आज जलियाँवाला बाग़ की घटना प्रासंगिक क्यों?




जलियाँ वाला बाग़ (Wikipedia)

-मोहम्मद मंसूर आलम

जालियांवाला बाग़ की घटना को हम सब ने सुना और पढ़ा है लेकिन उसका जानना आज तक इतना प्रासंगिक नहीं था जितना पिछले कुछ सालों में. आज इस घटना को पूरे 100 वर्ष हो गए. हर पार्टी के बड़े नेताओं ने इस घटना पर शोक जताया है. ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मई (Theresa May) ने कुछ दिनों पहले ही अपने अधिकारिक बयान में कहा कि यह ब्रिटिश भारत के इतिहास की एक शर्मनाक घटना है. उनहोंने इस पर अपना दुःख प्रकट किया है. 1997 में महारानी एलिज़ाबेथ ने इस स्मारक पर मृतकों को श्रद्धांजलि दी थी। 2013 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरॉन भी इस स्मारक पर आए थे। विजिटर्स बुक में उन्होंनें लिखा था कि “ब्रिटिश इतिहास की यह एक शर्मनाक घटना थी।

क्या हुआ था जालियांवाला बाग में?

जालियाँवाला बाग अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर से मात्र एक डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. आज से ठीक 100 साल पहले 13 अप्रैल, 1919 बैसाखी के दिन यह दर्दनाक घटना घटी थी जिसने भारतियों को अंदर तक हिला दिया था.

जलियाँवाला बाग में रौलेट एक्ट (Rowlatt Act) का विरोध करने के लिए एक सभा हो रही थी जिसमें भारतियों से नफ़रत की आग में जल रहे जनरल डायर नामक एक अँग्रेज ऑफिसर ने अकारण उस सभा में उपस्थित भीड़ पर गोलियाँ चलवा दीं जिसमें 400 से अधिक व्यक्ति मरे और 2000 से अधिक घायल हुए। अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर कार्यालय में 484 शहीदों की सूची है, जबकि जलियांवाला बाग में कुल 388 शहीदों की सूची है। ब्रिटिश राज के अभिलेख इस घटना में 200 लोगों के घायल होने और 379 लोगों के शहीद होने की बात स्वीकार करते है जिनमें से 337 पुरुष, 41 नाबालिग लड़के और एक 6-सप्ताह का बच्चा था। अनाधिकारिक आँकड़ों के अनुसार 1000 से अधिक लोग मारे गए और 2000 से अधिक घायल हुए।

यदि किसी एक घटना ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर सबसे अधिक प्रभाव डाला था तो वह घटना यह जघन्य हत्याकाण्ड ही था। माना जाता है कि यह घटना ही भारत में ब्रिटिश शासन के अंत की शुरुआत बनी।

पीछे की मंशा

प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) में भारतीय नेताओं और जनता ने खुल कर ब्रिटिशों का साथ दिया था। 13 लाख भारतीय सैनिक और सेवक यूरोप, अफ़्रीका और मिडल ईस्ट में ब्रिटिशों की तरफ़ से तैनात किए गए थे जिनमें से 43,000 भारतीय सैनिक युद्ध में शहीद हुए थे। युद्ध समाप्त होने पर भारतीय नेता और जनता ब्रिटिश सरकार से सहयोग और नरमी के रवैये की आशा कर रहे थे परंतु ब्रिटिश सरकार ने मॉण्टेगू-चेम्सफ़ोर्ड सुधार (Montagu–Chelmsford_Reforms या Mont-Ford Reforms) लागू कर दिया जो इस भावना के विपरीत थे।

लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के दौरान पंजाब के क्षेत्र में ब्रिटिशों का विरोध कुछ अधिक बढ़ गया था जिसे भारत प्रतिरक्षा विधान (1915) लागू कर के कुचल दिया गया था। उसके बाद 1918 में एक ब्रिटिश जज सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में एक सेडीशन समिति (Sedition Committee) नियुक्त की गई थी जिसकी ज़िम्मेदारी ये अध्ययन करना था कि भारत में, विशेषकर पंजाब और बंगाल में ब्रिटिशों का विरोध किन विदेशी शक्तियों की सहायता से हो रहा था। इस समिति के सुझावों के अनुसार भारत प्रतिरक्षा विधान (1915) का विस्तार कर के भारत में रॉलट एक्ट लागू किया गया था, जो आजादी के लिए चल रहे आंदोलन पर रोक लगाने के लिए था, जिसके अंतर्गत ब्रिटिश सरकार को और अधिक अधिकार दिए गए थे जिससे वह प्रेस पर सेंसरशिप लगा सकती थी, नेताओं को बिना मुकदमें के जेल में रख सकती थी, लोगों को बिना वॉरण्ट के गिरफ़्तार कर सकती थी, उन पर विशेष ट्रिब्यूनलों और बंद कमरों में बिना जवाबदेही दिए हुए मुकदमा चला सकती थी, आदि। इसके विरोध में पूरा भारत उठ खड़ा हुआ और देश भर में लोग गिरफ्तारियां दे रहे थे।

