UPA के समय की GDP ग्रोथ रेट पर चली कैंची




यूपीए शासन वाले वर्षों में ऐवरेज ग्रोथ पहले 7.75% दिख रही थी, जिसे बदलकर 6.82% किया गया, यह मौजूदा सरकार के चार वर्षों में 7.35% ग्रोथ से भी कम है।

जीडीपी की बैक सीरीज के जो आंकड़े बुधवार को जारी किए गए, उनमें यूपीए शासन के दौरान हुई इकनॉमिक ग्रोथ को काफी कम कर दिया गया। आम चुनाव से कुछ महीने पहले उठाए गए इस कदम पर बड़ा राजनीतिक विवाद हो सकता है।

नए सिरे से पेश किए गए नेशनल एकाउंट्स में मोदी सरकार के चार वर्षों के दौरान जीडीपी की ऐवरेज ग्रोथ को मनमोहन सिंह सरकार के दौरान हासिल तरक्की से ज्यादा दिखाया गया है।

यह रिवीजन अगस्त में सुदीप्तो मंडल कमेटी की ओर से जारी पहले वाली बैक सीरीज से बिल्कुल उलट है। इस कमेटी का गठन नेशनल स्टैटिस्टिकल कमीशन ने किया था।

इस साल अगस्त में जारी किए गए डेटा में दिखाया गया था कि 2003-04 से 2011-12 के दौरान ग्रोथ अपेक्षाकृत ज्यादा थी और 1994-95 से 2002-03 तक ग्रोथ कम थी। इसको लेकर बीजेपी और कांग्रेस में तकरार हुई थी।

कांग्रेस ने तब दावा किया था कि देश का हाल यूपीए शासन में बेहतर था। पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने तब कहा था, ‘यूपीए सरकारों ने एक दशक की सबसे अच्छी ग्रोथ हासिल की और 14 करोड़ लोगों को गरीबी से निकाला। सच की जीत हुई।’

मोदी सरकार ने तुरंत उन आंकड़ों को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि कमीशन की एक कमेटी ने जो जीडीपी बैक सीरीज जारी की, वह तो ‘प्रयोग का नतीजा’ थी वे आंकड़े आधिकारिक नहीं हैं।

हालांकि नेशनल स्टैटिस्टिकल कमीशन के फॉर्मर चेयरमैन ने इसमें नीति आयोग की सहभागिता पर सवाल उठा दिया। एक स्वतंत्र अर्थशास्त्री ने कहा, ‘जीडीपी स्टोरी में नीति आयोग को शामिल करना अजीब है। इससे यह संकेत जाता है कि सेंट्रल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस में क्षमता नहीं है।’

(साभार इकोनॉमिक्स टाइम्स )

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