जब जनता ही संवेदनहीन हो जाए तो सत्ता क्या करे




-समीर भारती

आज के परिप्रेक्ष्य में सत्ता समाज सेवा और देश सेवा के लिए नहीं हथियाई जाती है. सत्ता उपभोग की वस्तु बन गयी है और इसमें 5 साल के लिए कम से कम न समाप्त होने वाले संसाधन होते हैं. जब पूरा देश गर्मी में तड़प रहा होता है तो सत्ता 16 डिग्री एसी की ठंड का मज़ा ले रही होती है. जब पूरी जनता अपना इलाज कराने के लिए घंटों लाइन में लगकर अपना पंजीकरण करवाती है तब सत्ता के बीमार पड़ते ही पूरे अस्पताल में इमरजेंसी लगा दी जाती है. एक इशारे पर बड़ा से बड़ा डॉक्टर सत्ता के क़दमों में लेट जाता है. वही डॉक्टर जो अपने आम मरीज़ से ठीक से बात नहीं करता वह माँ की तरह सत्ता को अपनी सेवा देता है. अस्पताल की बेहतरीन नर्स सत्ता की सेवा में लगा दी जाती हैं. जनता जहाँ ट्रेन से सफ़र करने के लिए एक युद्ध जैसा झेलती हैं वहीँ सत्ता की यात्रा के लिए पूरी एक बोगी खाली करवा दी जाती है. सड़क जो शोरगुल करते ट्रैफिक से भरा होता है जिसे आम जनता को पार करना मुश्किल होता है तो सत्ता के लिए सड़क सुनसान करा दी जाती है. यह भला आपको कहाँ मिलेगा अगर आप सत्ता में नहीं हैं. ऊपर से सत्ता कहते है कि वह जनता की सेवक है. हाँ सत्ता इस मायने में खुद को इनका सेवक मानती होगी कि इनसे इसे दूध, मांस और खाल मिले. यह जिस अवस्था में भी रहें सत्ता को तो दूध मिले ही और इस दूध से सत्ता न जाने कितनी मलाई निकाल सके. जनता बस अब मांस खाल और दूध देने वाली प्राणी ही बची है. सत्ता इसकी सेवक!

क्यों?

खलील जिब्रान का नाम सुना होगा? वह अरब दुनिया के विद्रोही लेखक कवि, पेंटर और भी बहुत कुछ थे. उनहोंने प्रोफेट लिख कर सभी प्रोफेट को बेनकाब किया था. जनता के सियासी और धार्मिक दोनों तरह के प्रोफेट को. उनकी एक कहानी चतुर राजा ज़रूर पढ़ें जो यह है:

विरानी नाम के एक सुदूर नगर पर किसी समय एक राजा शासन करता था. वह शक्तिशाली भी था और चतुर भी. लेकिन उसे अपनी सामर्थ्य पर कम, बुद्धि पर भरोसा ज्यादा था. उस नगर के बीचो बीच एक कुआँ था. उसका पानी साफ़ और ठंडा था. नगर में क्योंकि दूसरा कोई अन्य कुआँ नहीं था इसलिए सभी नगरवासी यहाँ तक कि राजा और उसके दरबारी भी उस कुँए का पानी पीते थे.

एक रात, जब सभी सोए हुए थे, एक चुड़ैल नगर में आ घुसी. उसने किसी अनजाने द्रव की सात बूंदें कुँए के पानी में टपका दी और बोली, “इसी पल से, जो भी इस कुँए का पानी पिएगा पागल हो जाएगा.”

अगली सुबह, राजा और उसके प्रधान मंत्री को छोड़कर सभी नगरवासियों ने कुँए का पानी पीया और चुड़ैल की भविष्यवाणी के अनुसार पागल हो गए.

उसके बाद छोटी-छोटी गलियों से लेकर बड़े-बड़े बाज़ारों तक, सभी जगह पूरे दिन लोग एक-दुसरे से यूं बतियाते रहे, “राजा पागल है. हमारे राजा और उसके प्रधान मंत्री का दिमाग घूम गया है. ऐसे आदमी को हम पर शासन करने का कोई अधिकार नहीं है. हम इसे गद्दी से उतार देते हैं.”

उसी शाम राजा ने सोने का एक घड़ा उस कुँए के पानी से भर लाने का आदेश दिया. जैसे ही वह लाया गया, राजा ने पेट भर उसे पिया और अपने प्रधान मंत्री को भी पीने को दिया.

इस कहानी का आशय समझ में आ गया होगा. इस कहानी का मतलब यह है कि सत्ता से पहले जनता दुराचारी हो जाती है, सत्ता से पहले जनता भ्रष्ट हो जाती है, सत्ता से पहले जनता अत्याचारी हो जाती है. क्योंकि सत्ता वही करती है जो जनता चाहती है. जनता वही चुनती है जो उसे अच्छा लगता है. आज हाल वही है.

आप बदलें सत्ता बदल जाएगी

आए दिन हम बेरोज़गारी, भूख, गरीबी, बीमारी और और इनसे होने वाली मौतों से जूझ रहे हैं. आए दिन हम भ्रष्टाचार, बलात्कार, हिंसा से जूझ रहे हैं लेकिन हम इनमें कोई बदलाव नहीं चाहते. हम अपनी समस्याओं पर बात नहीं करते. हम शासन से वह चाहते हैं जो शासन आसानी से दे सकती है. हम अपने लिए नफरत और हिंसा सत्ता से मांग रहे हैं. हम अपने लिए सत्ता से बेहतर शासन नहीं चाहते, बेहतर स्कूल नहीं चाहते, बेहतर अस्पताल नहीं चाहते, हम सत्ता से बेहतर सड़क, स्वच्छ वातावरण नहीं चाहते.

परिणामस्वरूप, हम जो चाहते हैं वह सत्ता हमें दे रही है. हिंसा, नफरत, हाहाकार.

(समीर भारती स्वतंत्र पत्रकार हैं. ये इनके अपने विचार हैं.)

 

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