राजद की हार और भविष्य में तेजस्वी की संभावनाएं




मुकेश सहनी (बाएँ), तेजस्वी यादव (बीच) और उपेन्द्र कुशवाहा (दाएं)
  प्रो. मोहमम्द सज्जाद

 

कम से कम बिहार के मामले में, बहुतों ने उम्मीद नहीं की होगी कि राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन को इस बुरी तरह मात मिलेगी कि वह चालीस सीट में से केवल एक सीट (किशनगंज में कांग्रेस) पर सिमट जाएगी. इतना ही नहीं, अधिकतर सीटों पर हार का अंतर भी बहुत ज्यादा रहा. राजद ने 19 सीटों पर चुनाव लड़ा जिनमें केवल दो सीट – जहानाबाद और पाटलिपुत्र (जहाँ लालू पुत्री डॉ मीसा भारती लड़ीं) पर ही हार का अंतर कम रहा.

मैंने राजद के पराजय की संभावनाओ का इशारा किया था और इसके पीछे के कारण का भी उल्लेख किया था.



राजद का गठबंधन में अरुचि

सबसे पहले, राजद ने गठबंधन बनाने में एक तरह की अनिच्छा दिखाई थी। यह अनिच्छा, उन आरोपों की विश्वसनीयता को बल देती है कि राजद गैर यादवों को अपने साथ मिलाने, दरियादिली और सत्ता में उनकी हिस्सेदारी और उनके साथ एक बड़े समाजिक गठबंधन को मज़बूत करने की भावना से उन तक अपनी पहुँच बनाने की इच्छुक है. राजद के कई “समझदार” शुभ चिन्तक इस बात को मान गए कि मुस्लिम और यादव के साथ गठबन्धन और सहयोगियों को मिलाकर अजूबा कर देंगे. वे सब कई अन्य कारकों के अलावा इस ज़मीनी हकीकत से भी अनजान रहे कि राजद से गैर-यादवों ख़ास कर अति पिछड़ा का पलायन हो रहा है. वे असल में डरे हुए थे कि कहीं फिर से यादव शासन वापस न अ जाएं. बहुसंख्यकवाद और राष्ट्रवाद के लालच ने उनके रिश्तों को एनडीए के साथ मज़बूत किया.

बहुत देरी के साथ, जब गठबंधन हुआ भी, तो यह शायद ही बहुत ज्यादा भरोसा दिलाने वाला (आशाजनक) रहा. RJD के नए सहयोगियों (RLSP, VIP, HAM) के पास कैडर-बेस नहीं था, और न ही उनके पास अपनी जातियों के वोटों को अपने सहयोगियों को स्थानांतरित करने की बहुत अधिक क्षमता थी। उनकी योग्यता काफी हद तक तभी ज्ञात हो चुकी थी जब वे हाल तक भाजपा के साथ थे। बाद में भाजपा के सुशील मोदी, बिहार के उपमुख्यमंत्री ने इसे स्वीकार भी किया था, जब उन्होंने टिप्पणी की कि उन्होंने तीनों को छोड़ दिया, केवल इसलिए कि उनके पास अपने वोट को स्थानांतरित करने की क्षमता नहीं थी।

नीतीश कुमार और आर. सी. पी. सिंह ने इन जातियों से संबंधित ब्लॉक और जिला स्तर के राजनीतिक कार्यकर्ताओं, विशेषकर कोइरी (कुशवाहा) के साथ मिलकर बहुत काम किया। बिहार के लोग इसे अच्छी तरह जानते थे। इस दिशा में नीतीश के प्रयास तब और तेज हो गए जब उपेंद्र कुशवाहा एनडीए से बाहर निकल गए।

विकाशशील इन्सान पार्टी (वीआईपी) के मुकेश साहनी के पास न कैडर है और न ही वह अपनी जाति, मल्लाह के निर्विवाद नेता हैं।

मुस्लिम और मल्लाह समीकरण

दूसरी बात कि आरजेडी का मूल आधार मुस्लिम है, जबकि बड़ी संख्या में मल्लाह लंबे समय से बजरंग दल में हैं, खासकर उत्तर बिहार में। मुजफ्फरपुर (जनवरी 2015), वैशाली का लालगंज (नवंबर 2015), सारण (अगस्त 2016) का सांप्रदायिक तनाव और हिंसा और ऐसे ही कुछ अन्य तनावों में मल्लाह की आक्रामकता देखी जा चुकी है। ग्रामीण उत्तर बिहार में, हाल के दशकों में, मल्लाह का उदय (अन्य रूप से अति पिछड़ा में सूचीबद्ध) न केवल उच्च जातियों के लिए बल्कि अन्य समूहों के लिए भी बहुत अधिक घबड़ाहट और चिंता का विषय रहा है।

