मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत, या शेल्टर होम काण्ड अगर राजद या कांग्रेस की सरकार में हुआ होता तो क्या होता?




समीर भारती

आडवाणी की रथ यात्रा के बाद हमने भारत में विपक्ष का उग्र रूप देखा. इसकी शुरुआत हालांकि पहली बार इंदिरा गांधी के विरुद्ध जे पी आन्दोलन में देखा जब देश का बड़ा भाग इंदिरा के खिलाफ सड़कों पर था. अगुवाई कर रहे थे जय प्रकाश नारायण जो कभी इंदिरा के बेहद करीबी हुआ करते थे. इंदिरा के विरोध के कई कारण रहे होंगे लेकिन एक कहानी यह भी कही जाती है कि जेपी अब्दुल गफूर को बिहार का मुख्य मंत्री बनाए जाए के खिलाफ थे. जेपी आन्दोलन से जुड़े कुछ लोगों का यह भी कहना था कि कुछ सभाओ में अब्दुल गफूर के खिलाफ “गाय हमारी माता है, गफूरवा इसको खाता है” का नारा भी लगता था. हालांकि जन मुक्ति के संयोजक और जे पी के युवा साथी अशोक प्रियदर्शी इससे इनकार करते हैं कि ऐसा नारा भी लगता था. दूसरी तरफ जे पी आन्दोलन से जुड़े कुछ लोग कहते हैं कि दरअसल जे पी को इंदिरा से समस्या नहीं थी बल्कि उनकी समस्या किसी मुस्लिम को बिहार का मुख्य मंत्री बनाए जाने को लेकर थी. वह इसका तर्क भी देते हैं. उनका तर्क यह है कि जे पी ने इससे पहले भी एक बार आन्दोलन किया था जब बिहार का पहला प्रधानमंत्री (भारत के गणराज्य बनने से पहले बिहार के मुख्यमंत्री प्रधान मंत्री कहे जाते थे) बैरिस्टर मोहमम्द युनुस को बनाया गया था. जेपी ने तब मोहम्मद युनुस के फ्रेज़र रोड स्थित ग्रैंड अपार्टमेंट के सामने धरना प्रदर्शन किया था. दोनों ही बार जे पी आन्दोलन का यह असर हुआ कि बिहार के दोनों मुस्लिम प्रमुखों को अपनी सत्ता गंवानी पड़ी. उनका यह भी कहना है कि आरएसएस इंदिरा के कार्य से खुश थी. जिस तरह से इंदिरा ने पाकिस्तान के दो टुकड़े होने में मदद की थी इससे संघ को उनसे कोई समस्या नहीं थी. अगर अब्दुल गफूर को बिहार का मुख्य मंत्री नहीं बनाया गया होता को जानकारों का कहना है कि जे पी आन्दोलन का सवाल ही नहीं था.

इसके बाद मीडिया और विपक्ष ने मिलकर जो सबसे बड़ा आन्दोलन किया वह मंडल को कमंडल में बदलने को लेकर था. लालू प्रसाद यादव ने जिस तरह से गरीबों और लाचारों को सशक्त बनाया वह भी आरएसएस के एजेंडे में नहीं था या फिर यूँ कहें कि वह इनके एजेंडे के खिलाफ था. लालू के इस चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए संघ ने आडवाणी को आगे लाया और मंडल का चक्रव्यूह टूट गया. पूरा देश छद्म रूप से श्री राम मय हो गया यहाँ तक कि दक्षिण में इसका असर देखने को भी बहुत कम लेकिन मिला. बिहार में आज भी बहुजन राजनीति करने वाले लोग कहते हैं कि लालू ने भले ही “गरीबों को स्वर्ग नहीं दिया लेकिन स्वर दिया”. इसका प्रमाण हमें देहातों में मिलता है. पिछड़ों पर सदियों से हो रहे अत्याचार को लालू ने लगभग समाप्त कर दिया. अवर्ण जातियों को लगा कि अब वह सवर्ण से मुकाबला कर सकते हैं. यद्यपि कांग्रेस ने छुआछूत को समाप्त करने की पहल के रूप में एक कानून लाया था लेकिन उसको ज़मीन पर उतारना कांग्रेस के बस में नहीं रहा जिसका वर्णन गया के दशरथ मांझी पर बनी एक फिल्म द माउंटेन मैन में मिलता है. यह दृश्य देखने लायक है जिसे मैंने यहाँ साझा किया है.