जलियाँवाला बाग़ के हीरो डॉ सत्यपाल सिंह और सैफुद्दीन किचलू

9 अप्रैल, 1919 को रामनवमी के जुलुस का नेतृत्व जलियाँवाला बाग़ के दो नायक सत्यपाल सिंह और सैफुद्दीन किचलू कर रहे थे जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. इसके बाद 10 अप्रैल 1919 को अमृतसर के उप कमिश्नर के घर पर इन दोनों नेताओं को रिहा करने की माँग पेश की गई। परंतु ब्रिटिशों ने शांतिप्रिय और सभ्य तरीके से विरोध प्रकट कर रही जनता पर गोलियाँ चलवा दीं जिससे तनाव बहुत बढ़ गया और उस दिन कई बैंकों, सरकारी भवनों, टाउन हॉल, रेलवे स्टेशन में आगज़नी की गई। इस प्रकार हुई हिंसा में 5 यूरोपीय नागरिकों की भी हत्या हुई। इसके विरोध में ब्रिटिश सिपाही भारतीय जनता पर जहाँ-तहाँ गोलियाँ चलाते रहे जिसमें 8 से 20 भारतीयों की मृत्यु हुई। अगले दो दिनों में अमृतसर तो शाँत रहा पर हिंसा पंजाब के कई क्षेत्रों में फैल गई और 3 अन्य यूरोपीय नागरिकों की हत्या हुई। इसे कुचलने के लिए ब्रिटिशों ने पंजाब के अधिकतर भाग पर मार्शल लॉ लागू कर दिया।

जनरल डायर की गलतबयानी

मुख्यालय वापस पहुँच कर ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को टेलीग्राम किया कि उस पर भारतीयों की एक फ़ौज ने हमला किया था जिससे बचने के लिए उसको गोलियाँ चलानी पड़ी। ब्रिटिश लेफ़्टिनेण्ट गवर्नर मायकल ओ डायर ने इसके उत्तर में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को टेलीग्राम किया कि तुमने सही कदम उठाया। मंा तुम्हारे निर्णय को अनुमोदित करता हूँ। फिर ब्रिटिश लेफ़्टिनेण्ट गवर्नर मायकल ओ डायर ने अमृतसर और अन्य क्षेत्रों में मार्शल लॉ लगाने की माँग की जिसे वायसरॉय लॉर्ड चेम्सफ़ोर्ड नें स्वीकृत कर दिया।

जलियाँवाला बाग़ का विरोध

गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने इस हत्याकाण्ड के विरोध-स्वरूप अपनी नाइटहुड को वापस कर दिया। इस घटना से पंजाब पूरी तरह से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सम्मिलित हो गया। इसके फलस्वरूप गांधी ने 1920 में असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया।

सैफुद्दीन किचलू और सत्यपाल सिंह का परिचय

सैफुद्दीन किचलू और डॉ सत्यपाल सिंह (दायाँ)

सैफुद्दीन का जन्म 15 जनवरी, 1888 को पंजाब के अमृतसर में हुआ था। सैफुद्दीन ने अमृतसर में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। कानून की डिग्री प्राप्त करने के बाद, जर्मन विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। 1919 में यूरोप से लौटने के बाद, अमृतसर में वकालत शुरू किया। लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए, उन्होंने अच्छा ख़ासा वकालत छोड़ दिया और अखिल भारतीय खिलाफत समिति से जुड़ गए।

सैफुद्दीन रोलेट अधिनियम के कार्यान्वयन के खिलाफ पंजाब में मजबूत विरोध प्रदर्शन के लिए प्रसिद्ध थे। इस विरोध के कारण ब्रिटिश सरकार ने 10 अप्रैल, 1919 को उन्हें और उनके साथी डॉ. सत्यपाल को गिरफ्तार कर लिया और धर्मशाला भेज दिया। परिणामस्वरूप, 13 अप्रैल को अमृतसर जालियांवाला बाग में बड़ी संख्या में लोगों ने प्रदर्शन किया, जहां अंग्रेजी सरकार ने अंधा गोलियां चलाई थीं। सैफुद्दीन उन मुस्लिम नेताओं में से थे जो हिंदुस्तान के बंटवारे के खिलाफ थे। वह एक सच्चे राष्ट्रवादी और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक थे। 9 अक्टूबर 1963 को दिल्ली में उनका निधन हो गया।

डॉ सत्यपाल सिंह पंजाब विश्व विद्यालय से बी.ए. और एम.बी की डिग्री ली थी और इंडियन मेडिकल सर्विस में सेवारत थे. दुर्भाग्य से इन दोनों का परिचय बहुत कम मौजूद है.

आज इसकी प्रासंगिकता क्यों?

इसमें सबसे अनोखी बात यह है कि जिस रामनवमी पर आज हिन्दू-मुसलमान के झगडे होते हैं उस रामनवमी को अँगरेज़ हिन्दू-मुसलमान की एकता का विशाल प्रदर्शन मानते थे. इस काण्ड से ठीक पहले पूरे देश में आम नवमी के जुलुस में हिन्दू और मुसलमानों की एकता को देख कर अँगरेज़ परेशान हो उठे थे.

रॉलेट एक्ट का विरोध मूलतः भारतीय इसलिए कर रहे थे क्योंकि उसमें राजद्रोह नाम के कानून का दुरूपयोग था जिसमें भारतियों और प्रेस से ब्रिटिश राज के खिलाफ बोलने की आज़ादी पर पहरा था. सेडीशन समिति भी इसलिए बनाई गयी थी ताकि भारतियों पर पहरा लगाई जा सके.

कन्हैया, उमर खालिद, शहला रशीद और अनिर्बान और अन्य छात्रों पर यही काला कानून लगाया गया जिसका विरोध पूरे भारत में इनकी गिरफ़्तारी के बाद हुआ.

आज यह इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि आज भी सत्ता हिन्दू-मुस्लिम एकता की राह को नेस्त नाबूद कर देना चाहती है. फर्क यह है कि आज सत्ता भूरी चमड़ी वालो और हिन्दू नाम वाले भोग रहे हैं और कल सत्ता गोरी चमड़ी वालों के हाथों में थी.

 

(कई जानकारियां विकिपीडिया से साभार)

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