अव्यक्त और व्यक्त सामाजिक संघर्षों के इस परिदृश्य में, मल्लाह का अपना राजनीतिक दल बनाना समाज के दुसरे समूहों के लिए अच्छा नहीं माना गया।

यह सच है कि मुजफ्फरपुर से भाजपा के मल्लाह उम्मीदवार अजय निषाद एक बार फिर चुने गए हैं। लेकिन अन्य प्रमुख जातियों को एक बार फिर से आश्वस्त किया गया कि अजय निषाद की लगाम भाजपा के शीर्ष नेतृत्व अपने काबू में रखेगा जो लंबे समय से उच्च जातियों का पसंदीदा विकल्प रहा है।

वीआईपी को दी जाने वाली मधुबनी सीट ने केवल मुसलमानों की मल्लाह के बारे में गलतफहमी को मजबूत ही किया। मधुबनी लोकसभा में लगभग 22% मुस्लिम हैं। पिछले कुछ चुनावों में इसका प्रतिनिधित्व कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवार ने किया है। (इससे पहले यहाँ से सीपीआई उम्मीदवार भी जीते हैं)।

2014 के लोकसभा चुनावों में, राजद के अब्दुल बारी सिद्दीकी 16000 वोटों के कम अंतर से हार गए थे। सबसे पहले, वीआईपी ने अपने मधुबनी सीट को एक विदित आरएसएस प्रचारक को आवंटित किया। बहुत हल्ला हंगामा के बाद इस सीट को दूसरे बनिया उम्मीदवार को दिया गया। वहां इस अफवाह का जोर रहा कि टिकट के बदले पार्टी प्रमुख को मोटी रक़म मिली है।

दरभंगा से कई बार चुने गए सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री अली अशरफ फ़ातमी जो राजद की हामी के बाद चुनाव के पहले कई महीने से चुनावी मुहीम में जुटे रहे का मामला राजद के अंदर निर्णय की कमी और विद्रोहियों से निपट पाने का एक और उदाहरण रहा. उनको टिकट भी नहीं दिया गया ऊपर से तेजस्वी ने यह बयान देकर कि दरभंगा, मधुबनी और कोई भी सीट किसी की बपौती नहीं उन्हें बेईज्ज़त भी किया. ये सब ठीक नहीं हुआ। इससे भी बुरा यह हुआ कि आलोचकों और असंतुष्टों का यह आरोप कि तेजस्वी अड़ियल हैं, इससे सच साबित हुआ। यह एक तरह से 2014 में रामकृपाल यादव के साथ लालू ने जो किया उसकी पुनरावृत्ति थी जो राजद को छोड़ कर बीजेपी में शामिल हो गए और पाटलिपुत्र से जीते भी। सिद्दीकी दरभंगा से लगभग 2.80 लाख से हार गए।

वीआईपी प्रमुख, मुकेश साहनी ने खुद खगड़िया में एलजेपी (एनडीए) के मुस्लिम उम्मीदवार महबूब क़ैसर के खिलाफ लड़ा।

न तो तेजस्वी और न ही स्वयं मुकेश साहनी ने मल्लाह समुदाय के बारे में इस तरह की गलतफहमी और भरोसे की कमी को दूर करने की कोशिश की।

जीतन मांझी के साथ गठबंधन भी ऐसी ही समस्या से दो चार रहा। गया में मतदान के दिन ही यह स्पष्ट हो गया जहाँ से जीतन से चुनाव लड़ रहे थे। इसी इलाके के एक स्थानीय भाषा के अख़बार के रिपोर्टर ने मुझे बताया कि मतदान के दिन जीतन मांझी बूथ को व्यवस्थित ही नहीं कर पाए. गया में बहुत सारे बूथों पर कोई हम का कार्यकर्ता ही नहीं था। न ही उसके पास सहयोगी पार्टी आरजेडी के कार्यकर्ता थे।



गठबंधन सहयोगियों के साथ ताल-मेल की कमी

सहयोगी दलों के शीर्ष नेतृत्व को एक साथ सार्वजनिक बैठकों को संबोधित करते हुए नहीं देखा गया, न ही वे एक साथ बड़े पैमाने पर जन संपर्क कर पाए। असल में, वे बहुत देर से जनसंपर्क में उतरे, और ज्यादातर, उन लोगों ने यह काम अलग अलग किया। इससे लोगों में यह संदेश गया कि सहयोगियों के बीच ताल-मेल की कमी है।

तेजस्वी अपनी तरफ से भी चुनावी अभियान में बहुत अधिक ऊर्जा नहीं दिखा सके। सप्ताह में लगभग दो बार, वह अभियानों से मुक्त हो कर आराम करते दिखे। उनकी तैयारी अधूरी थी और अधूरी है। पूरे बिहार में जिला और ब्लॉक स्तर पर युवा पार्टी कार्यकर्ताओं से उनका सीधा जुड़ाव नहीं है; अपने यादव कैडरों के साथ भी नहीं, अन्य सामाजिक समूहों के कैडरों को तो छोड़ ही दीजिए!

