यूपी में गठबंधन की बनती बिगड़ती रणनीति




नई दिल्ली : मायावती ने बुधवार की सुबह राजस्थान, मध्य प्रदेश में कांग्रेस के समर्थन का ऐलान किया, उसके आधे घंटे बाद ही अखिलेश का भी एमपी में समर्थन का ट्वीट आ गया। कांग्रेस भले ही भाजपा को हरा कर सत्ता पर काबिज हो रही है, लेकिन इस हार से भाजपा को कम बसपा और सपा को बड़ा झटका लगा है।

जीत के बाद एकाएक बढ़ा कांग्रेस का कद है। इससे पहले कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी तो थी, लेकिन यूपी में उसका शुमार चौथे नंबर की पार्टी के रूप में होता था। उसी हिसाब से राजनीतिक दल उसे तवज्जो देते थे। विपक्षी एकता के नाम पर कांग्रेस को बिना शर्त सपा-बसपा का समर्थन करना पड़ता था, लेकिन इस जीत ने यह गणित बदल दी। अब यूपी में कोई गठबंधन बनता है, तो उसमें दलों को कांग्रेस की शर्तों पर शामिल होना होगा।

यूपी के उपचुनावों में सपा, बसपा, कांग्रेस, रालोद की विपक्षी एकजुटता को मिली सफलता के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि 2019 के आगामी लोकसभा चुनाव में विपक्षी महागठबंधन देखने को मिलेगा। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी तो खुलकर विपक्षी महागठबंधन की पैराकारी करते दिख रहे हैं लेकिन सपा-बसपा की रणनीति में शायद कांग्रेस फिट नहीं बैठ रही थी। इसकी बानगी इस बात से समझी जा सकती है कि गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार के उतरने के बाद सपा-बसपा का तालमेल सामने आया।

इसी तरह फूलपुर और कैराना लोकसभा उपचुनाव और नूरपूर विधानसभा चुनावों में भी सपा-बसपा ने ही सियासी ताश के पत्ते फेंटे, कांग्रेस बिना मांगे उन्हें समर्थन देकर तमाशा देखना पड़ा। इसके बाद 10 सितंबर को कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने पेट्रोल-डीजल के मुद्दे पर ‘भारत बंद’ किया। यूपी सपा और बसपा ने न सिर्फ इससे दूरी बनाई, बल्कि मायावती ने भाजपा के साथ कांग्रेस को मनभर कोसा।

कहा, भाजपा और कांग्रेस एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। पांच राज्यों में चुनाव से पहले 4 अक्टूबर को मायावती ने कहा था कांग्रेस उनकी पार्टी को खत्म करने की साजिश रच रही है। अखिलेश भी कांग्रेस से दूरी बनाते दिखे।

विपक्षी एकता के नाम पर कांग्रेस को बिना शर्त सपा-बसपा का समर्थन करना पड़ता था, लेकिन इस जीत ने यह गणित बदल दी। अब यूपी में कोई गठबंधन बनता है, तो उसमें दलों को कांग्रेस की शर्तों पर शामिल होना होगा।




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