आज की लड़ाई भाजपा बनाम मंडल है: अरविन्द मोहन




अरविन्द मोहन (बायाँ) और उदयन रॉय
अरविन्द मोहन का संबंध बिहार के चंपारण ज़िला से है। आप अभी दिल्ली में रहते हैं। कई वर्षों से पत्रकारिता कर रहे हैं। हिंदुस्तान से लेकर अमर उजाला तक नामचीन अखबारों में काम किया है। बुधवार को आपका पटना एक कार्यक्रम के सिलसिले में आना हुआ जहाँ आपने कई विषयों पर द मॉर्निंग क्रॉनिकल के उदयन रॉय से बात-चीत की। बात-चीत के प्रमुख अंश प्रस्तुत हैं:

उदयन: अपने पत्रकारिता जीवन के कुछ विशेष अनुभव साझा करें।

अरविन्द : हम लोग हिन्दुस्तान से जब जुड़े थे तब वह लाटरी वालों का अखबार हुआ करता था। उस अखबार को हमने सीरियस पढने लिखने वालों का अखबार बना दिया। टोटल सर्कुलेशन करीब तीन गुना कर दिया, तीन लाख के करीब। जबकि पूरी टीम पुरानी थी, लिखने वाले बहुत से लोग पुराने थे। उन्ही में अदल बदल कर, कम से कम भरती कर, कम बदलाव करके यह हासिल किया। दूसरा ये जो अल्टरनेटिव (वेब इत्यादि) मीडिया है, उससे भी जुड़ाव रहा है। इससे भी फायदे हैं और समझ बढ़ती है। दुसरे मेनस्ट्रीम मीडिया में हम लोग दबाव में रहते हैं, जो यहाँ नहीं है।

उदयन: कोई विशेष अनुभव?

अरविन्द: ग्लोबलाइजेशन के खिलाफ हम लोगों ने सबसे पहले किताब निकाली थी, 1992 में जब WTO नहीं बना था। उसकी ड्राफ्टिंग चल रही थी, जब हमने किताब निकाली, वो चेतना बने इसे हमने किताब के रूप में निकाला, किताब भी काफी चली। हमने थोड़ा गैप लेकर दिहाड़ी मजदूरों के कल्याण पर भी काम किया।

उदयन: राष्ट्रीय राजनीति में किशन पटनायक के चिंतन का कितना असर रहा और वर्तमान में इसकी क्या स्थिति है? क्या आज उनकी भूमिका में कोई नज़र आ रहा है?

अरविन्द: किशन पटनायक की जगह लेने वाला कोई नहीं है, लेकिन उनकी ज़रुरत आज बहुत ज्यादा महसूस होती है। जो काम वो कर रहे थे, लोगों जो समझाने का और बड़े पैमाने पर कार्यकर्ता प्रशिक्षित करने का, ये दोनों काम अब ख़तम हो गए। वही आदमी हैं जिन्होंने सबसे पहले मंडल, मस्जिद/मंदिर और ग्लोबलाइजेशन, ये तीनों करेंट जो समाज में चल रहे हैं, के बारे में कहा था की मंडल में ही संभावना है वो बाकी दोनों नेगेटिव करेंट को काउंटर कर सके। यह बात उन्होंने उत्तर प्रदेश में चुनाव के समय मायावती और मुलायम सिंह दोनों से मिलकर कहा और मस्जिद गिरने के बाद भी बीजेपी चुनाव हारी। लेकिन बाज़ार और ग्लोबलाइजेशन, इन दोनों ने मिलकर मंडल को ही गोद ले लिया।

आज मंडल के सारे नेता कहाँ हैं, क्या कर रहे हैं? कुछ रेस में लगे हैं, कैसे पैसा बना लें, अपने बच्चों को अंग्रेज़ी पढ़ा कर विदेश भेजें। पिछड़ों में मंडल में यह ताकत थी की वो बाज़ार और ग्लोबलाइजेशन को काउंटर कर सके, मगर नहीं कर सके। लेकिन इसकी ज़रुरत तो है, और जब तक पिछड़ों के पास सत्ता नहीं आयेगी या उनमें से जेन्युइन लोग आगे नहीं आयेंगे, ये लडाई नहीं चल सकती, ये लडाई असल में बीजेपी बनाम मंडल है।

उदयन: बड़ा खतरा कौन बाजारवाद या फासीवाद?

