आज़ाद हिन्द फ़ौज के कर्नल महबूब की डायरी – पन्ना 1




कर्नल महबूब अहमद का जन्म 1920 में पटना में हुआ था. उनके पिता डॉक्टर थे, उनकी प्रारंभिक पढाई देहरा दून में हुई। सैन्य शिक्षा राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री देहरादून और इंडियन मिलिट्री अकादमी में हुई. ऑल इंडिया एंट्रेंस परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उनकी बहाली ब्रिटिश-फ़ौज में सेकंड लेफ्टिनेंट के पद पर हुई. सन 1943 में महबूब ने ब्रिटिश इंडियन फ़ौज की नौकरी छोड़ दी और आज़ाद हिन्द फ़ौज में शामिल हो गए.

कर्नल का देहांत 1992 में हुआ और डायरी खोदा बख्श लाइब्रेरी की ओर से 1993 में उर्दू में प्रकाशित की गयी।

मौत की मस्ती जीने का सुख (पहला पन्ना)

उम्र के इस 65वें पड़ाव पर अपने गुज़रे हुए वक़्त को मुड़कर देखना शायद मानवीय कमजोरी भी है और स्वाभाविक प्रक्रिया भी. अपने अतीत को बार बार छू लेने की यह बेताबी अगर मेरे भीतर कहीं है तो यह सिर्फ इसलिए नहीं कि मैं अतीत के प्रति बहुत अधिक मोहविष्ट हूँ. दरअसल मेरी जी गयी अब तक की ज़िन्दगी में अगर कहीं कुछ रौशनी का एक क़तरा शेष भी है तो, आज के गर्द व गुब्बार और अँधेरे से भरे माहौल में उनके होने की एक अहमियत है. यह रौशनी बचा ली जानी चाहिए, कि मौजूदा हिंदुस्तान की थरथराती हथेलियों पर रौशनी का यह दिया बेहद ज़रूरी है, कि रौशनी हमारी आस्था का प्रतीक है, कि रौशनी राहों का पाथेय (ज़ादे सफ़र) है….

रास्ते…कितने सारे रास्ते…रास्तों से भरा पूरा यह जीवन और रास्तों के बीच उलझे हुए लोग…अपनी अपनी मंजिल पाने के लिए अपने अपने रास्तों की तलाश. यह तलाश अनवरत है… निरंतर है. लेकिन कौन सी मंज़िल… कैसी मंज़िल? हाँ, आज भी यह तलाश जारी है. पूरा मुल्क भाग रहा है… बेतहाशा भाग रहा है. रास्ते सिर्फ रास्ते. भागते हुए लोग पता नहीं किस मंज़िल तक जा रहे हैं. हिंदुस्तान को कहाँ ले जा रहे हैं…? कहीं ऐसा तो नहीं कि इन रास्तों और इस भागम भाग की कहीं कोई मंज़िल ही नहीं? ऐसा नहीं होना चाहिए.

मेरे मुल्क ने बहुत पहले जो सफ़र शुरू किया था उसका मकसद तय था, उसकी मंज़िल तय थी, लेकिन जो तय था वह कहाँ हुआ और जब कुछ भी तय नहीं है तब भला क्या होगा?

एक अजीब सी दहशत जारी है. बेमकसद, बेमंज़िल किसी दौर, किसी तलाश की आखिर क्या वजह हो सकती है?

वजह: हाँ, तब ऐसा नहीं था. तब जीने की वजह थी, मरने की भी. मरना… कितना रोमांचक… कितना गौरवशाली एहसास था तब. सर पर कफ़न बाँध कर मौत की मस्ती, जीने का सुख… .

याद आती है, इस मस्ती में सराबोर अपना मुल्क… याद आता है मुल्क का वह जूनून और याद आता है शहादत के लिए तैयार अपने वक़्त का हर चेहरा… .

मुल्क की आज़ादी के लिए कुर्बान होना का वह पाक जज़्बा. यादों के इस एल्बम में चेहरे… और सिर्फ चेहरे हैं. हर चेहरा अपना सा लगता है, बेहद अपना. हाँ, वे सारे मेरे इर्द गिर्द थे. मेरे दोस्त मेरे हमसफ़र की तरह. याद आता है, कैप्टेन राम सिंह, शौकत मलिक, कर्नेल हबीब, शाह नवाब खान से लेकर अपने बेहद अज़ीज़ नेताजी तक का चेहरा. आज भी इन की यादें सारे शरीर में रोमांच सा भर जाती है. रोआँ, रोआं (फरहत अंगेज़ हो उठता हा) पुलक से भर उठता है.

सुभाष चन्द्र बोस एक बेहद खुबसूरत, भव्य और कद्दावर जिसकी हिम्मत और जोश की कल्पना से आज भी भुजाएं फरकने लगती हैं. कानों में बड़ी देर तक “जय हिन्द” का शंखनाद गूंजने लगता है.

क्रमशः

अगला पन्ना कल पढ़ना न भूलें।

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