यहां तक कि अपने पिता के जेल को भी उनहोंने चुनावी मोहरा बहुत देर से (चुनाव के तीसरे चरण से) बनाया. जन संबोधनों में भी उनके शब्दों में वह जोर, जूनून और प्रभाव नहीं था जो होना चाहिए था. संवाद का तरीका बहुत कमज़ोर था. नीतीश कुमार के खिलाफ़ उनका पलटू चाचा वाला प्रहार और अपने चाचा के खिलाफ एक से अधिक ट्वीट का उन पर ही उल्टा असर हुआ.

अपने सुनने वालों को, तेजस्वी चारा घोटाले और श्रीजन घोटाले के बीच की समानता नहीं समझा पाए, इसके बावजूद कि नीतीश और सुशील मोदी सिस्टम द्वारा बचाए जा रहे हैं।

इसके अलावा, यह नई दिल्ली के लिए जनादेश था, जहां क्षेत्रीय मुद्दे ज्यादा प्रभाव नहीं डाल रहे थे। वह भी, अति-राष्ट्रवाद और मुस्लिम-विरोधी नफरत के परिदृश्य में, जब मोदी को एक और कार्यकाल देने के लिए हिंदू मतदाताओं की एक बड़ी संख्या ने पहले ही अपना मन बना लिया था! तेजस्वी को राहुल गांधी द्वारा उठाए गए मुद्दों को ही दोहराना चाहिए था, जैसे कि अर्थव्यवस्था पर मोदी की विफलताएं, बेरोजगारी, कृषि संकट, राफेल सौदा, पूंजीपतियों का पलायन, नफरत वाली हत्याएं, आदि. उन्हें और सभी क्षेत्रीय पार्टियों जो भाजपा का विरोध कर रहे थे इन सबको उन मुद्दों के साथ एक सूर में मिलकर विरोध करना चाहिए था.

गरीब सवर्णों के आरक्षण का विरोध

गरीब सवर्णों (EWS-Economic-Weaker Sections) के लिए 10% कोटा के खिलाफ RJD के विरोध ने भी इसे नुकसान पहुँचाया है। ओबीसी शायद ही इसके विरोध में थे। इसका कारण यह लगा कि सवर्णों के निरंतर प्रचार की वजह से प्रमुख ओबीसी वर्ग के अन्दर एक अपराधबोध के भाव परेशान कर रहे थे कि जो लोग बुद्धिमान और योग्य हैं उन्हें वह आरक्षण नहीं मिल पाया जिसके वह हक़दार है. उनहोंने संसद के अंदर इसका विरोध नहीं किया। सपा के अखिलेश यादव इसके खिलाफ नहीं बोले। ओबीसी के केवल कुछ स्पष्टवादी समूहों ने सोशल मीडिया पर इसके खिलाफ बात की।

घर से निकल कर सड़क पर लालू परिवार के झगड़े ने भी गठबंधन को कमज़ोर किया. परिवार से ही तीन तीन दावेदारों मीसा, तेजस्वी, तेजप्रताप की दावेदारी से पार्टी में दुसरे लोगों तक यह सन्देश ले गया कि बाक़ी के लिए शायद ही यहाँ कोई अवसर बचा है.

पप्पू यादव और कन्हैया कुमार से दूरी

बेगूसराय में भाकपा के साथ राजद का गठबंधन न करने और सीपीआई का पप्पू यादव के साथ तालमेल भी इसे महंगा पड़ा. यह बहुत हद तक प्रत्याशित था। सीपीआई का मधुबनी, मोतिहारी और गया में अपना वोट-बेस है। इसलिए, इस गठबंधन से महागठबंधन को लाभ हो सकता था। दोनों ही उम्मीदवारों को युवाओं के कुछ वर्गों के बीच लोकप्रिय माना जाता है।

