अगर तनिष्क का विज्ञापन रिवर्स होता तो क्या होता?




तनिष्क विज्ञापन से ली गयी तस्वीर

-मोहम्मद मंसूर आलम

सोशल मीडिया पर प्रेम पाखंडियों द्वारा यह सवाल पूछा जा रहा है कि अगर तनिष्क का विज्ञापन रिवर्स होता तो शबाना आज़मी क्या खुश होतीं या फिर जावेद अख्तर क्या कहते. बीबीसी हिंदी ने भी इस प्रश्न को अपने लेख में भाजपा आई टी सेल के एक कर्मचारी के हवाले से पूछा है.

तनिष्क के इस विज्ञापन का नफ़रत के इन दीवानों को जवाब देने के लिए मैंने सबसे पहले भाजपा नेता सय्यद शाहनवाज़ हुसैन और मुख़्तार अब्बास नकवी को फ़ोन किया. इत्तेफाक की बात कि दोनों ने मेरा फ़ोन नहीं उठाया. उठाते तो मैं पूछता कि जो आपकी ज़ात बिरादरी वाले डंडे लेकर तनिष्क के पीछे दौड़ रहे हैं वह आपसे खुश कैसे हैं? अगर आप दोनों मेरे इस आलेख को पढ़ रहे हैं तो इसका जवाब देने का कष्ट करेंगे. इसे एक नए आलेख के साथ छापूंगा.

 

लव जिहाद के नाम पर हिन्दू समाज के ठेकेदार द्वारा अपनी ही बहू बेटियों का अनादर करना इनकी परंपरा रही है. क्या हिन्दू बेटियों का इतना भी अधिकार नहीं कि वह अपना जीवन साथी अपनी पसंद का चुनें? हालांकि ऐसा विरले ही होता है लेकिन इसको इस तरह पेश किया जाता है जैसे इसे एक साजिश के तहत किया जा रहा है. हालांकि ऐसे कई विख्यात जोड़े हैं जिन्हें देखकर कहा जा सकता है कि यह आदर्श जोड़े हैं. शाहरुख़ खान और आमिर खान की पत्नियाँ आज भी हिन्दू रीति रिवाज का अनुसरण करती हैं. उनका नाम तक वही है. जबकि उनके ठीक उलट संजय दत्त की दूसरी पत्नी मान्यता दत्त मुस्लिम से हिन्दू बनीं. क्या आपने इस पर कोई शोर सुना? क्या संजय दत्त की फिल्मों पर प्रतिबंध के नारे लगे? नहीं लगे. सुनील दत्त साहब की बेगम भी मुस्लिम ही थीं. लेकिन बेचारे खान आज भी लव जिहादी हैं.

सर्फ एक्सेल के इस विज्ञापन से भी नफ़रत वादी हिन्दुओं को परहेज़ था

हिन्दू धर्म का पूरा ग्रन्थ ही प्रेम के आस पास विचरता है. महाभारत हो या रामायण स्त्री के खुलेपन को प्रोत्साहन देते हैं. श्री कृष्ण स्वयं अपनी बहन को अपने प्रिय साथी अर्जुन के साथ भागने में मदद करते हैं. श्री कृष्ण की राधा के साथ प्रेम लीला कौन नहीं जानता. एक आम आदमी राधा ही को कृष्ण की पत्नी समझता है. रुकमणी का नाम कम ही लोग जानते होंगे. उसी धर्म का अनुयायी बड़ी बेशर्मी के साथ प्रेम को घृणा बना कर पेश करता है. ऐसे लोग किसी धर्म के लोगों को निशाना नहीं बनाते बल्कि खुद अपनी बहनों और बेटियों को लेकर अविश्वास प्रकट करते हैं.

तनिष्क के विज्ञापन से पहले हिन्दू धर्म के इस विशेष बिरादरी को सर्फ एक्सेल के एक विज्ञापन से भी परेशानी थी. इन्हें उस विज्ञापन में दो बच्चों की दोस्ती पर भी परहेज़ था. उस विज्ञापन में यह दिखाया गया था कि एक छोटा सा लड़का होली के दिन जुमा की नमाज़ के लिए डरते डरते निकलता है. हालंकि उस विज्ञापन में बिना वजह ही डर दिखाया गया था. इस देश के लोग आज भी उतना ही सहनशील हैं जितना मुग़ल के जमाने में थे. आज भी किसी नमाज़ी और टोपी वाले के ऊपर कोई रंग नहीं डालता. न ही किसी नमाज़ी के ऊपर रंग पड़ने से वह नापाक हो जाता है. लेकिन विज्ञापन में ऐसा दिखाया गया था. यह क्रिएटिविटी की मजबूरी होती है कि उसमें फंतासी जोड़े जाएं. खैर, उसमें उस नमाज़ी लड़के को एक मासूम सी बच्ची अपनी साइकिल पर रंग से बचाकर मस्जिद ले जाती है. विज्ञापन में लड़की का धर्म सिर्फ इस बात पर आंक लिया गया कि उसके कपड़े होली के रंग में शराबोर थे.

अपने मित्र प्रवीण कुमार से जब मैंने पूछा कि आपको तनिष्क का विज्ञापन कैसा लगा? प्रवीण ने बताया कि इस विज्ञापन पर आपत्ति वह लोग कर रहे हैं जो हाथरस की बेटी के बलात्कारियों को बचाने के लिए सभाएं कर रहे हैं. प्रेमवश कोई भी विवाह आदर्श विवाह ही होता है.

वह कहते हैं कि किसी भी विवाह के लिए प्रेम ही आवश्यक है. अगर किसी विवाह में प्रेम न हो तो उसमें वैवाहिक संबंध के नाम पर जीवन भर केवल बलात्कार होता है. यह वही लोग हैं जो आज तक अपने समाज को जाति मुक्त नहीं कर पाए हैं. आज भी प्रेम से ज़्यादा इन घरों में कुंडलियाँ देख कर विवाह की जाती है.

प्रवीण से मैंने पूछा कि अगर तनिष्क या सर्फ एक्सेल के इस विज्ञापन को रिवर्स कर दिया जाता तो क्या होता? इस पर वह हँसते हुए जवाब देते हैं कि फिर मुद्दा ही नहीं होता. तनिष्क के विज्ञापन का विज्ञापन भी नहीं होता.

आगे कहते हैं कि आप मेरी कहानी छाप दीजिए. किसी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

प्रवीण कुमार की पत्नी मुस्लिम हैं. वह आरएसएस मानसिकता वाले लोगों द्वारा मिनी पाकिस्तान कहे जाने वाले एक मुस्लिम बस्ती में शान से रहते हैं. दिवाली भी मनाते हैं और ईद भी मनाते हैं. उनका किसी मुस्लिम महिला से शादी करना और मुस्लिम बस्ती के अंदर रहना कोई मुद्दा नहीं है.

(मोहम्मद मंसूर आलम शौकिया पत्रकार हैं. उनके विचार निजी हैं.)

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