तानाशाही नहीं चलेगी




-डॉ. शशि कुमार सिंह

”ये हार्वर्ड क्या होता है? देखा कैसे हार्डवर्क से जवाब दिया”
”ये तो सुपरहिट जुमला था। एक कहानी सुनाऊँ? एक बार एक गधे को राजा बना दिया गया।”
”ये किस गधे की कहानी सुना रही हो?”
”वह महिला सशक्तीकरण, युवा शक्ति, छात्र शक्ति, बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ पर खूब भाषण देता था।”
”मुझे कह रही हो न?”
”नहीं, नहीं।”
”मैं समझ रहा हूँ। मुझे कह रही हो। स्मृति मैं तुम्हारी हर बात सुन लेता हूँ।”
”आगे सुनिए उसे पढ़ाई से नफरत थी।”
”मुझे ही कह रही हो न?”
”हा हा हा। अरे नहीं, आपको नहीं कह रही हूँ।”
”ये बाहर से कैसी आवाजें आ रही हैं?”
”ये स्टूडेंट हैं।”
”मगर ये संसद की ओर क्यों आ रहे हैं?”
”शायद आपसे मिलना चाहते हैं।”
”मगर ये तो सवाल पूछेंगे। कह दो मैं नहीं हूँ।”
”इनको पता है, आप यहीं हैं। इन्होंने ही तो आपको यहाँ भेजा था।”
”स्मृति विश्वविद्यालयों का कुछ करना होगा।”
”अब कौन करेगा? मुझे सिच्छा मंत्री बनाए थे, तो हटा दिए।”
”ठीक है न, तुमको दूसरा बढ़िया मंत्रालय तो दिए हैं न।”
”मगर उसमें तो मैं प्रोफेसरों को डांट सकती थी न। यही देशद्रोही पैदा कर रहे हैं।”
”ठीक है रक्षा मंत्री भी तो शायद कुछ पढ़ी-लिखी हैं। उनको बुलाओ|”
”रक्षा मंत्रीजी ये क्या हो रहा है? पूरी तैयारी है न?”
”कहाँ, पकिस्तान पर या चीन पर किस पर हमला करना है।”
”अरे उन्हें तो मैं मुँह से हरा देता हूँ। इनका कुछ करो.ये जो विश्वविद्यालयों से आतंकी आ रहे हैं। ये पकिस्तान से भी खतरनाक हैं।”
”हाँ सर। तोप तो मंगा लिया है। तीनों सेनायें आ गयी हैं। किम जोंग से भी संपर्क में हूँ। कुचल देंगे। आप चिंतित न हों।”
”स्मृति मुझे बचाओ।”
”मेरे बस का होता तो आपको कहना पड़ता? शहजादे से तो मैं तुरंत प्रेस कांफ्रेंस करके बचा लेती हूँ।”
”ठीक है पुलिस बुलाओ।”
”अरे तीनों सेनायें हैं।”
”अच्छा अच्छा जल्दी करो नालायको, ये स्टूडेंट इधर ही बढ़ रहे हैं।”
”गोला फेंको। लाठी चार्ज करो….तोप जल्दी लाओ। कुछ करो।”
”सर इसके लिए हमारे पास प्लान है। सारे पुस्तकालयों को जलाना होगा.संघ के प्रचारकों को नियुक्त करना होगा। ये सब देशद्रोही हैं। इनको देशभक्ति सिखानी होगी।”
”हाँ मगर पूर्व सिच्छा मंत्रीजी अभी क्या करें? जल्दी इनको उड़ाओ। ये भीड़ तो बढ़ती ही जा रही है।”
”सर हम पूरी कोशिश कर रहे हैं। लाखों को तो मार गिराया।”
”अभी कितने बचे हैं? तुम लोगों से कुछ नहीं होगा। ये आवाज़ क्यों नहीं रुक रही है?”
”तानाशाही नहीं चलेगी। नहीं चलेगी।”
”मेरा झोला कहाँ है, मैं तो जा रहा हूँ। हे देवी रक्षा करो|”
”तानाशाही नहीं चलेगी। नहीं चलेगी।”
”अरे मोदीजी उठिए कहाँ जा रहे हैं? किससे रक्षा करनी है? क्या नहीं चलेगी?”
”अरे अध्यक्षजी देखिये स्मृति कहाँ हैं?”
” क्यों?”
”पूछना था गधे का क्या हुआ।”
”किस गधे का? आपने जरूर कोई भयानक सपना देखा है।”
”देखो बाहर कौन सा झंडा फहर रहा है? सबकी लाशों को समन्दर में फिंकवा दो। विश्वविद्यालयों में जल्दी टैंक रखवाओ।”
”सब हो जाएगा। धैर्य रक्खें।”

डॉ. शशि कुमार सिंह महात्मा गांधी राजकीय महाविद्यालय, मायाबंदर, अंडमान के हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं

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