“हम अगर उट्ठे नहीं तो” राष्ट्रव्यापी अभियान 5 सितम्बर को




5 सितम्बर, 2020 को देश भर में 500 से ज्यादा नारीवादी संगठन, LGBTQIA समुदाय और मानव अधिकार संगठन एक साथ मिलकर “हम अगर उट्ठे नहीं तो... (If we do not rise…) आन्दोलन” को आयोजित कर रहे हैं।

यह दिन गौरी लंकेश की हत्या की तीसरी वर्षगांठ भी है। इस अभियान का उद्देश्य भारत के लोगों के संवैधानिक अधिकारों पर हो रहे लक्षित हमलों के खिलाफ आवाज बुलंद करना है।

अभियान में हजारों लोग और समूह देश भर में एक साथ ऑन-लाइन और ज़मीनी सतह पर विभिन्न मुद्दों (जैसे कि  महिलाओं पर हिंसा, स्वास्थ्य, घरेलू कामगार, प्रवासी कामगार, राजनीतिक हिस्सेदारी, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों, शिक्षा आदि) पर अपनी आवाज़ उठाने के लिए एकजुट होकर एक साथ आएंगे।

भारत का लोकतंत्र और संविधान एक अभूतपूर्व संकट से जूझ रहा है। देश में पिछले कुछ सालों में लोकतांत्रिक और विधि प्रणाली का पतन हुआ है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता और अन्य संस्थानों की कार्यप्रणाली  गंभीर समीक्षा के तले आ गई है और संसद के कामकाज का संगीन रूप से समझौता किया गया है। सरकार ने चुनावी फंडिंग में भ्रष्टाचार का व्यवस्थित आयोजन कर, चुनावी बांड की प्रणाली में पारदर्शिता की कमी को एक संस्थागत रूप दिया है, जो निगमों को सत्तारूढ़ दल के संदूकों में काले धन को भरने की प्रकिया को मजबूती देता है। सरकार पर किसी प्रकार के सवाल ना उठाये जा सके और  न ही उन्हें किसी भी निर्णय का ज़िम्मेदार ठहराया जा सके इसके लिए सूचना के अधिकार कानून को कमजोर करके नागरिकों के मौलिक लोकतांत्रिक अधिकार पर प्रहार किया है।

देश में फासीवादी और नव-उदारवादी ताकतों की वृद्धि, के परिणामस्वरुप समाज में हिंसा में बढोतरी हुई है जिससे खासकर LGBTQIA समुदायों के लोगों और महिलाओं के जीवन और सुरक्षा पर गहरा प्रभाव पड़ा है। अल्पसंख्यकों पर लगातार हमलों ने देश में भय और असुरक्षा का माहौल बना दिया  है। देश में सांप्रदायिक घृणा फैलाने और लोगों को धार्मिक तर्ज पर विभाजित करने का एक व्यवस्थित प्रयास देखा जा रहा है। देश के धर्मनिपेक्ष ढांचे को नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) द्वारा नष्ट करने की कोशिश संसद के माध्यम से पुरज़ोर की जा रही है, साथ ही साथ राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) और राष्ट्रीय जनगणना रजिस्टर (NPR) जैसे अधिनियम द्वारा नागरिकता को धर्म से जोड़कर भारत के संविधान के ताने-बाने को नष्ट करने का प्रयास है। पूरे भारत में लोग सरकार के इस प्रतिगामी फैसले के विरुद्ध शांतिपूर्ण और अनोखे तरीके से उठे; महिलाओं ने संविधान की रक्षा के लिए आंदोलन का नेतृत्व किया, दुर्भाग्य से, आंदोलन के जवाब में लक्षित सांप्रदायिक हिंसा को सत्ताधारी दल द्वारा समर्थित किया गया। हिंसा को उकसाने वाले घृणास्पद भाषण देने वाले नेताओं को गिरफ्तार करने के बजाय, उन महिलाओं और लोगों को गिरफ्तार किया जा रहा है जिन्होंने एकता, शांति और संविधान के लिए काम किया।