कई सीटों पर टिकट-वितरण त्रुटिपूर्ण था। मगध क्षेत्र के एक गैर-राजनीतिक नौसिखिए को शिवहर में अचानक उतार दिया गया। इससे महागठबंधन के मतदाताओं में काफी रोष था। प्रो. रघुवंश प्रसाद सिंह कई उम्मीदवारों के आपस में टकराने के बावजूद 2014 में वैशाली से भारी मतों से हार गए थे। उनकी जाति, राजपूत का पहले ही बड़ा वोट उन्हें छोड़ कर एनडीए में चला गया। मुसलमान और यादव लंबे समय से रघुवंश से नाखुश थे। उनकी अप्रसन्नता कोई रहस्य भी नहीं था। 2014 में वैशाली में 46000 वोट स्वतंत्र मुस्लिम उम्मीदवारों के पास गए थे। कुछ मुस्लिम वोट जेडीयू, निर्दलीय उम्मीदवार अनु शुक्ला और लोजपा के रामाकिशोर सिंह को भी गए थे। संक्षेप में, 2014 में लगभग 50% मुस्लिम वोट रघुवंश के खिलाफ गए थे।

इसलिए राजद को रघुवंश को शिवहर में स्थानांतरित कर एक प्रयोग करना चाहिए था (1977-95 के दौरान, रघुवंश ने बेलसंड विधानसभा, शिवहर के एक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था)। बहुत ज्यादा अजीब नहीं कि 2019 में, रघुवंश वैशाली से लोजपा से 2.35 लाख से अधिक के अंतर से हार गए। विडंबना यह है कि विजेता एक दशक से भी अधिक समय तक उनका शिष्य रहा था।



सीट वितरण में गड़बड़ी

मुजफ्फरपुर किसी भूमिहार उम्मीदवार (कांग्रेस का) को दिया जाना चाहिए था, और वैशाली को वीआईपी के मल्लाह उम्मीदवार को दिया जाना चाहिए था। वैशाली में काफी मल्लाह आबादी है। 2014 में, जेडीयू के एक मल्लाह उम्मीदवार, विजय साहनी ने लगभग 1.5 लाख वोट हासिल किया था। [वास्तव में, बिहार में मल्लाह का राजनीतिक उदय पहले वैशाली से हुआ था, जब 1994 के उपचुनाव में कैप्टन जय नारायण निषाद ने अच्छा वोट हासिल किया था। यह देखकर, लालू ने उन्हें साथ लिया, और निषाद को 1996 में मुजफ्फरपुर से चुना गया। वह बाद में भाजपा में चले गए और कई बार मुजफ्फरपुर का प्रतिनिधित्व किया]।

राजद के कुछ निर्णयकर्ताओं को इन चीज़ों से अवगत कराया गया था। इन पर ध्यान नहीं दिया गया और राजद का नुकसान हुआ।

ऐसा अनुमान है कि कांग्रेस में भूमिहारों के वर्चस्व के कारण: (a) मुजफ्फरपुर वीआईपी (कांग्रेस के बजाय) को दिया गया; (b) मोतिहारी को आरएलएसपी को आवंटित किया गया (c) और आरएलएसपी टिकट कांग्रेस नेता अखिलेश सिंह के युवा बेटे को दिया गया, जो राजद के माध्यम से कांग्रेस में आए थे। उनका अभी तक लालू यादव के साथ अच्छा समन्वय है। आरोप है कि अखिलेश नहीं चाहते थे कि मुजफ्फरपुर में किसी अन्य स्थानीय भूमिहार को जगह मिले।

बड़ी संख्या में समर्थकों ने इन दोनों उम्मीदवारों (शिवहर से सैयद फैसल अली और मोतिहारी से आकाश सिंह) को नकार दिया था जिसकी खबर नेतृत्व को थी। स्थानीय पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों के प्रतिनिधिमंडल ने राजद नेतृत्व को अपनी नाराजगी पटना पहुँच कर बताई भी थी। स्थानीय हिंदी दैनिक समाचार पत्रों ने भी टिकटों के बेहद खराब बंटवारे को लेकर इस तरह के विरोध की ख़बरों को छापा। बेमन से, जब कुछ समर्थक महागठबंधन के साथ रहे भी, तो उन्होंने यह अनुभव किया कि शिवहर के राजद उम्मीदवार गर्मी में प्रचार करने के लिए तैयार नहीं थे। इस क्षेत्र का बड़े हिस्से में उनका कोई अभियान ही नहीं हुआ। शिवहर के रिगा विधानसभा क्षेत्र में तो राजद का कार्यालय मतदान के एक सप्ताह पहले अस्तित्व में आया। तब तक, इस अफवाह को बल मिल चूका था कि शिवहर में भाजपा उम्मीदवार की जीत को आसान बनाने के लिए राजद उम्मीदवार भाजपा द्वारा भेजा गया एक डमी उम्मीदवार है। मतदाताओं के बीच यह अफवाहें आम बात थी कि भाजपा ने ऐसी व्यवस्था के लिए बड़ी राशि दी है। मोतिहारी और शिवहर में भाजपा के अनुभवी नेताओं के सामने महागठबंधन ने अपने नौसिखियों और जिनका अस्तित्व ही नहीं था उन्हें मैदान में उतारा। इससे मतदाताओं के बीच महागठबंधन के बारे में गलत संदेश गया।