पहले दृश्य में नायक को बताया जाता है कि अब देश से छुआछूत समाप्त हो गया है और वह किसी को छू सकता है. नायक खुश है कि अब वह छुआछूत का शिकार नहीं होगा. हालांकि इस दृश्य में गाँव के कुछ सवर्ण मंदिर में प्रवेश रोकने के लिए डंडे के साथ खड़े रहते हैं.

दुसरे दृश्य में नायक का भ्रम टूट जाता है. वह गाँव के सवर्ण मुखिया को छू देता है जिसके बाद उसे बेईज्ज़त होना पड़ता है, उसके नए और साफ़ सुथरे कपडे फाड़ दिए जाते हैं और वह अपने घर शहरी बाबू बन कर नहीं लौट पाता है जिसकी उसने अपेक्षा की थी.

लालू प्रसाद ने छुआछूत को जड़ से समाप्त नहीं किया लेकिन उनहोंने बताया कि जो पिछड़े हैं वह सवर्णों से कम नहीं हैं. लालू राज्य में कई ऐसी घटनाएं हुईं जिनमें पिछड़ों ने ज़बरदस्ती मंदिर में घुस कर भगवान पर अपना अधिकार जताया. लालू प्रसाद के इस सामाजिक न्याय से ऐसा नहीं कि संघ को लाभ नहीं मिला. लालू के इस साहसिक कार्य के कारण पिछड़ों ने भी हिन्दू धर्म पर अपना अधिकार जाताना शुरू किया और संघ को भी उन्हें अपने करीब लाने का अवसर मिला.

लालू के उदय के बाद ही बिहार और उत्तर प्रदेश में बहुजन राजनीति ने जोर पकड़ा. शासन सवर्णों के हाथों से छिटक कर बहुजनों के हाथों में आ गया. यह सवर्णों को मंज़ूर नहीं था. और फिर लालू की बर्बादी की कहानी गढ़ी जानी लगी.

छोटे छोटे अपराध को भी व्यापकता के साथ दिखाया और लिखा जाने लगा. लालू पर मुस्लिम परस्त होने का इलज़ाम लगाया जाने लगा. इसके सबूत पर सीवान के सांसद शहाबुद्दीन को पेश किया जाने लगा. जबकि शहाबुद्दीन का उदय सवर्णों के समर्थन से हुआ. सीवान के इलाके में शहाबुद्दीन ने सवर्णों की ज़मीन लाल झंडे से सुरक्षित की. सीवान में या पूरे बिहार में शहाबुद्दीन से सबसे ज्यादा अगर किसी को हानि हुई तो वह था मुस्लिम समाज. मुस्लिम नौजवान लड़कों ने शहाबुद्दीन को अपने आदर्श बनाना शुरू किया और बड़ी संख्या में मुस्लिम नौजवानों ने अपराध का रास्ता चुना. जिन्हें डॉक्टर बनना था वह शहाबुद्दीन के शूटर बन गए.

जगन्नाथ मिश्र से जो चारा घोटाला बिना रोक टोक के चल रहा था वह लालू के आते ही थम गया. लेकिन परिणाम उल्टा हुआ और लालू को ही इसका परिणाम भुगतना पड़ा. लालू आज जेल में हैं. वह कई बीमारियों से ग्रस्त हैं. हृदय रोग से लेकर गुर्दे की बीमारी से वह त्रस्त हैं लेकिन बीमारी के आधार पर जगन्नाथ मिश्र को ज़मानत मिल जाता है और वह बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुख़र्जी के हाथों अपने पुस्तक का विमोचन करवाते हैं. जन्मजात कांग्रेसी मिश्र ने कथित तौर से अपने आपको बचाने के लिए अपने बेटे को भाजपा ज्वाइन करवाया और उनके बेटा नीतीश मिश्रा बिहार भाजपा के उपाध्यक्ष हैं.

