राम जन्मभूमि विवाद पर क्या अमित शाह भागवत से भी सवाल पूछेंगे?




-मनीष शांडिल्य

माना जाता है कि चुनावी राजनीति में भारतीय जनता पार्टी आज जिस बुलंदी पर खड़ी है उस मकाम तक उसे पहुंचाने में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद की बहुत अहम भूमिका रही है. ऐसे में यह अपेक्षित ही था कि भाजपा के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण हो चुके गुजरात चुनाव के मतदान के ठीक पहले जब इस विवाद की अंतिम सुनवाई शुरु होगी तो भाजपा इसके बहाने राजनीतिक फायदा उठाने का कोई-न-कोई मौका जरुर तलाश करेगी.



भाजपा ने यह मौका सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से पैरवी कर रहे वकील कपिल सिब्बल की अपील के बहाने ढूंढ निकाला. कपिल सिब्बल ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में यह दलील दी कि इस मामले पर सुनवाई अगले लोकसभा चुनाव के बाद जुलाई, 2019 में की जाए क्योंकि मौजूदा समय में माहौल सुनवाई के लिए माकूल नहीं हैं.

एक ओर सिब्बल की इस दलील को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया तो दूसरी ओर इस दलील को अपने पक्ष में भुनाने के लिए भाजपा ने कपिल सिब्बल के बयान को कांग्रेस से जोड़ते हुए उससे सफाई मांगी. इसके लिए कोई और नहीं खुद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अहमदाबाद में संवाददाता सम्मेलन बुलाया. गौरतलब है कि कपिल सिब्बल वरिष्ठ कांग्रेस नेता भी हंै.

अमित शाह ने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के सवाल पर कांग्रेस से उसका रुख स्पष्ट करने की मांग की और आरोप लगाया कि राम जन्मभूमि केस के रास्ते में रोड़े अटकाने के लिए कपिल सिब्बल कांग्रेस पार्टी की ओर से सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील के तौर पर आए हैं.

भाजपा अध्यक्ष ने कहा, ‘‘रामजन्मभूमि केस की सुनवाई जल्द से जल्द हो, इस बात पर कांग्रेस सहमत है या नहीं? या कांग्रेस पार्टी भी चाहती है कि 2019 के चुनाव तक रामजन्मभूमि केस की सुनवाई न हो.’’ हालांकि जानकारों का मानना है कि अमित शाह के इस आरापे में कोई दम नहीं है कि कपिल सिब्बल कांग्रेस के इशारे पर सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील बने हैं. कपिल देश के सीनियर वकील हैं और उन्हें किसी मामले की पैरवी करने का उतना ही पेशेवर हक है जितना भाजपा के उन नेताओं को जो कि आज केंद्र में मंत्री हैं और अतीत में गंभीर अपराध और भ्रष्टाचार के कई चर्चित मामलों में अपने मुवक्किल की ओर से अदालत में पेश होते रहे हैं.

साथ ही अमित शाह की कल की प्रतिक्रिया का एक दूसरा पहलू भी है. एक ओर जहां अमित शाह कपिल सिब्बल के बहाने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के मामले पर कांग्रेस से सवाल कर बैठते हैं वहीं दूसरी ओर वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत से तब सवाल करना भूल जाते हैं जब वे इस विवादित मामले के अदालत में होने के बावजूद एकतरफा कार्रवाई की घोषणा करते हैं.

मामला भी बिल्कुल ताजा है. मोहन भागवत ने शुक्रवार एक दिसंबर को कहा है कि अयोध्या में विवादित जमीन पर केवल राम मंदिर का ही निर्माण होगा. मंदिरों के शहर उडुपी में आयोजित तीन दिवसीय धर्म संसद का उद्घाटन करते हुए मोहन भागवत ने कहा है कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण पर किसी को दुविधा नहीं होनी चाहिए.



उन्होंने कहा, ‘‘हमलोग राम मंदिर बनाएंगे. यह कोई लोकप्रिय घोषणा नहीं है, बल्कि यह हमारी आस्था का विषय है और इसमें कोई बदलाव नहीं होगा. वर्षों की कोशिश और त्याग के बाद अब राम मंदिर का निर्माण सच होता प्रतीत हो रहा है.’’

भागवत का एलान अदालत को एक चुनौती सरीखा है. चुनौती इस मायने में कि मानो वे कह रहे हो कि अदालत का फैसला जो भी हो वे हर हाल में अपने मन की ही करेंगे.

अमित शाह अगर कपिल सिब्बल के दलील को अदालती मामले में रोड़ा अटकाने वाला मानते हैं तब तो उनके ही तर्कों के मुताबिक मोहन भागवत का बयान तो पूरी अदालती कार्रवाई को नकारने जैसा है. लेकिन अमित शाह ने मोहन भागवत से कोई सवाल नहीं किया. उन्होंने भागवत से यह नहीं पूछा कि वे अदालत का अंतिम फैसला आने से पहले ऐसी घोषणा क्यूं कर रहे हैं और ऐसा कर वे अदालत पर अनावश्यक दवाब बनाने की कोशिश क्यूं कर
रहे हैं. अमित शाह अभी केंद्र में सत्तारुढ़ पार्टी के मुखिया हैं और ऐसे में संवैधानिक संस्थाओं को बचाने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी उन्हीं पर हैं. इस जिम्मेदारी के तहत भी उनको मोहन भागवत से सवाल पूछना चाहिए था.

खैर भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जैसा गर्भनाल का संबंध है, इस पार्टी पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जैसा नियंत्रण है और बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के ठीक ढाई दशक बाद आज इन दोनों की जैसी सियासी जरुरते हैं, उनको देख-समझकर कोई हैरानी नहीं है कि अमित शाह क्यूं मोहन भागवत से सवाल नहीं करते और क्यूं कपिल सिब्बल के बहाने कांग्रेस पर निशाना साधने के लिए संवाददाता सम्मेलन बुला लेते हैं.

(मनीष शांडिल्य युवा पत्रकार हैं)

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