मोदी सरकार 2 का सवर्ण कैबिनेट




हालांकि मंत्री मंडल का विस्तार समय अनुकूल और राजनैतिक लाभ को देख कर किया जाता रहा है. लेकिन इस पहले मंत्री मंडल गठन से एक बात तो सिद्ध करने की आवश्यकता बिलकुल नहीं है कि भाजपा को जिस तरह से जाति से उठकर वोट देकर पिछड़े वर्ग ने समर्थन दिया उस अनुपात में उन्हें प्रतिनिधित्व के नाम पर फिलहाल छला ही गया है.

पोस्ट पोल सर्वेक्षण के अनुसार बिहार के 60% यादवों ने भाजपा को इस बार वोट किया, इसी तरह अन्य सभी पिछड़ी जातियों ने मोदी के चेहरे को देखते हुए जाति से उठ कर वोट किया. हालांकि मोदी ने अपने कैबिनेट में सभी जातियों को प्रतिनिधित्व दिया लेकिन 58 मंत्रियों की कैबिनेट में भारी बहुमत सवर्णों का रहा.

प्रधान मंत्री को मिलाकर 58 सीटों वाले कैबिनेट में 32 सीट सवर्णों को मिले हैं. अन्य पिछड़ी जाति से मात्र 13 लोगों को जगह मिली है जबकि भारत के जिन प्रान्तों में भाजपा को वोट मिला हैं वहां सबसे अधिक इन ही जातियों की आबादी है.

नितिन गडकरी को मिलाकर 9 ब्राह्मणों को, तीन राजपूतों को और और अन्य सवर्ण जातियों को शेष सीटें मिली हैं. राजपूत मंत्रियों में उत्तर प्रदेश के राजनाथ सिंह, मध्य प्रदेश के जोधपुर के सांसद गजेन्द्र सिंह ठाकुर और मोरेना के सांसद नरेन्द्र सिंह तोमर शामिल हैं.

अन्य पिछड़ी जाति में नरेन्द्र मोदी के अलावा एक मात्र चेहरा धर्मेन्द्र प्रधान का है.

बृहस्पतिवार को जिन 58 सांसदों ने मंत्री पद की शपथ ली उनमें मात्र छह दलित (अनुसूचित जाति) और चार अनुसूचित जनजाति के हैं और सभी झारखंड और ओडिशा से हैं. अकाली दल की नेत्री हरसिमरत कौर और भाजपा की हरदीप पूरी दो सिख जबकि मुख़्तार आबास नकवी अकेले मुसलमान मंत्री बनाए गए हैं.

विश्लेषकों के अनुसार, कैबिनेट में नौ ब्राह्मणों को लेना ब्राह्मण संप्रदाय को एक सन्देश देना है जो योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्य मंत्री बनाए जाने के बाद अंदर अंदर रूठे हुए थे. भाजपा के उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष महेंद्र नाथ पाण्डेय को कैबिनेट मंत्री बनाए जाने के पीछे भी यही कारण नज़र आता है.

कैबिनेट मंत्री के रूप में अर्जुन मुंडा को जगह देना भी झारखंड के जनजातीय समुदायों को खुश करने की कवायद लगाती है जहाँ अगले साल विधान सभा चुनाव होने वाला हैं और यहाँ के जनजातीय सीटों पर भाजपा ने अच्छी जीत हासिल की है. यहाँ के दुमका सीट से शिबू सोरेन को हराकर अपनी जीत दर्ज कराना भी इस बात को स्पष्ट करता है कि जनजातीय समुदायों ने भाजपा को एक जुट हो कर वोट किया है. अर्जुन मुंडा को कैबिनेट लेने के पीछे यहाँ के मुख्य मंत्री का गैर-जनजातीय होना भी एक फैक्टर नज़र आता है.

बिहार की बात करें तो तीन कैबिनेट मंत्रियों में दो सवर्ण हैं. बिहार से मात्र राम विलास पासवान ही दलित हैं. गिरिराज सिंह भूमिहार हैं जिनका प्रमोशन करके इस बार केन्द्रीय मंत्री मनाया गया है जबकि रवि शंकर प्रसाद कायस्थ हैं. गिरिराज सिंह को इस बार कैबिनेट मंत्री इसलिए बनाया गया है क्योंकि वह फायरब्रांड भूमिहार नेता हैं और बिहार में भूमिहार के ख़ास चेहरा हैं.

बिहार में कैबिनेट मंत्री मिलकर छह मंत्री बनाए गए हैं जिनमें पांच सवर्ण हैं. नित्यानंद राय एक मात्र यादव चेहरा हैं जिन्हें राम कृपाल यादव को हटा कर लाया गया है. आरा से आर के सिंह को स्वतंत्र प्रभार दिया गया है और अश्विनी कुमार चौबे का मंत्री पद बकरार रखा गया है.

बिहार से कोइरी और कुर्मी जाति को मंत्री सीट नहीं दिया गया है. जद (यू) को भी मंत्रिमंडल में पर्याप्त जगह न मिलने के कारण फिलहाल शामिल नहीं है. बिहार में अगले वर्ष चुनव होने वाला है ऐसे में जद (यू) के किसी सांसद को मंत्री मंडल में जगह न मिलना नितीश और मोदी के बीच की केमिस्ट्री में संशय पैदा करता है.

हालांकि मंत्री मंडल का विस्तार समय अनुकूल और राजनैतिक लाभ को देख कर किया जाता रहा है. लेकिन इस पहले मंत्री मंडल गठन से एक बात तो सिद्ध करने की आवश्यकता बिलकुल नहीं है कि भाजपा को जिस तरह से जाति से उठकर वोट देकर पिछड़े वर्ग ने समर्थन दिया उस अनुपात में उन्हें प्रतिनिधित्व के नाम पर फिलहाल छला ही गया है.

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