हम भी मुँह में ज़बान रखते हैं




-संजय श्रीवास्तव

कल से बीएचयू गेट पर चल रहे छात्राओं के भारी प्रतिरोध से विश्वविद्यालय प्रशासन सहित सत्ता-व्यवस्था की चूलें हिल गयीं। ज़रा देखिए कि नगर में पीएम मौजूद हैं और उनका काफिला बीएचयू गेट से गुजरने वाला है, महामना द्वार पर यौन हिंसा के विरोध में भारी संख्या में छात्राएँ धरने पर हैं। तभी ख़बर आती है कि पीएम/एमपी अब इधर से नहीं जाएँगे। तो अंदाज़ा लगाइए कि इन नौजवानों की आस कितनी टूटी होगी! क्या वक्त है! मोदी साहब आपको अपनी ही रियाया से दामन छुड़ाना पड़ रहा है! अब आप रास्ता बदल कर पतली गली पकड़ रहे हैं! अपने ही संसदीय क्षेत्र में इस जबरदस्त विरोध से आपका क्या कोई लेना देना नहीं?

साहब, आप तो दुनिया भर में जहाँ जाते हैं वहाँ बुलाई गयी काफी भीड़ आती है लेकिन इस बिन बुलाई भीड़ का क्या करेंगे? जानते हैं ये वही 18 से 25-30 की उम्र वाली भीड़ है जिसका लोहा सब की तरह आप भी मानते हैं और गुणगान करते नहीं थकते। आप क्या समझ रहे हैं इनको? 1975 में भी ऐसी ही भीड़ शुरू हुई थी और नारे लगे थे—‘ जिस ओर जवानी चलती है,उस ओर जमाना चलता है’………..फिर ये तो रणचण्डी की तरह उमड़ पड़ी हैं। आप भी तो दर्शन करने ही जा रहे थे। जरा इधर ही कर लिया होता। कहाँ चला गया आपका सिंहोन्मत्त शौर्य?

दरअसल आपका दिमाग तो विश्वविद्यालयों में टैंक खड़ा करने में खर्च हो रहा है क्योंकि आप थिंक टैंक के बारे में नहीं जानते। और जहाँ अभी आपने टैंक लगाया था, उसका परिणाम भी आपने देख ही लिया है। आप जानते ही होंगे कि दुनिया का जाना माना विश्वविद्यालय आपके इलाके में ‘माँ गंगा’ की ही गोद में है। तबाह हो रहा है ये, लोग बरबाद करने पर आमादा हैं, गुंडई, भ्रष्टाचार, जातिवाद चरम पर है और साम्प्रदायिकता के तो क्या कहने! उसे तो जैसे पर लग गए हैं। इसके लिए तो संघी ‘पथ संचलन’ हो ही रहा है। बहरहाल, आप तो पीएम हैं। इतने मामूली मसलों पर गौर करने का प्रोटोकाल नहीं बनता। लेकिन आपने तो यहाँ भी एक पीएमओ खोल रखा है, वो क्या करता है?

कम से कम एक सांसद के रूप में आपको इस घटना पर क्या नोटिस नहीं लेनी चाहिए? लेकिन पूरे घटनाक्रम की सुध लेने की बजाय उस पर पानी डाला जा रहा है और मनगढ़न्त तरीके से आपके सिस्टम और मशीनरी की तरफ से झूठे इलजाम लगा कर पूरे लड़कियों द्वारा आयोजित विरोध को बदनाम किया जा रहा है। अपने लोगों से कहिए कि सियासत बंद करें और बच्चों की ज़िन्दगी के सवाल पर, इन लड़कियों के साथ आए दिन होने वाली हिंसा के सवाल पर, पढ़ाई-लिखाई के सवाल पर, रोज़गार और छात्र अधिकार के सवाल पर संवेदनशील बनें। अगर नहीं तो शीशे में बंद आपके हुकूमत की दीवारों को चटखने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। लाठी-गोली और घुड़सवार पुलिस के खौफ से नौजवानी नहीं डरती। दमन का रास्ता किसी भी हुकूमत को तबाह कर देता है जहाँपनाह!

आप तो तानाशाही का अंजाम और इतिहास भी जानते ही होंगे। अपने कारिन्दों कारखासों को ताकीद कीजिए कि अलम पर पहरा लगाना बंद करें। कहाँ गए मुख्यमंत्री योगी और दूसरे सिपहसालार? आश्चर्य है कि कुलपति सहित सरकार और भाजपा का कोई प्रतिनिधि धरने पर छात्राओं से मिलने नहीं आया, जो इन पीड़ित छात्राओं को कानून -व्यवस्था की मदद दिला पाता? वाह रे गुड गवर्नेंस की सरकार! इस राज में तो दुनिया के सबसे मशहूर विश्वविद्यालयों में से एक बीएचयू अपनी बरबादी के आँसू बहा रहा है।ये सब देख कर तो बख्तियार खिलजी की हुकूमत और नालंदा की जलती हुई लाइब्रेरी याद आ रही है, जहाँ हमारा इतिहास जमीदोज़ पड़ा है।

संजय श्रीवास्तव अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव हैं।

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5 Comments

  1. संजय श्रीवास्तवजी ने बहुत बेहतरीन विश्लेषण किया है.सत्ता के अहंकार को उन्होंने अच्छे ढंग से रूपायित किया है.

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