2020 में तेजस्वी की संभावनाओं के निहितार्थ

यह लालू के बिना राजद का पहला चुनाव था। तेजस्वी का नेतृत्व दांव पर है। जिस घटिया तरीके से राजद ने अपना गठबंधन बनाया और अपनी चुनावी व्यवस्था को गलत ढंग से संचालित किया, उससे अब यह पता चलता है कि तेजस्वी की रुचि अपने ही कई वरिष्ठ नेताओं का कद घटाकर और अपने सहयोगियों की सीट कम कर के अपना राजनीतिक कद बढ़ाने में था, और वह उम्मीदवार के चयन में अपना अड़ियलपन दिखा रहे थे, पहुँच से बाहर भी रह रहे थे और मूर्खतापूर्ण गलती कर रहे थे.

(a) पप्पू यादव को अलग करने, (b) राजद नेता को रंजीता (पप्पू के कांग्रेस प्रत्याशी और पप्पू की पत्नी) के खिलाफ वोट काटने की नियत से उतार कर गठबंधन को धता बताने जैसे कारकों के कारण यादवों का एक वर्ग पड़ोस की सीट, अररिया से राजद उम्मीदवार, सरफराज से अलग थलग हो गया। व्यक्तित्वों के टकराव और आपसी कलह से इन सभी सीटों पर हार का सामना करना पड़ा।

बिहार के चुनावों पर नज़र रखने वाले कई लोगों का यह मानना है कि तेजस्वी की अति महत्वाकांक्षी और 2020 में खुद को मुख्यमंत्री पद के लिए एक स्पष्ट विकल्प बनाने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए, उन्होंने गठबंधन के अपने सहयोगियों की सीटों में कटौती की और पप्पू यादव और कन्हैया जैसे संभावित प्रतिद्वंद्वियों का नुकसान किया। इन सब के कारण आगामी विधानसभा चुनावों में अब तेजस्वी की संभावनाएं ही मलिन हुई हैं।

क्या तेजस्वी ने इस पराजय से कुछ सबक सीखा है? यदि हाँ, तो वह अपने तरीके में कैसे सुधार करेंगे? समय ही बताएगा। उन्हें यह समझना आवश्यक है कि अब उनके लिए अपने सहयोगियों के साथ अधिक सीटों के लिए सौदेबाजी करना बहुत मुश्किल होगा। यादव युवाओं के कुछ वर्ग हिंदुत्व की तरफ प्रलोभित किए गए है। लंबे समय से राजद सत्ता से बाहर है। दरियादिली और सत्ता संरक्षण का अभाव आने वाले दिनों में राजद के समर्थन-आधार को और कम करेगा, क्योंकि भाजपा एक बड़े जनादेश के साथ नई दिल्ली में सत्ता में वापस आ गई है।



मधुबनी, शिवहर और मोतिहारी के उम्मीदवार के चयन के मुद्दों के अलावा कई मामलों में मुस्लिम युवा वर्ग पहले से ही तेजस्वी से नाराज हैं। जदयू और लोजपा द्वारा एक वर्ग को प्रलोभन भी दिया जा रहा है।

महत्वाकांक्षी समूहों की नई पीढ़ी, विशेष रूप से युवाओं को आरजेडी से बहुत आशा नहीं हैं, जिसकी पहचान कुशासन और विकास विरोधी के तौर पर ज्यादा है। नीतीश कुमार भले ही कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर बुरी तरह से विफल रहे हों, लेकिन प्रचार तंत्र अभी भी उन्हें सुशासन बाबू के रूप में प्रस्तुत करता है।

अभी से सत्रह महीने राजनीति में बहुत लंबा समय हैं जब बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में होने वाला है। फिर भी, आने वाले दिनों में तेजस्वी के लिए काफी मुश्किलें हैं।

(मोहम्मद सज्जाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर हैं और Muslim Politics in Bihar: Changing Contours (Routledge)और अन्य पुस्तकों के लेखक हैं. यह उनके अंग्रेजी आलेख का द मॉर्निंग क्रॉनिकल द्वारा अनूदित संस्करण है.)

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