अगस्त 2019 में, सरकार ने अनुच्छेद 370 को अभिनिषेध कर भारत के संविधान और संघीयता/संप्रभुता  पर हमला किया है और जम्मू कश्मीर के राज्य होने के दर्जे को नष्ट किया। एक साल होने पर भी अभी तक वहां पर इन्टरनेट सेवाए फिर से बंद की गई है, भाषण और लोकतंत्र पर पूरी तरह से पाबन्दी है, और कश्मीरी राजनैतिक कैदियों को बिना मुकदमे के भारत की जेलों में बंदी बना दिया गया है | यहाँ तक कि वहां पूर्व मुख्यमंत्री को भी गिरफ्तार कर घर में ही रखा गया है| हाल ही में, सरकार ने इस क्षेत्र के अधिवास कानून में इसीलिए संशोधन किया है।

पिछले कुछ वर्षों में, संविधान द्वारा प्रतिबद्ध अभिव्यक्ति की आजादी पर एक प्रत्यक्ष हमला हो रहा है जैसे कपडे पहनने का अधिकार, बोलने, लिखने, खाने, किसी धर्म विशेष को चुनने का अधिकार – जिसने महिलाओं और LGBTQI समुदायों को असंगत रूप से प्रभावित किया है।परन्तु असंतुष्टि की जो आवाजें उठी उन्हें व्यवस्थित रूप से चुप करा दिया गया और राष्ट्र-विरोधी का ठप्पा लगाया गया। विभिन्न आंदोलनों में लगे कार्यकर्ता, पत्रकार और शिक्षाविद जमानत के कानूनी प्रावधानों के बिना जेलों, में सड़ रहे है, गौरी लींकेश जैसी महिलाओं को भाषण और अभिव्यक्ति के अपने मौलिक अधिकार का प्रयोग करने का भुगतान अपने प्राण देकर चुकाना पड़ा है। गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (2019) में संशोधन किया गया है और इसका इस्तेमाल असंतुष्टों को फसाने और उन्हें गिरफ्तार करने के लिए किया जाता है।

पुलिस हिरासत में होने वाली मौत और ज्यादती के खतरनाक मामलों के साथ, कानून के न्याय संगत शासन का लगातार पतन हुआ है।

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम जैसे प्रतिगामी कानूनों ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। संपूर्ण LGBTQIA समुदाय की सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा के लिए बहुत कम प्रावधान हैं। एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम और (SC / ST / OBC) के आरक्षण को कम करने के लिए भी कई कदम उठाए गए हैं।

नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों और बढ़ते विकास के लिए इसमें अन्तर्निहित पूँजीवाद ने सामान्य रूप से महिलाओं पर विपरीत ढंग से प्रभाव डाला है, लेकिन विशेष रूप से वे जो दलित, आदिवासी और अन्य हाशिए के समुदायों के सदस्य हैं उनका नाजुक आर्थिक आधार तबाह हो गया है।

COVID-19 संकट ने वर्तमान शासन की गरीब-विरोधी विचारधारा को और उजागर कर दिया है। महामारी से निपटने के लिए लगाए गए अनियोजित और कठोर लॉकडाउन ने देश के लाखों कामकाजी गरीबों के लिए आर्थिक तबाही और विनाश को जन्म दिया। इससे तुरंत प्रभाव से लाखों गरीबों के सभी आय के अवसर समाप्त हो गए और वह बेरोजगार हो गए। इसका विशेष रूप से प्रवासी श्रमिकों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। प्रवासी श्रमिकों की अपने बच्चों के साथ सैकड़ों किलोमीटर तक पैदल चलने वाले वाली हृदय-विदारक रिपोर्ट और तस्वीरें सामने आई हैं, जो की लॉकडाउन की विशेषता बन गई है।

