इस बार क्या सही साबित होंगे एग्जिट पोल?




चुनाव सर्वेक्षण एजेंसियों के नतीजों ने मध्य भारत के तीन भाजपा शासित राज्यों में मतदाताओं के बीच सत्ता-विरोधी रूझान (एंटी इनकम्बेंसी) को सामने रखा है

-मनीष शांडिल्य

अगले आम चुनावों का सेमीफाइनल माने जा रहे देश के पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीज़े मंगलवार 11 दिसंबर को आएंगे. लेकिन सात दिसंबर को मतदान प्रक्रिया पूरी होने के साथ ही कई न्यूज़ चैनल्स ने अलग-अलग सर्वेक्षण एजेंसियों के सहयोग से कराए अपने एग्ज़िट पोल के नतीजे शुक्रवार की शाम ही जारी कर दिए. अलग-अलग समाचार चैनलों के एग्ज़िट पोल के नतीजे भी अलग-अलग रहे हैं जिसने कांग्रेस और भाजपा दोनों के नेता और समर्थकों की धडकनें बाधा दी हैं.



किस न्यूज़ चैनल ने किस एजेंसी के जरिये एग्ज़िट पोल करवा कर क्या नतीज़े सामने रखे हैं इन आकड़ों को सामने रखना उबाऊ और बोझिल हो सकता है. तो आइये पहले ये जानते हैं कि इन सभी सर्वेक्षणों का सार क्या है, इनसे क्या संकेत सामने आ रहे हैं?

तीन राज्य में तस्वीर साफ़ तो दो में धुंधली

सर्वेक्षणों में राजस्थान को लेकर स्थिति साफ़ दिख रही है और यहाँ पाँच साल बाद कांग्रेस सत्ता में वापस लौटती दिख रही है. वहीँ करीब पांच साल पहले बने राज्य तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) को सत्ता में वापसी करता हुआ दिखाया गया है. एग्ज़िट पोल मिज़ोरम में मौजूदा सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस के हारने की भविष्यवाणी कर रहे हैं. वहां मिज़ो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) के जीतने के आसार हैं. इस राज्य में पिछले 10 वर्षों से लगातार कांग्रेस की सरकार है.

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के बारे में एग्ज़िट पोल अलग-अलग नतीजे दिखा रहे हैं. इन दोनों सूबों में बीते 15 वर्षों से भाजपा सत्ता में है. सर्वेक्षणों के मुताबिक इन दोनों सूबों में कांग्रेस और बीजेपी के बीच कड़ी टक्कर है. कल जारी हुए छह प्रमुख एग्जिट पोल की बात करें तो छत्तीसगढ़ में तीन सर्वेक्षणों में कांग्रेस जीत रही तो तीन में भाजपा. जबकि मध्य प्रदेश में चार सर्वेक्षणों में कांग्रेस जीत रही है तो दो में भाजपा. इन छह सर्वेक्षणों का औसत निकालें तो इन दोनों राज्यों में कांग्रेस भाजपा से दो-दो सीट ज्यादा लाती दिखाई दे रही है.



’60 फीसद एग्जिट पोल ही सही’

भारत जैसे सामाजिक-धार्मिक वाले विविधतापूर्ण देश में एग्जिट पोल करना बहुत आसान नहीं है. ऐसे में बीते वर्षों में कई बार ऐसा देखा गया है कि कई सर्वेक्षण गलत साबित हुए हैं. 2004 के आम चुनाव में एनडीए की जीत पक्की बताई जा रही थी लेकिन यूपीए फिर सत्ता हासिल करने में सफल रही. अखबार दैनिक भास्कर के मुताबिक 2014 के बाद हुए 22 चुनावों में 60 फीसद एग्जिट पोल ही सही साबित हुए हैं. सबसे बड़ा उलटफेर बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के चुनावों में हुआ. यहाँ लगभग सभी प्रमुख एजेंसियों के नतीजे गलत साबित हुए.

इसकी एक बड़ी वजह यह रही है कि कि भारत में अनेक सर्वेक्षण एजेंसियों की विश्वसनीयता संदिग्ध रही है. एग्ज़िट पोल या ओपिनियन पोल करने वाली कई एजेंसियों को निहित स्वार्थ के तहत किसी दल या संस्था के पक्ष में काम करते पाया गया है.

वैसे जिन पांच राज्यों में अभी चुनाव हुए है, पिछली बार वहां के एग्जिट पोल नतीजों के बहुत करीब रहे थे. आशा की जानी चाहिए कि एक्जिट पोल वाले भी समय के साथ-साथ परिपक्व और पेशेवर हुए होंगे. हर बीतते साल से उन्होंने कुछ सीख होगा.

सर्वेक्षणों के संकेत

भारत में अभी ज्यादातर न्यूज़ चैनल सत्ता और सत्ताधारी दल के समर्थक समझे जाते हैं. ऐसे में इन चैनल्स पर प्रसारित इन सर्वेक्षणों के आधार पर जो एक बात कही जा सकती है वो यह कि सिर्फ़ सूबाई नेतृत्व का ही नहीं, नरेन्द्र मोदी का भी करिश्मा अब कम होता जा रहा है.



चुनाव सर्वेक्षण एजेंसियों के नतीजों ने मध्य भारत के तीन भाजपा शासित राज्यों में मतदाताओं के बीच सत्ता-विरोधी रूझान (एंटी इनकम्बेंसी) को सामने रखा है. ये कितने सही हैं यह तो तीन दिन बाद पता चल पाएगा लेकिन ये अगर सही साबित हुए तो ये नरेन्द्र मोदी के लिए भी बहुत चिंता की बात साबित होगी.

फिलहाल थोडा इंतज़ार का मज़ा लीजिए और वीकेंड में खाली वक़्त हो तो सर्वेक्षणों के आधार पर बौद्धिक जुगाली भी कर सकते हैं.

(लेख युवा पत्रकार हैं.)

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