आरएसएस का कांग्रेस मुक्त भारत बहाना, कम्युनिस्ट असल निशाना?




कोई माने या न माने आरएसएस की असल लड़ाई सोनिया के इटली वर्शन और राहुल के इतालवी कनेक्शन से नहीं है. सबको पता है कि जितना मोदी और ईरानी भारतीय हैं उतना ही भारतीय सोनिया और राहुल हैं. तो फिर यह कांग्रेस मुक्त का नारा क्यों?

वरिष्ठ पत्रकार आलोक नंदन शर्मा कहते हैं कि कांग्रेस मुक्त भारत तो बहाना है असल में भारतीय कम्युनिस्ट निशाना है. वह कहते हैं कि क्या आप को नहीं लगता कि जब से आरएसएस ज़मीन पर मज़बूत हुआ है तब से कम्युनिस्ट के कैडर की संख्या में कमी आई है. कहाँ कम्युनिस्ट नए रंगरूट बहाल हो रहे हैं?

पश्चिम बंगाल का ही लोक सभा चुनाव देख लीजिए. मोदी के उदय के साथ ही वहां मतदाता का पूरा मिज़ाज ही बदल गया. मोदी ने लोक सभा में वहां 18 सीट बड़ी आसानी से जीत लिया और कम्युनिस्ट के एक नेता दुसरे नेता पर आरोप लगाते रहे कि यह सब डील से हुआ है. डील होने से इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन डील से इतने बड़े मतदाता को बदलना संभव नहीं लगता.

शर्मा आगे कहते हैं कि भारत की गरीब जनता हमेशा से ही कम्युनिस्ट का झंडा उठाती आई है और उनके स्तर में अब तक सुधार नहीं आया है. आप 40 साल पहले के कम्युनिस्ट झंडावाहक को देखें और आज के कम्युनिस्ट झंडावाहक को देखें तो पाएंगे कि वह वही चालीस साल पुराने हैं.

वह कहते हैं कि भारत में गरीबों की आखरी उम्मीद ईश्वर है. उन्हें ईश्वरहीन बनाने की कोशिश कम्युनिस्ट ने की लेकिन अब वह लगातार असफल हो रहे हैं. आरएसएस ने उनका ईश्वर फिर से उन्हें वापस कर दिया.

आगे वह कहते हैं कि आप यह भी देखेंगे कि कम्युनिस्ट के गढ़ में आरएसएस अशांति फैला रही है चाहे वह जेएनयू हो या जाधव यूनिवर्सिटी या फिर पश्चिम बंगाल को ही देख लीजिए या फिर केरल ही को देख लीजिए. आरएसएस और कम्युनिस्ट के बीच इन जगहों पर संघर्ष ज़मीनी स्तर पर चल रहा है जिसका अंदाज़ा हमें कभी कभी होता है जब किसी की हत्या हो जाती है.

वह कहते हैं कि केरल के साबरीमाला मंदिर का उदाहरण ही ले लीजिए. सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि साबरीमाला मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश पर कोई निषेध नहीं है. केरल सरकार ने भी प्रयास किया कि वहां महिलाओं के साथ छुआ छूत का मामला हटे लेकिन क्या आपने सुना की स्वेच्छा से कोई केरल की महिला ने मन्दिर में प्रवेश करने की कोशिश की. इसका सीधा मतलब है कि मानस पर कम्युनिस्ट ने जो पहले छाप छोड़ी थी वह आरएसएस ने लगभग धो दी है. अब वह धर्म से पंगा लेने के मूड में नहीं हैं.

वह कहते हैं कि आपको सैकड़ों कम्युनिस्ट ऐसे मिल जाएंगे जिनके घरों में हिन्दू कर्मकाण्ड होते हैं. ऐसा नहीं कि वह चाहते हैं कि यह कर्मकांड हो ही लेकिन वह अपनी दूसरी पीढ़ी से मजबूर हैं. उनहोंने अपनी विरासत दूसरी पीढ़ी को सौंपी ही नहीं. वह कम्युनिस्ट के झंडा बरदारी में इतना मग्न रहे कि उनका परिवार मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहा और फिर उनहोंने वह त्याग दिया जो उनके पिता या माता करती आ रही थीं.

वह कहते हैं कि काग्रेस और भाजपा में कोई विचारधारा स्तर पर मतभेद ही नहीं है. इसलिए न जनता को कोई फर्क पड़ता है कि सिंधिया कांग्रेस में रहें या भाजपा में. सिंधिया कांग्रेस में रह कर भी वही कर रहे थे जो भाजपा में रह कर करेंगे. कांग्रेस और भाजपा के हिंदुत्व में बस तीव्रता (intensity) की कमी है. कांग्रेस नरम हिंदुत्व में भरोसा रखती है और भाजपा उग्र हिंदुत्व में बस यही फ़र्क है. इस फ़र्क से समाज को बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता.

आलोक कहते हैं कि आप देखेंगे कि मोदी के आने के बाद कांग्रेस की नीतियों और कार्यक्रमों में केवल नाम का ही बदलाव आया है. CAA जिसकी लड़ाई आज मुसलमान और कम्युनिस्ट साथ साथ लड़ रहे हैं यह भ्रम न पालिए कि कोई भी विपक्षी पार्टी खुद कांग्रेस मुसलामानों के इस लड़ाई में शामिल है कांग्रेस की ही देन है. तब एनआरसी नहीं था इसलिए किसी को आपत्ति नहीं थी. फ़र्क बस इतना ही है.

अंतिम वाक्य वह कहते हैं कि भारत की सभी पार्टियाँ चाहे वह केजरीवाल की पार्टी को या लालू की या ममता बनर्जी की वह भाजपा के साथ ही है क्योंकि उन सबकी विचारधारा में बस 19-20 का ही फर्क है. जो भी पार्टी कांग्रेस के साथ रही है वह कभी भी भाजपा के साथ हो सकती है.

कम्युनिस्ट पार्टी के लिए यह मुश्किल है.

(वरिष्ठ पत्रकार आलोक नंदन शर्मा की मोहम्मद मंसूर आलम की बात-चीत पर आधारित)

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