अरविन्द: नहीं बाजारवाद और फासीवाद एक ही हैं। असली खेल बाजारवाद का है, बाज़ार ही बीस तरह के नाटक करके यह खेल चलाता है। और इस खेल में धर्म वाले लोग भी शामिल हो जाते हैं।

उदयन: आपके अनुसार फासीवाद बाजारवाद का रूप है? हिंदुत्व के उभार को आप खतरा नहीं समझते?

अरविन्द: खतरा है, लेकिन मुख्य खतरा नहीं। मुख्य खतरा आर्थिक है। गाँव के गाँव ख़तम हो रहे हैं, खेती बर्बाद हो रही, बेरोज़गारी बढ़ रही, गाँव से पलायन बढ़ रहा, छोटे व्यापारी मर रहे, और ये लोग हमलोगों को हिन्दू-मुस्लिम, अगड़ा-पिछड़ा के नाम पर लड़वाने का काम कर रहे हैं।

उदयन: आक्रामक हिंदुत्व के बहाने बाजारवाद लागू करने के गुप्त अजेंडे के चलते धार्मिक अल्पसंख्यकों में भय का माहौल बनेगा, जो लोगों को बांटने का काम करेगा।

अरविन्द: बांटने का यह क्रम चलेगा, हिन्दू-मुस्लिम, अगड़ा-पिछड़ा-दलित सब अलग अलग खेमों में बंटेंगे लेकिन इसमें किसी का फायदा नहीं, उलटे नुकसान ज्यादा होगा।

उदयन: कितना नुकसान होगा?

अरविन्द: हर स्तर पर नुक्सान होगा, जान मारने से लेकर आपके हाशिये पर चले जाने तक। लेकिन वो सेकेंडरी है, प्राइमरी चीज ये है, वो इकॉनमी को चलाना चाहते हैं, अपने तरफ चीजों को ले जाना चाहते हैं। अब हर गाँव में आप जाकर देखें, बकरी, गाय, भैंस और मछली तक की किस्में बदल गयी हैं। फल अनाज और सब्जियों का भी यही हाल है। लोकल वैरायटी ख़तम हो रही है, अब बीज, कीटनाशक और खाद पानी सब उन्ही का होगा। अब उन्ही का इस्तेमाल करिए, फिर जब फसल मरती है, तब ज़िम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं होगा। लोकल गाय को देखिये, वो दूध कम देती थी, मगर उसका लालन-पालन सस्ता था और कम संसाधनों में होता था। अब जो विदेशी नस्ल की हाईब्रीड गायें हैं, उनका कितना ख्याल करना पड़ता है, बीमार हो जाती हैं, उनको बार बार नहलाना, AC लगाना। इस किस्म का बदलाव बड़े पैमाने पर हो रहा। यूरोप और खासकर अमेरिका सिर्फ आईटी और बायोटेक्नोलॉजी पर केन्द्रित है। उद्योग धंधों पर फोकस नहीं कर रहा, सारे उद्योग धंधे बाहर भेज रहा। हम बाहर का कचरा और प्रदूषण उठाकर भारत ला रहे हैं उसका इस्तेमाल कर रहे और खुश हो रहे हैं।

उदयन: भारत में पनपने वाला बाजारवाद संसार के बाजारवाद से कितना अलग होगा और कितना मेल खायेगा?

अरविन्द: बिलकुल अलग होगा, क्योंकि इसका केन्द्रीय तत्व समाज की भलाई नहीं, सिर्फ मुनाफा कमाना है। स्वरुप हर जगह अलग होगा क्योंकि हर जगह के संसाधन और लोग अलग हैं, हर जगह का समाज अलग है। लोग अलग अलग तरह से रियेक्ट करते हैं। अमेरिका में लोकल लेवल के लोग कम हैं, वहां लोकल लेवल के लोगों को ख़तम कर दिया मार के। ये बदलाव सभी जगह होंगे, लेकिन केन्द्रीय तत्व रहेगा। जिनके पास पूँजी और टेक्नोलॉजी है, ज्ञान भी जिनके पास बजारवाला है, उनकी कमाई और मुनाफा बढ़ता जाएगा। बाकी सारे लोग उसी बाज़ार में, उसी कंपनी में, उसी मजदूरी में चिपके रहेंगे। अगड़े-पिछड़े का फासला बढ़ता जाएगा।

उदयन: इसका वैश्विक असर क्या होगा?