नेशनल क्राइम ब्यूरो का अगर संतुलित होकर अध्ययन किया जाए तो लालू और राबड़ी के पूरे 15 वर्षों के शासन काल में इतने अपराध नहीं हुए जितने अपराध बिहार में अकेले एनडीए के शासन में 5 वर्ष में हुए. इनमें छोटे से लेकर जघन्य अपराध तक मौजूद हैं.

सृजन घोटाला चारा घोटाला से बड़ा घोटाला रहा लेकिन उस पर मीडिया ने ईमानदारी के साथ कभी चर्चा भी नहीं हो सकी, सज़ा की बात तो दूर ही रहने दीजिए. जबकि चारा घोटाला और सृजन घोटाला का जो तरीका था वह भी एक जैसा था. राज्य के खजाने से पैसा निकल कर कुछ एनजीओ में बन्दर बाँट होता रहा और राज्य इसकी ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं. न ही मीडिया इस बात को लेकर उत्सुक है कि बताया जाए कि इससे संबंधित किन इन को सजा हुई, किन किन से पूछताछ हुई. तत्कालीन वित्त मंत्री सुशील कुमार मोदी इसके लिए कितना ज़िम्मेदार रहे और उन्हें नैतिक आधार पर भी अपने पद से इस्तीफा क्यों नहीं देना चाहिए था.

बिहार में हुए दुसरे बड़े घोटाले इतने अमानवीय थे कि उसकी चर्चा मात्र से देश में बिहारियों को शर्मसार किया. मुजफ्फरपुर से लेकर पटना तक जिस तरह से अनाथ और बेसहारा लड़कियों के जिंदा मांस का सौदा हुआ उससे वीभत्स और क्या हो सकता था. इस पर भी राष्ट्रवाद का दंभ भरने वाली सत्ता, श्री राम का भक्त होने का दावा करने वाली सत्ता ज़िम्मेदारी लेने से तो कोसो दूर थी उसे अफ़सोस भी नहीं हुआ. इससे संबंधित मामले में एनडीए सरकार की मंत्री मंजू वर्मा को जिस तरह सरकारी तंत्र बचाता रहा उसका आभास शायद ही किसी को न हुआ हो. पटना के शेल्टर होम की संचालिका मनीषा दयाल के फोटो कई मंत्री के साथ वायरल हुए जिन्हें देखकर कहा जा सकता था कि मनीषा दयाल इनसे कितना पास रही होगी.

इन सबके बावजूद न कोई अन्ना आया और न कोई जे पी आए.

आप सोच कर देखिए कि अगर ये दोनों घटनाएं और बच्चों की हर वर्ष लीची के मौसम में होने वाली मौतें लालू और राबड़ी या कांग्रेस शासन में हुआ होता तो क्या हुआ होता? कोई अन्ना आ जाता तो किसी जे पी के फिर से उभरने की पूरी उम्मीद थी.

ऐसा नहीं कि इसमें विपक्ष की कोई गलती नहीं है. विपक्ष कभी विपक्ष बना ही नहीं. विपक्ष के तौर पर तेजस्वी यादव इतना आराम तलब हैं कि राजद कार्यकर्ताओं के अनुसार उनकी प्रतीक्षा में बड़े नेता आज झोलाछाप नज़र आ रहे हैं. राजद के एक प्रवक्ता ने ही मुझे बताया कि तेजस्वी को अपने बेडरूम से निकलने में चार घंटे लगते हैं.

हाल में हुए मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत और लू से होने वाली मौतों पर राज्य की लापरवाही पर तेजस्वी तो इतना चुप हैं कि अब लोगों को भ्रम होने लगा है कि उनहोंने कहीं राजनीति से संन्यास ही न ले लिया हो.

Liked it? Take a second to support द मॉर्निंग क्रॉनिकल हिंदी टीम on Patreon!




Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*