भारत की अर्थव्यवस्था पहले  ही 2017 की विमुद्रीकरण (demonetisation) आपदा से उबरने के लिए संघर्ष कर रही थी, जिसके परिणामस्वरूप 45 वर्षों में देश में सबसे अधिक बेरोजगारी देखी गयी। लॉकडाउन ने बेरोजगारी के इस संकट को भयावह अनुपात में धकेल दिया है।  इस संकट ने देश की

स्वास्थ्य प्रणाली की निराशाजनक स्तिथि को पूरी तरह उजागर कर दिया है। लॉकडाउन के दौरान दलितों के खिलाफ लिंग आधारित हिंसा और जाति आधारित अत्याचार तेजी से बढ़े हैं।

लॉकडाउन में श्रम अधिकार कानूनों को बदल कर निष्क्रिय और नष्ट कर दिया है | ऐसे समय में जब महामारी बड़ी संख्या में लोगों को विरोध करने से रोकती है सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के निजीकरण में व्यस्त है जो भारत के लोगों की हैं| इसके इलावा पर्यावरणीय प्रभाव की आकलन प्रक्रियाओं को ख़त्म करने की मांग की जा रही है जिससे हमारी नदियों, वन और भूमि को लूटने में मदद मिले सके और एक ही समय में कृषि नीतियों में प्रतिकूल परिवर्तन का प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया जा रहा है। नई शिक्षा नीति भारतीय शिक्षा प्रणाली को खत्म करने के लिए एकतरफा अभियान है। यह अधिक से अधिक केंद्रीकरण, शिक्षा प्रणाली का सांप्रदायीकरण और व्यावसायीकरण सुनिश्चित करने का प्रयास करती है। COVID 19 को कम करने के नाम पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए प्रदत्त कानूनों को कम करने के कदम उठाए गए हैं, जिससे शासन का महिला विरोधी रवैये का पता चलता है।

भारत के संविधान को बचाने के लिए आंदोलन में महिलाओं और LGBTQIA व्यस्तत सबसे आगे रहे हैं। हम अगर उट्ठे नहीं तो… “if we do not rise” अभियान संविधान के मूल्यों और सिद्धांतों की रक्षा के लिए एक पहल है।

अभियान के हिस्से के रूप में, हजारो लोग और समूह देश भर में एक साथ ऑन-लाइन और ज़मीन पर वर्णित मुद्दों पर अपनी आवाज़ उठाने के लिए आएंगे।

इस पूरे अभियान के समन्वयकर्ताओं का आग्रह है कि इस अवसर पर लोग 2-5 मिनट के वीडियो बनाएं और उनके साथ और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा करें, फेसबुक पर लाइव प्रसारण करें, सोशल मीडिया पर सर्कुलेशन के लिए पोस्टर, एनीमेशन, मीम्स, गाने और अभिनय बनाएं। शारीरिक दूरी मानदंडों का पालन करते हुए 5-10 लोगों के छोटे समूहों में इकट्ठा हों और सोशल मीडिया पर तस्वीरें पोस्ट करें साथ ही स्थानीय अधिकारियों को ज्ञापन दें।

अभियान के एक भाग के रूप में हम महिलाओं और ट्रांसजेंडर के खिलाफ हिंसा, स्वास्थ्य, महिलावनकी राजनीतिक भागीदारी, प्रवासी, श्रमिकों, महिला किसानों और यौनकर्मियों सहित विभिन्न विषयों पर फैक्टटशीट जारी करेंगे।

इस अवसर पर सभी सम्मिलित संस्थाओं की ओर से सभी कलाकारों, बुद्धधजीवियों, शिक्षाविदों और संबंधित नागरिकों से 5 सितंबर को अभियान में शामिल होने की अपील की गयी है।

इस पूरे अभियान से जुड़े लोग 5 सितम्बर को फेसबुक और ट्विटर पर अपनी बात #IfWeDoNotRise और #हमअगरउट्ठेनहींतो हैश टैग के साथ रखेंगे।

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