अरविन्द: होगा नहीं, हो रहा है। अमेरिका समेत अन्य विकसित देशों में आईटी समेत शिक्षा, स्वास्थ्य, सब उच्च दर्जे का है। प्रदूषण बहुत कम है। खान पीना और सामाजिक सुरक्षा बहुत ऊंचे दर्जे का है। बाकी दुनिया अभावों में रहे, भाड़ में जाए उन्हें परवाह नहीं। उदयन: ये प्रदूषणकारी उद्योगों को तीसरी दुनिया में शिफ्ट कर रहे हैं? अरविन्द: सिर्फ प्रदूषण का मामला नहीं, खेती पर दुनिया की चार अरब आबादी निर्भर है। विश्व बैंक का अनुमान है कि सिर्फ 75 करोड़ लोग खेती कर सकते हैं, बाकी तीन अरब लोग कहाँ जायेंगे, समुन्दर में डूब जायेंगे, महामारी से मरेंगे, भूख से मरेंगे, इस पर कोई व्यापक सोच नहीं।

उदयन: देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में चल रहे संघर्ष क्या देश की सामाजिक शैक्षणिक सांस्कृतिक परिस्थितियों को व्यापक रूप में प्रतिबिंबित कर रहे या उनसे कुछ जुदा हैं?

अरविन्द: ये आन्दोलन समाज की बेचैनी को बता रहे, ये बेचैनी छात्रों, मजदूरों, किसानों, महिलाओं, दलितों और मुसलमानों और सभी हाशिये पर चले समूहों में समान रूप में है। और मुसलमान तो खौफ में जीने को मजबूर हैं, क्योंकि उनके विरोध करने से माहौल उनके खिलाफ हो जायेगा और उन्हें देशद्रोही करार दे दिया जाएगा। वर्तमान में इन आंदोलनों का स्वरुप कोई बड़ा नहीं, पर इस बेचैनी को कोई होशियार राजनीतिक दल या व्यक्ति एक बड़े आन्दोलन में परिवर्तित कर सकता है। एक आन्दोलन को हमने आप पार्टी के रूप में नरेंद्र मोदी को पछाड़ते देखा है, लेकिन वो भी नालायक निकला। ये पोटेंशियल है, मगर उस तरह के रंग रूप का कोई बड़ा आन्दोलन नहीं खड़ा हो रहा।

उदयन: देश का छात्र आन्दोलन क्या शुरू से ही वैचारिक कमी का शिकार नहीं रहा? छात्रों से मेहनतकश वर्ग की दूरी इसका गवाह है।

अरविन्द: नहीं, बिलकुल नहीं। छात्रों का आन्दोलन तुलनात्मक रूप से कुछ ज्यादा समझदारी का रहा। ट्रेड यूनियन आन्दोलन अपनी मजदूरी और छंटनी के अलावा और कोई आन्दोलन नहीं करता। छात्रों का आन्दोलन जब होता है, तो अपनी छोटी मांगों के साथ देश की दो चार बड़ी मांगों को भी ज़रूर रखता है। अभी भी जो छात्र आन्दोलन हो रहे, उनमें दलितों-मुसलमानों की एकता ज़रूर होनी चाहिए। हैदराबाद, जेएनयू में दलित, आदिवासी, मुसलमान ये तीनों मिलें। बल्कि दलितों और मुसलमानों की एकता से ही सरकार को ज्यादा परेशानी है, सिर्फ छात्रों के जमा होने से नहीं। लड़कियां भी जुड़ जाएँ तो ये आन्दोलन अपने आप में बड़ा हो जायेगा। लेकिन ठोस समझ रखनी चाहिए की हिंसा नहीं हो। अपना आचरण बेहतर रखें। छात्रों का अन्दोलन कम्पेरेटिव ग्रुप्स जो रहे हैं, उनमें बड़ा व्यापक रहा है। छात्र कभी सिर्फ अपनी मांगों पर नहीं अड़े हैं।

उदयन: क्या बिहार का सामाजिक आर्थिक परिदृश्य पलायन को आत्मसात कर चुका है और इसका कोई स्थायी निदान सिर्फ वक़्त के हाथों है? क्या यह सामंती ताकतों की गुप्त जीत का सूचक नहीं ?

