दलित युवक को यूपी पुलिस ने गोली मारी, फिर पुलिस ने पिता से कहा 10 लाख ले लो और किसी मुसलमान को आरोपी बना दो




अनुसूचित जाति और अनूसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में सुप्रीम कोर्ट के बदलाव के खिलाफ 2 अप्रैल, 2018 को देश भर में दलितों ने विरोध किया था जिसमें कई लोगों की पुलिसिया कारवाई में जान गयी थी (फ़ोटो: सोशल मीडिया)

योगी राज में पुलिस क्या क्या कर सकती है और किस तरह उत्तर प्रदेश पुलिस के कुछ लोग आरएसएस के नफरत फैलाने के एजेंडे को फैलाने में लगे है इसका अंदाजा आपको जनसत्ता की इस रिपोर्ट से हो सकता है जिसमें दलित युवक की हत्या करने के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस मृतक के पिता को यह कहती है कि वह 10 लाख रुपए लेकर किसी मुसलमान पर हत्या का आरोप मढ़ दे.

दरअसल रविवार (13 जनवरी, 2019) को रामलीला मैदान में इकठ्ठा हुए बहुत से दलितों ने अन्याय और कठिनाइयों की कहानी सुनाई. ये वह लोग हैं जिन्होंने 2 अप्रैल, 2018 को भारत बंद में किसी न किसी रूप में हिस्सेदार थे और पुलिसिया ज़ुल्म के शिकार हुए. इस विरोध प्रदर्शन में 13 लोगों की जान गयी थी जबकि दो हजार से अधिक लोग घायल हुए थे. रामलीला मैदान में इन्हीं लोगों के परिजनों को बहुजन सम्मान महासभा में सम्मानित करने को इकठ्ठा किया गया था.



द टेलीग्राफ में छपी एक खबर का जनसत्ता ने हवाला देते हुए लिखा कि उस दिन हडताल के दौरान पुलिस गोलीबारी में दस लोगों की मौत हुई थी. ये लोग अनुसूचित जाति और अनूसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में सुप्रीम कोर्ट के बदलाव के खिलाफ विरोध कर रहे थे. विरोध के दौरान एक बच्ची की मौत जलती बाइक के गिरने से हो गयी थी. रामलीला मैदान के आयोजन में 13 ‘शहीद भीम सैनिकों’ की मूर्तियाँ लगाई गयी. यह आयोजन गाज़ियाबाद के सत्यशोधक संघ, भीम आर्मी के एक गुट द्वारा आयोजित किया गया था. इन मूर्तियों को बाबा साहब भीमराव आंबेडकर, बुद्ध और सम्राट अशोक की बड़ी मूर्तियों के सामने रखा गया जिन्हें बाद में पीड़ितों के मूल स्थानों पर ले जाया जाएगा.

इसी कार्यक्रम में जनसत्ता को यूपी के मुज़फ्फ़रनगर स्थित गोडला गावं में रहने वाले सुरेश कुमार (60) ने बताया कि कैसे उस दिन हड़ताल के दौरान उनके 22 वर्षीय बेटे अमरेश की मौत हो गयी. पेशे से मज़दूर सुरेश कहते हैं, ‘वो भी मेरी तरह दिहाड़ी मज़दूर था और शहर में काम की तलाश में गया था. काम नही लगा तो मुज़फ्फ़रनगर रेलवे स्टेशन पर आ गया, जहाँ हमारे (जाटव) कुछ लड़के प्रदर्शन कर रहे थे.’ सुरेश कहते हैं, ’हमारे लड़कों ने बताया कि उसे एक पुलिस अधिकारी ने सीने पर गोली मारी थी. प्रदर्शनकारी इसे हाथ से चलने वाले ठेले पर सरकारी हॉस्पिटल में लेकर गए, लेकिन उसे बचाया नही जा सका.’

सुरेश की एक बेटी और दो बेटे और हैं, जो दिहाड़ी मजदूरी का ही काम करते हैं. उन्हें सरकार ने किसी तरह का मुआवज़ा नही दिया. सुरेश ने दावा किया बेटे की मौत का आरोपी पुलिस इंस्पेक्टर उन्हें न्यू मंडी पुलिस स्टेशन उठाकर ले गयी. सुरेश कहते हैं कि ‘उनहोंने मुझसे बेटे के हत्यारे के संदिग्ध के रूप में किसी भी मुसलमान का नाम लेने को कहा. कहा गया कि अगर मैं ऐसा करता हूँ तो इसके बदले में मुझे दस लाख रुपए का मुआवज़ा मिलेगा. मैंने इनकार कर दिया. उनहोंने कहा कि मैं शान्ति चाहता हूँ तो किसी का तो नाम लेना ही पड़ेगा. इस पर मैंने उस पुलिसवाले को कहा कि मैं जानता हूँ कि तुमने ही मेरे बेटे को मारा है.’

सुरेश ने कहा कि ‘मेरे इनकार करने के बाद मुझे मेरी जाति का नाम लेकर गाली दी गयी, बाहरी व्यक्ति कहा गया. मुझे पीटने की धमकी दी गयी. मैंने इसे चेतावनी दी कि उसकी शिकायत करूंगा. इसके बाद पुलिस ने एक दलित युवक राम शरण को उस हिंसा के आरोप में गिरफ्तार कर लिया जिसमें अमरेश की मौत हुई.’ सुरेश आगे कहते हैं कि ‘मैंने अपने बेटे के लिए इन्साफ की लड़ाई नहीं लड़ सकता. हमारे किसी पडोसी ने भी हमारी मदद नहीं की.’

इस कार्यक्रम ने कई दलितों ने अपनी दिल दुखाने वाली दास्तान सुनाई.

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