लिंगायत को अलग धर्म की मान्यता देने पर कर्नाटक सरकार सहमत




लिंगायत अपने अलग धर्म की पहचान को लेकर विरोध करते हुए (फ़ाइल फ़ोटो)

बेंगलुरू (कर्नाटक), 19 मार्च, 2018 (टीएमसी हिंदी डेस्क) | कर्नाटक विधानसभा चुनाव से पहले राज्य मंत्रिमंडल ने सोमवार को हिंदू धर्म के लिंगायत पंथ को एक अलग धर्म के रूप में मान्यता देने पर सहमति जताई। राज्य के कानून मंत्री टी.बी. जयचंद्र ने यह जानकारी दी। जयचंद्र ने मंत्रिमंडल की बैठक के बाद पत्रकारों से कहा, “कर्नाटक राज्य अल्पसंख्यक आयोग की अनुशंसा पर, राज्य मंत्रिमंडल ने सर्वसम्मति से लिंगायत और वीरशैव लिंगायत को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने का फैसला किया है।”



शिव की पूजा करने वाले लिंगायत और वीरशैव लिंगायत दक्षिण भारत में सबसे बड़ा समुदाय हैं, जिनकी आबादी यहां कुल 17 प्रतिशत है। अप्रैल-मई में होने वाले चुनाव में इनके वोट नतीजों में फर्क पैदा कर सकते हैं।

मंत्री ने कहा, “मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की अध्यक्षता में राज्य मंत्रिमंडल ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अंतर्गत आयोग की सिफारिशों को मान्यता देने और उसे अधिसूचित करने के लिए केंद्र सरकार के पास भेजने का फैसला किया है।”

जयचंद्र ने कहा, “आयोग ने लिंगायत को अल्पसंख्यक का दर्जा इस दृष्टिकोण से दिया है कि राज्य में अन्य अल्पसंख्यकों के अधिकार को हानि पहुंचे बिना ही लिंगायत और वीरशैव लिंगायत को समुचित पहचान दी जाए।”

आयोग के अंतर्गत कर्नाटक उच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एच.एन. नागमोहन दास की अध्यक्षता वाली एक अन्य समिति ने भी लिंगायत को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा दिए जाने की अनुशंसा की है।

क्या है लिंगायत समुदाय का सच?

लिंगायत संप्रदाय को वीरशैव संप्रदाय भी कहा जाता है। यह संप्रदाय मूलतः शिव को अपना भगवान मानता है। इसकी स्थापना 12वीं शताब्दी के दार्शनिक और राजनेता बसव ने की थी, बसव को बसवेश्वर भी कहा जाता है। महान कन्नड़ कवि और दार्शनिक के रूप में उन्होंने हिन्दू धर्म में व्याप्त जाति व्यवस्था, लिंग आधारित भेदभाव और धार्मिक अनुष्ठान के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया। यह संप्रदाय दक्षिण भारत के कई राज्यों में बसता है लेकिन इसकी सबसे बड़ी आबादी कर्नाटक में है।

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