अरविन्द: जिस तरह इकॉनमी पिछडती जा रही और पिछड़ती जायेगी, बिहार ही नहीं अन्य पिछड़े इलाकों में भी यही हो रहा और यही होना है। बड़े पैमाने पर पलायन होगा, लोग त्रस्त होंगे, महामारियां फैलेंगी, क्योंकि अपने इकॉनमी के जो बेसिक्स हैं, वो नहीं सुधरेंगे, या हम उन पर नहीं लौटेंगे। फिलहाल दुनिया में जो पिछड़े तबके हैं, उनका कल्याण नहीं होगा।

उदयन: अन्दर से इनके खिलाफ कोई रेजिस्टेंस क्यों नहीं बन रहा?

अरविन्द: रेजिस्टेंस तब होता है जब आपके पास अकल हो, पेट पालने से फुर्सत हो। ऐसे लोगों से लड़ाई की उम्मीद नहीं। लडाई जब भी हो उसके लिए पॉलिटिकल समझदारी और ट्रेनिंग दोनों चाहिए। बाजारवाद भी असर डाल रहा पलायन पर, बाजारवाद का तो सिद्धांत ही है, जितना ज्यादा पलायन होगा, उतना ज्यादा विकास करेगा। वो उसी को बढ़ावा देने के लिए है।

उदयन: चंपारण यात्रा ; मोहनदास गाँधी से लेकर गाँधी परिवार और नितीश कुमार तक। आपका नजरिया

अरविन्द: ज्यादा कुछ दिखावा हो गया, हमें उम्मीद थी बिहार में यात्रा को याद करने से कुछ असर भी होगा। लोगों में बेचैनी ज़रूर दीख रही है, मुजफ्फरपुर में जब नकली गाँधी उतरे थे तब पचीस हज़ार की भीड़ थी। ये तमाशा देखने नहीं आये थे, इनमें गाँधी के प्रति एक आकर्षण है। हमें लग रहा था, सरकार जब प्रयास करेगी, तो कुछ चीजें जो गाँधी जी ने की थीं, वो संमाज याद करेगा, और उससे जो अन्याय हो रहा, उसका प्रतिरोध भी होगा। उससे लोग भी खड़े होंगे। गाँधी सिर्फ पढने लिखने की चीज नहीं, अमल में लाने की विचारधारा हैं। लेकिन इस सरकार ने भी उनको नाटक ही बना दिया। केंद्र सरकार ने भी यही किया।

उदयन: इक्कीसवीं शताब्दी के लिए आपकी नज़रों में भारत के लिए सबसे उत्तम नई व्यवस्था (अगर पूर्ण बदलाव संभव हो)

अरविन्द: विकेंद्रीकरण, विविधता और संवृद्धि (स्थायी विकास)। ये सारी चीजें जो हम गाँधी में देखते थे, यही विकल्प हैं। ये सिर्फ हमारे लिए नहीं, एंटी-ग्लोबलाइजेशन आन्दोलन दुनिया में जहाँ भी चल रहा है, विकेंद्रीकरण, विविधता और संवृद्धि (स्थायी विकास) इसी पर आ रहा है। हमें लगता है, जो एक डेवलपमेंट का मॉडल पूरी दुनिया में लागू करना चाह रहे हैं, उससे काम नहीं चलेगा और दुनिया उससे नहीं टिकेगी। जो रास्ता गांधीजी बताते हैं, जो आज प्रोग्राम है, संवृद्धि का पहले मिल्लेनियम डेवलपमेंट गोल का था। यह प्रोग्राम यूएनओ ने बनाया था 2030 के लिए। अब संवृद्धि का नाम दिया है, उस प्रोग्राम का 90% हिस्सा गाँधी से लिया गया है। जो गाँधी 100 वर्ष पहले बोलते रहे वो अब भी प्रासंगिक है। इसका मतलब जो रास्ता गाँधी बता गए, दिखा गए, हम भूलते जा रहे हैं। जितना ज्यादा भूलेंगे, उतना ही ज्यादा रास्ता कठिन और लम्बा होता जाएगा। जितना जल्दी याद करेंगे, उतना ही बेहतर होगा।

उदयन: देश की राजनीति को बिहार फिर से नयी दिशा दे सके इसके लिए क्या ज़रूरी है?

