्रा दिल्ली के राधेपुर से निकल कर 28 किमी दूर तरुणसागरम पर पहुंची.

जैन मुनि का जन्‍म मध्य प्रदेश के दमोह में 26 जून, 1967 को हुआ था. पिता का नाम प्रताप चंद्र और मां का नाम शांतिबाई था. जैन मुनि तरुण सागर ने आठ मार्च, 1981 को 14 वर्ष की आयु में ही घर छोड़ दिया और छत्तीसगढ़ में दीक्षा ली थी.

जैन मुनि तरुण सागर की अंतिम यात्रा को लेकर पिछले दो दिनों से सोशल मीडिया पर तमाम तरह की चर्चाएं चल रही हैं. खासकर जैन मुनि की देह को लकड़ी की डोली पर बिठाकर नग्न अवस्था में अंतिम यात्रा निकाले जाने पर तरह तरह की बात हो रही है. ऐसा वही लोग कह रहे हैं जो जैन समुदाय के बारे में नहीं जानते.

असल में, जैन धर्म में दो संप्रदाय हैं , दिगंबर और श्वेतांबर. दिगंबर संप्रदाय के जैन मुनि नग्न रहते हैं तो श्वेतांबर संप्रदाय के लोग श्वेत वस्त्र धारण करते हैं. जैन मुनि तरुण सागर दिगंबर संप्रदाय के जैन मुनि थे.

जैन धर्म में सन्यास लेकर मुनि बन जाने के बाद व्यक्ति का जीवन बेहद सादा और संतुलित हो जाता है, भोजन से लेकर अन्य दैनिक कार्य बेहद सीमित हो जाता है, यहाँ तक कि बिमारी या गंभीर बिमारी होने पर एलोपैथ या कोई अन्य दवाएँ ना लेकर यह कुछ विशेष प्राकृतिक जड़ी बूटी पर ही निर्भर रहते हैं।

जैन मुनि तरुण सागर लीवर की गंभीर बिमारी से जूझ रहे थे और आधुनिक या विभिन्न मेडिकल दवाईयों की बजाय कुछ विशेष जड़ी बूटियों पर ही निर्भर थे जिसके कारण उनको पीलिया इत्यादि की बीमारियों ने घेर लिया था।

अंत में उनके और उनके मुनि समाज द्वारा “सल्लेखना” का विकल्प चुन कर उनको मृत्यु दी गयी. “सल्लेखना” दर असल जैन धर्म की ही एक व्यवस्था है जिसे श्वेतांबर संप्रदाय में “संथारा” कहा जाता है.

यह मृत्यु को निकट जानकर अपनाये जाने वाली एक जैन प्रथा है. इसमें जब व्यक्ति को लगता है कि वह मौत के करीब है तो वह खुद मृत्यु तक खाना-पीना त्याग देता है और जैन मुनि तरुण सागर ने भी यही किया तथा लीवर की बिमारी से पीड़ित होकर “सल्लेखना” का विकल्प चुना और मृत्यु को प्राप्त किया.

जैन मुनियों की शवयात्रा को “विमान” कहा जाता है और उनके मृत शरीर को मंच पर बैठा कर “कलावा” से बाँधा जाता है तथा उनकी अंतिम यात्रा निकाली जाती है. जैन मुनियों के अंतिम संस्कार के लिए जो “चिता” बनाई जाती है वह लकड़ी की ना होकर “नारियल” की खाल या छिलके की होती है और उसी के ढेर पर जैनमुनि के मृत शरीर को बिठा कर उनका अंतिम संस्कार किया जाता है.

जैन मुनि जिस अवस्था में मृत्यु को प्राप्त करते हैं उसी अवस्था में ही उनका अंतिम संस्कार किया जाता है. जैन मान्यता यह है कि ऐसा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है.

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