अरविन्द: यह सब भ्रम है और इस भ्रम को चलाने की ज़रुरत नहीं की बिहार ही नेतृत्व करता है। बिहार जिस हालत में है, वह अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ खड़ा हो ले, लड़ ले। उससे किसी को कोई दिशा मिले तो मिले, लेकिन पहली ज़रुरत अपने साथ हो रहे अन्यायों से लड़ना है, और जो दिखाई नहीं देता। चूंकि बिहार में कम्यूनल डिवाइड उतना बड़ा नहीं जितना जाति का ध्रुवीकरण है। पहले तो अगड़ों को हम दोषी मानते हैं, लेकिन पिछड़ों ने जो किया है, वो और भी ज्यादा दोषी हैं। समाज की जो उर्जा निकली मंडल के नाम से, उसका इस्तेमाल उन्होंने अपना राज पाट बनाने और संपत्ति बनाने के अलावा और कुछ में नहीं किया। एक दो प्रोग्राम भी ऐसा नहीं किया जिसको हम मानें यह और सरकारों से भिन्न है। पिछड़ों को खेती में लाभ पहुंचाने का कोई प्रोग्राम अभी तक तो नहीं हुआ है। कुछ दिखावे के प्रोग्राम ज़रूर हुए हैं, लेकिन कोई ठोस बदलाव वाले प्रोग्राम अभी तक तो नहीं हुए। लड़कियों को पढ़ाना और पंचायत स्तर पर आरक्षण देना, ये सब लोकल लेवल पर ठीक है। लेकिन ऐसा नहीं की इनसे बिहार में कोई बड़ा बदलाव हो जायेगा और पूरे देश में बिहार लीड करने लगेगा।

बिहार में लीडरशिप में वो क्षमतावान और साधन संपन्न लोग नहीं हैं। जिस पार्टी का 22 सांसद होता है, और पार्लियामेंट में वो कोई लाइन नहीं ले पाते, और लोहिया जी के छः सांसद थे जो नेहरूजी का पसीना छुड़ा देते थे। सारे देश के लोग आज भी मानते हैं, लोहिया ही विपक्ष थे और समाजवाद ही विकल्प था। मात्र छः लोग, जिनमें से दो लोग जीत के आये थे और चार लोग उपचुनाव से। यहाँ बाईस लोग जीत कर जाते हैं, और वहां कोई मूंह खोलने को तैयार नहीं। सब अपना भत्ता और फायदा उठाने के अलावा कोई काम नहीं करता। इसी लिए खाली यह कह देने से की बिहार में बहुत जागरूकता है, या पॉलिटिकली बहुत एक्टिव है, काम नहीं चलेगा।

उदयन: आपने ईमानदारी का काफी ज़िक्र किया, पुराने ज़माने में जो लोग थे और उनकी तुलना में आज कहीं न कहीं उनका पतन होता दीख रहा।

अरविन्द: ये चीजें लीडरशिप से आती हैं और अगर लीडर इमानदार नहीं होगा, बहुत नीचे हम इमानदारी की उम्मीद नहीं कर सकते। लेकिन मेरा यह मानना है कि समाज का ज़्यादातर हिस्सा इमानदारी से काम करता है। मजदूर पांच घंटे की जगह छः सात घंटे काम करता है, बिना अधिक मजदूरी लिए। छात्र अपनी पढाई में मेहनत करता है, मास्टर पढाये या नहीं। पत्रकारों में 90% हिस्सा अपना काम इमानदारी से करते है, ज्यादा गड़बड़ी 5-10 प्रतिशत लोग कर रहे, मुश्किल यह है कि यही लोग दिखाई देते हैं, और यही आदर्श बनते जा रहे हैं। नया बच्चा आता है, वो भी अच्छे गुण विक्सित करने के बजाय सोचता है, इन सबमें रखा क्या है। समाज में सब कुछ बिगड़ा नहीं है, लेकिन यह भी देखने की ज़रुरत है कि अभी भी अच्छी प्रवृत्ति कैसे विक्सित हो। कैसे लोग एकजुट हों, एक ताकत बनाने के लिए।
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